छठ का अर्घ्य: चार दिन और घाट पर अर्घ्य के चरण
13 से 16 नवंबर: नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य, जैसे परिवार निभाते हैं
इस साल छठ शुक्रवार 13 नवंबर से सोमवार 16 नवंबर तक है, और संध्या अर्घ्य रविवार 15 नवंबर को है। छठ बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई की लोक परंपरा है, जो परिवारों और गीतों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती आई है। यह मार्गदर्शिका चारों दिन और डूबते व उगते सूर्य को अर्घ्य देने के चरण बताती है, सूप में क्या रहता है, घर वाले व्रती का साथ कैसे दें, और घाट पर ध्यान रखने की बातें भी।
- By
- DharmikVibes
- Language
- Hindi
- Length
- 3 min
- Category
- How-to › Puja vidhi
The article
इस साल छठ शुक्रवार 13 नवंबर से सोमवार 16 नवंबर तक है। संध्या अर्घ्य, जिसकी तस्वीर ज़्यादातर लोगों के मन में होती है, रविवार 15 नवंबर को है।
पहले एक बात कि छठ कहाँ से आता है। यह लोक परंपरा है, जो सबसे अधिक बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई में, और अब जहाँ-जहाँ वहाँ के परिवार रहते हैं, वहाँ निभाई जाती है। इसके चरण किसी एक शास्त्र में नहीं लिखे हैं। वे माँ और दादी से, और छठ के गीतों से आगे बढ़ते हैं, और गाँव-गाँव में थोड़े बदलते हैं। आगे जो लिखा है, वह इसका सामान्य रूप है। आपके परिवार में कुछ अलग हो, तो वही मानें। सूर्य की उपासना अपने-आप में बहुत पुरानी है: ऋग्वेद में सूर्य के सूक्त हैं, जैसे 1.50। इस पर्व में सूर्यदेव के साथ छठी मैया की पूजा होती है।
## चार दिन
1. **शुक्रवार 13 नवंबर, नहाय-खाय।** व्रती, यानी व्रत रखने वाले, स्नान करते हैं, अक्सर नदी या तालाब में, और एक सादा भोजन करते हैं: चावल, चने की दाल और लौकी, बिना लहसुन-प्याज़ के। 2. **शनिवार 14 नवंबर, खरना।** व्रती दिन भर उपवास रखते हैं। शाम को गुड़ की खीर और रोटी बनाकर अर्पित करते हैं, और वही एक बार भोजन करते हैं। परिवार उनके बाद प्रसाद लेता है। यहीं से निर्जला व्रत शुरू होता है, बिना अन्न और जल के। 3. **रविवार 15 नवंबर, संध्या अर्घ्य।** दोपहर बाद परिवार बाँस का दउरा लेकर घाट जाता है। डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। 4. **सोमवार 16 नवंबर, उषा अर्घ्य।** भोर से पहले सब फिर घाट पर लौटते हैं। उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, और व्रती व्रत खोलते हैं।
सूर्यास्त और सूर्योदय का समय हर शहर में अलग है। अपना समय देख लें।
## सूप में क्या रहता है
सूप बाँस का बना होता है। परिवार आमतौर पर इसमें रखते हैं:
- ठेकुआ, गेहूँ के आटे और गुड़ से घर पर बनी कड़ी मिठाई - मौसम के ताज़े फल: केला, गन्ना, नारियल, बड़ा नींबू (गागल), सिंघाड़ा, शकरकंद - चावल के लड्डू, दीया, थोड़ा सिंदूर, और जहाँ रीति हो, जड़ सहित हल्दी और अदरक के पौधे
## अर्घ्य के चरण
1. व्रती स्नान करके पानी में, आमतौर पर घुटने या कमर तक, सूर्य की ओर मुख करके खड़े होते हैं। 2. परिवार के लोग सूप थामते हैं या व्रती को देते हैं। बहुत से परिवार हर बच्चे या हर मनोकामना के लिए एक सूप रखते हैं। 3. लोटे से जल या कच्चा दूध धीरे-धीरे सूप पर से सूर्य की ओर अर्पित किया जाता है। परिवार के दूसरे लोग भी व्रती के पास खड़े होकर अर्घ्य देते हैं। 4. व्रती हाथ जोड़कर सूर्य को प्रणाम करते हैं। किनारे पर महिलाएँ छठ के गीत गाती हैं। 5. सुबह यही सब उगते सूर्य की ओर मुख करके होता है। उसके बाद व्रती प्रसाद बाँटते हैं और व्रत खोलते हैं, अक्सर पहले पानी और थोड़े अदरक-गुड़ से, जैसी घर की रीति हो।
## कृपया सावधानी रखें
छठ का व्रत लंबा और कठिन है, और लगभग डेढ़ दिन निर्जला रहता है। बुज़ुर्ग, अस्वस्थ, गर्भवती, मधुमेह वाले या नियमित दवा लेने वाले पहले डॉक्टर से बात करें और दवा लेते रहें। बहुत से परिवारों में एक सदस्य पूरा व्रत रखता है और बाकी साथ देते हैं। पानी में वहीं तक जाएँ जहाँ आराम से खड़े हो सकें, बच्चों को पास रखें, और शहर में साफ़ कुंड या प्रशासन द्वारा तैयार घाट चुनें।
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