छठ पूजा 2026: 13 से 16 नवंबर

तिथियाँ, विधि और अरघ्य का महत्व

छठ महापर्व सूर्य देव और छठी मैया की उपासना का सबसे कठोर और सबसे सुंदर पर्व है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई से शुरू होकर यह अब पूरी दुनिया के भारतीयों का पर्व बन गया है। 2026 में छठ 13 से 16 नवंबर तक है।

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छठ महापर्व सूर्य देव और छठी मैया की उपासना का सबसे कठोर और सबसे सुंदर पर्व है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई से शुरू होकर यह अब पूरी दुनिया के भारतीयों का पर्व बन गया है। 2026 में छठ 13 से 16 नवंबर तक है।

2026 की चार तिथियाँ

नहाय-खाय: शुक्रवार, 13 नवंबर - स्नान और शुद्ध सात्विक भोजन (लौकी-भात) से पर्व की शुरुआत

खरना: शनिवार, 14 नवंबर - दिनभर उपवास, संध्या में गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद, फिर 36 घंटे का निर्जला उपवास

संध्या अर्घ्य: रविवार, 15 नवंबर - डूबते सूर्य को नदी, तालाब या जलाशय के किनारे अर्घ्य

उषा अर्घ्य (पारन): सोमवार, 16 नवंबर - उगते सूर्य को अर्घ्य, फिर प्रसाद ग्रहण कर उपवास का पारण

क्यों सूर्य को अर्घ्य?

छठ सीधे प्रकृति की पूजा है: सूर्य, जल और पृथ्वी। ऋग्वेद में सूर्य उपासना के मंत्र मिलते हैं और महाभारत में द्रौपदी तथा कर्ण (सूर्यपुत्र) से छठ की परंपरा जोड़ी जाती है। डूबते और उगते दोनों सूर्य को अर्घ्य देना इस बात का प्रतीक है कि अंत और आरंभ दोनों में जीवन का चक्र जारी रहता है।

व्रत की खास बातें

यह निर्जला उपवास बिना जल ग्रहण किए लगभग 36 घंटे का होता है; स्वास्थ्य की स्थिति ठीक न हो तो कृपया चिकित्सक से सलाह लें और आंशिक व्रत भी समान श्रद्धा से मान्य है।

प्रसाद, ठेकुआ, चावल की खीर, फल, मिट्टी के चूल्हे और नए बर्तनों में ही बनता है; नमक-ताजगी और शुद्धता का पूरा ध्यान रखा जाता है।

व्रती पुराने साफ वस्त्र पहनता है और घर से घाट तक का मार्ग दीयों से सजता है।

छठ में मूर्ति नहीं होती; सूर्य की किरण, जल और सूप में सजा प्रसाद ही देवस्थान है।

घर पर या घाट पर

जहाँ नदी-घाट न हो, वहाँ परिवार बालकनी या आंगन में पानी भरे पात्र के सामने अर्घ्य देते हैं। जरूरी घाट नहीं, श्रद्धा और शुद्धता है। जो पहली बार कर रहे हों, वे किसी अनुभवी व्रती के साथ जाएँ; छठ की तैयारी दिनों पहले से शुरू होती है और पूरा मोहल्ला साथ खड़ा होता है।

चित्र: वाराणसी में छठ पूजा, विकीमीडिया कॉमन्स (CC BY 4.0)

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