पितृ पक्ष: घर पर तर्पण और श्राद्ध कैसे करें

जल, तिल और भोजन से पूर्वजों को याद करने की सरल विधि

पितृ पक्ष (26 सितंबर से 10 अक्टूबर 2026) में घर पर तर्पण और श्राद्ध करने की सरल, चरण-दर-चरण विधि: क्या चाहिए, दिन और समय कैसे चुनें, जल और भोजन कैसे अर्पित करें, और पंचबलि। साथ में उनके लिए विकल्प जिनके पास पुरोहित, जगह या सामग्री नहीं है, या जो अस्वस्थ हैं। तिथि याद न हो तो सर्व पितृ अमावस्या, 10 अक्टूबर। बंगाल, उत्तर और दक्षिण भारत की रीतियाँ, और स्रोत।

By
DharmikVibes
Language
Hindi
Length
5 min
Category
How-to › Festival guides

The article

पितृ पक्ष में अपने माता-पिता, दादा-दादी और पूर्वजों को याद करने का एक सरल तरीका: जल, तिल और उनके नाम पर बाँटा गया भोजन, घर पर, बिना किसी आडंबर के।

2026 में पितृ पक्ष शनिवार 26 सितंबर से शनिवार 10 अक्टूबर तक है। आख़िरी दिन सर्व पितृ अमावस्या (महालया अमावस्या) है। जिनकी तिथि याद न हो, उनका श्राद्ध इसी दिन किया जाता है।

**क्या चाहिए**

- ताँबे या स्टील का लोटा, साफ़ जल से भरा, और जल गिराने के लिए एक चौड़ी थाली या परात - एक चुटकी काले तिल - कुश की कुछ पत्तियाँ, कुश न मिले तो दूब - थोड़े अक्षत (साबुत चावल), एक-दो फूल और एक दीया - जिन्हें याद कर रहे हैं उनकी तस्वीर, अगर हो - घर का बना सात्त्विक भोजन: बहुत से घरों में खीर, पूरी और बिना प्याज़-लहसुन की सब्ज़ी बनती है - गाय, पक्षियों (कई घरों में कौए), कुत्ते और चींटियों के लिए अलग निकाला हुआ थोड़ा भोजन

**विधि**

1. **दिन चुनें।** श्राद्ध आम तौर पर उस तिथि को होता है जिस तिथि को व्यक्ति का देहांत हुआ था। तिथि मालूम न हो, या सबको एक साथ याद करना हो, तो सर्व पितृ अमावस्या, 10 अक्टूबर 2026 को करें। अपने शहर की तिथियाँ स्थानीय पंचांग में देख लें। 2. **स्नान करके साफ़, सादे कपड़े पहनें।** इन दिनों बहुत लोग नए कपड़े, बाल कटवाना और दाढ़ी बनाना टालते हैं। जैसा आपके घर में होता आया है, वैसा करें। 3. **समय चुनें।** तर्पण प्रायः सुबह स्नान के बाद किया जाता है। श्राद्ध का भोजन परंपरा से दोपहर के आसपास (कुतुप और रौहिण मुहूर्त) अर्पित किया जाता है। अपने शहर का समय स्थानीय पंचांग में देख लें। 4. **दक्षिण की ओर मुँह करके बैठें।** दक्षिण दिशा परंपरा से पितरों की दिशा मानी जाती है। आसन या तह किए कपड़े पर बैठें, दीया जलाएँ और तस्वीर सामने रखें। 5. **संकल्प लें।** अपने शब्दों में, या संस्कृत आती हो तो संस्कृत में, अपना नाम, गोत्र (अगर पता हो) और जिन्हें आज याद कर रहे हैं उनके नाम बोलें: जैसे पिता, दादा और परदादा, और अगर आपके घर की रीति हो तो ननिहाल पक्ष भी। 6. **जल अर्पित करें।** हाथ में कुश लें। जल में थोड़े तिल डालें। जल को धीरे-धीरे कुश के ऊपर से थाली में गिराएँ, हथेली के उस भाग से जो अँगूठे और तर्जनी के बीच है। हर व्यक्ति का नाम लेते हुए जल दें, चाहें तो हर एक के लिए तीन बार। जो जनेऊ पहनते हैं वे इस समय उसे प्रायः दाहिने कंधे पर कर लेते हैं। 7. **भोजन अर्पित करें।** बने हुए भोजन का थोड़ा हिस्सा पत्ते या थाली में तस्वीर के सामने रखें, साथ में एक फूल और थोड़े अक्षत। एक मिनट शांत बैठकर उन्हें याद करें। 8. **हिस्से बाँटें।** अलग रखा भोजन गाय, पक्षियों, कुत्ते और चींटियों को दें। इसे प्रायः पंचबलि कहते हैं। हो सके तो किसी ज़रूरतमंद या पुरोहित को भोजन कराएँ और आदर से कुछ दान दें: अनाज, कपड़े या कोई उपहार। 9. **साथ बैठकर भोजन करें।** अर्पण के बाद पूरा परिवार वही भोजन करे। तर्पण का जल किसी पेड़ या पौधे की जड़ में डालें, नाली में नहीं।

