गौरी की पहली नवरात्रि
Episode 1 of 1 in गौरी की पहली नवरात्रि.
Narrated with an AI voice.
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- 4 min
- Listening time
- 4 min
- By
- DharmikStudio Originals
- Narration
- AI voice
In this episode
- गौरी नए शहर में है, और मीना आंटी उसे कन्या पूजन पर बुलाती हैं।
- आंटी बच्चियों के पैर धोती हैं और हलवा, पूरी और लाल चुनरी देती हैं।
- दादी समझाती हैं, और गौरी अपना उपहार छोटे भाई के साथ बाँटती है।
Read along
*[Sound: धीमी, हल्की घंटी। 2 सेकंड।]*
गौरी छह साल की थी। कुछ ही दिन पहले वह अपने मम्मी-पापा, अपनी दादी और अपने छोटे भाई चिंटू के साथ एक नए शहर में आई थी। नया घर, नई गली, नए चेहरे। गौरी को सब कुछ थोड़ा अजनबी लगता था।
एक सुबह दरवाज़े की घंटी बजी। सामने वाले घर की मीना आंटी खड़ी थीं। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "कल अष्टमी है। हमारे घर कन्या पूजन है। गौरी को भेजिए न, मोहल्ले की और बच्चियाँ भी आएँगी।"
गौरी दादी के पीछे छिप गई। उसने धीरे से पूछा, "दादी, मैं वहाँ किसी को जानती भी नहीं।"
दादी ने उसके बालों पर हाथ फेरा। "कल तक जान जाओगी, बिटिया।"
अगली सुबह मम्मी ने गौरी को उसकी पीली फ्रॉक पहनाई और दो चोटियाँ बनाईं। दादी उसका हाथ पकड़कर आंटी के घर ले गईं।
आंटी के घर में गेंदे के फूलों की महक थी। दरवाज़े पर रंगोली बनी थी, और पूजा के कोने में एक दीया जल रहा था। एक दरी पर सात-आठ बच्चियाँ बैठी थीं। कोई चार साल की, कोई सात साल की। एक छोटा लड़का भी था, आंटी का पोता।
गौरी चुपचाप सबसे किनारे बैठ गई। उसने अपनी फ्रॉक का किनारा उँगलियों में पकड़ लिया। बाक़ी बच्चियाँ आपस में बातें कर रही थीं, हँस रही थीं। गौरी ने सोचा, "काश मैं भी किसी को जानती।" दादी दरवाज़े के पास बैठी थीं। उन्होंने गौरी को देखकर धीरे से सिर हिलाया, जैसे कह रही हों, सब ठीक है।
फिर आंटी एक थाली में पानी लेकर आईं। उन्होंने हर बच्ची के पैर धीरे-धीरे धोए, और एक साफ़ कपड़े से पोंछे। फिर सबके माथे पर रोली का छोटा-सा टीका लगाया, और कलाई पर लाल धागा बाँधा।
जब आंटी गौरी के पास आईं, तो गौरी हैरान रह गई। "आंटी मेरे पैर क्यों धो रही हैं?" उसने सोचा। "बड़े तो हमारे पैर नहीं धोते, हम बड़ों के पैर छूते हैं!"
फिर आंटी हर बच्ची के सामने एक पत्तल रखती गईं। उस पर गरम-गरम पूरी, मीठा हलवा और काले चने। गौरी को हलवा बहुत अच्छा लगा। उसकी बगल वाली बच्ची ने कहा, "मेरा नाम पिंकी है। तुम्हें भी हलवा अच्छा लगता है?" गौरी ने सिर हिलाया, और पहली बार मुस्कुराई।
खाने के बाद आंटी ने हर बच्ची को एक लाल चुनरी ओढ़ाई, और एक छोटा-सा पैकेट दिया। गौरी ने खोला, तो उसमें रंगीन पेंसिलें थीं। आंटी ने सबके आगे हाथ जोड़े, और प्यार से कहा, "आप सब आईं, मेरा घर रोशन हो गया।"
घर लौटकर गौरी सीधे दादी की गोद में जा बैठी। "दादी, आंटी ने हमारे पैर क्यों धोए? और हमारे आगे हाथ क्यों जोड़े? हम तो छोटे हैं।"
दादी हँसीं। उन्होंने गौरी की लाल चुनरी ठीक की और कहा, "नवरात्रि में हम देवी माँ की पूजा करते हैं, है न? हमारी परंपरा में माना जाता है कि अष्टमी और नवमी के दिन छोटी बच्चियाँ देवी का रूप होती हैं। इसलिए उस दिन उनका आदर करते हैं, उन्हें प्यार से खिलाते हैं, और उपहार देते हैं।"
गौरी ने आँखें बड़ी कीं। "मैं देवी का रूप?"
"हाँ," दादी बोलीं। "और एक बात और। आज बच्चियों का दिन था, पर सच तो यह है कि हर बच्चा अनमोल है। तुम भी, पिंकी भी, और हमारा चिंटू भी।"
तभी चिंटू दौड़ता हुआ आया। उसकी नज़र गौरी की रंगीन पेंसिलों पर पड़ी। "दीदी, ये क्या है?"
गौरी ने पैकेट को देखा। फिर चिंटू को देखा। उसे दादी की बात याद आई, कि हर बच्चा अनमोल है।
उसने पैकेट खोला और आधी पेंसिलें चिंटू की ओर बढ़ा दीं। "लो, ये तुम्हारी। चलो, साथ में चित्र बनाते हैं।"
उस शाम दोनों ने मिलकर एक बड़ा-सा चित्र बनाया। उसमें एक जलता हुआ दीया था, गेंदे के फूल थे, और बहुत सारे बच्चे थे, हाथ पकड़े हुए, मुस्कुराते हुए।
दादी ने चित्र देखा और कहा, "यही तो नवरात्रि है।"
गौरी को अब नया शहर उतना अजनबी नहीं लगता था। कल वह पिंकी के साथ खेलने वाली थी।
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और अब आपसे एक बात पूछूँ? आपकी कोई प्यारी चीज़ है, जो आप किसी अपने के साथ बाँटना चाहेंगे?
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यह कहानी AI आवाज़ में है, और DharmikVibes टीम ने लिखी है।
*[Sound: धीमी घंटी। धीरे से समाप्त।]*