**अगर यह न हो सके…**

- **पुरोहित नहीं हैं?** घर पर तर्पण के लिए पुरोहित ज़रूरी नहीं। अगर परिवार मंत्रों के साथ पूरा श्राद्ध चाहता है तो पुरोहित को बुला सकते हैं; कई मंदिर और घाट आपकी ओर से भी यह करते हैं। - **तिथि नहीं पता?** सर्व पितृ अमावस्या (10 अक्टूबर 2026) को करें। - **कुश या तिल नहीं मिले?** दूब लें, या सिर्फ़ साफ़ जल और सच्चे मन की प्रार्थना। भाव सामग्री से बड़ा है। - **अकेले रहते हैं, छोटा घर है, या विदेश में हैं?** बालकनी या खिड़की के पास एक कटोरे में जल अर्पित करें, एक सादा व्यंजन बनाएँ और किसी ज़रूरतमंद के साथ भोजन बाँटें। - **अस्वस्थ हैं या उम्र ज़्यादा है?** कुर्सी पर बैठकर करें, या परिवार का कोई सदस्य जल दे और आप नाम बोलें। - **खाना नहीं बना सकते?** फल, दूध या थोड़ा मीठा अर्पित करें, और किसी भंडारे या गौशाला में अन्न दें। - **कौन तर्पण करे?** परंपरा से पुत्र या परिवार का कोई पुरुष सदस्य तर्पण करता है। आज बहुत से परिवारों में बेटियाँ, पत्नियाँ और पोते-पोतियाँ भी तर्पण करती हैं, और कई आचार्य इसे स्वीकार करते हैं। अपने परिवार की रीति मानें, और संदेह हो तो कुल-पुरोहित से पूछें।

**हर क्षेत्र की अपनी रीति**

बंगाल में महालया की सुबह गंगा और दूसरी नदियों के किनारे तर्पण होता है, और यही दिन दुर्गा पूजा से पहले देवी के आगमन का भी है। उत्तर भारत के बहुत से घरों में ब्राह्मण भोज और कौए को भोजन देना मुख्य है। दक्षिण में महालय पक्ष का तर्पणम् काले तिल के साथ घर पर या मंदिर के सरोवर पर होता है। कई परिवार जीवन में एक बार गया, वाराणसी या प्रयागराज जाकर पिंडदान करते हैं। इन सबके पीछे एक ही भाव है: याद रखना।

**हम यह क्यों करते हैं**

पितृ पक्ष आश्विन मास का कृष्ण पक्ष है, जो उन लोगों को याद करने के लिए रखा गया है जिनके कारण हमारा जीवन संभव हुआ। जल और भोजन का अर्पण धन्यवाद कहने का एक तरीका है, और परिवार में उनके नाम को जीवित रखने का भी। शास्त्र श्राद्ध को श्रद्धा का कर्म बताते हैं; "श्राद्ध" शब्द ही श्रद्धा से बना है। प्रेम से किया गया छोटा-सा अर्पण भी पर्याप्त है।

**स्रोत**

- मनुस्मृति, अध्याय 3 (श्राद्ध और पितरों के अर्पण पर) - विष्णु पुराण, तृतीय अंश (श्राद्ध विधि) - गरुड़ पुराण, प्रेत खंड (दिवंगत के लिए अर्पण पर) - पी. वी. काणे, धर्मशास्त्र का इतिहास, खंड 4 (1953), श्राद्ध पर, क्षेत्रीय भिन्नताओं के लिए - तारीख़ें: ड्रिक पंचांग, पितृ पक्ष 2026, नई दिल्ली, 29 सितंबर 2026 को देखी गईं

*हर परिवार और क्षेत्र की रीति अलग होती है। संदेह हो तो बड़ों या कुल-पुरोहित की बात मानें।*

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