शिवनेरी का बालक, पुणे की माँ

Episode 1 of 6 in छत्रपति शिवाजी महाराज: स्वराज्य की कहानी.

Narrated with an AI voice.

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नमस्कार। छत्रपति शिवाजी महाराज पर हमारी कथा-माला की पहली बैठक में आपका स्वागत है।

अगले छह एपिसोड में हम सुनेंगे कि पुणे की पहाड़ियों का एक लड़का कैसे राजा बना, और उसने कैसा राज्य खड़ा किया जिसे लोग तीन सौ साल से ज़्यादा बीत जाने के बाद भी प्रेम से याद करते हैं। हम इतिहास के लिखे हुए प्रमाणों के पास रहेंगे। जहाँ कोई बात परंपरा से आई है, दस्तावेज़ों से नहीं, वहाँ मैं आपको बता दूँगा। दोनों की अपनी जगह है।

*[ठहराव]*

तो चलिए, एक पहाड़ से शुरू करते हैं।

पुणे से लगभग नब्बे किलोमीटर उत्तर में, जुन्नर कस्बे के पास, एक खड़ी चट्टान पर एक किला है। उसका नाम है **शिवनेरी**। किले के भीतर एक छोटा-सा मंदिर है, शिवाई देवी का। बहुत से लोग कहते हैं कि यहाँ जन्मे बालक का नाम इन्हीं देवी के नाम पर रखा गया। यह परंपरा है, और बहुत सुंदर परंपरा है।

बालक के पिता थे **शहाजी भोसले**, एक मराठा सरदार और कुशल सेनापति। उन दिनों दक्खन बड़े-बड़े राज्यों में बँटा हुआ था। अहमदनगर की निज़ामशाही, बीजापुर की आदिलशाही, और उत्तर से आगे बढ़ता मुग़ल साम्राज्य। शहाजी जैसे सरदार कभी एक दरबार की सेवा करते, कभी दूसरे की, और उन दरबारों के उतार-चढ़ाव के साथ उनकी किस्मत भी ऊपर-नीचे होती रहती।

बालक की माँ थीं **जिजाबाई**, सिंदखेड के लखुजी जाधव की बेटी। उनका परिवार भी अपने आप में बड़ा और प्रभावशाली था।

अब यह सवाल कि जन्म ठीक किस दिन हुआ? आज सबसे ज़्यादा मानी जाने वाली तारीख़ है **19 फ़रवरी 1630**। यह तारीख़ जेधे शकावली नाम की एक पुरानी मराठी कालक्रम-सूची से आती है, और महाराष्ट्र सरकार इसी दिन शिव जयंती मनाती है। कुछ पुराने इतिहासकारों ने 1627 का साल माना था। और बहुत से परिवार हिंदू पंचांग के हिसाब से, तिथि पर जयंती मनाते हैं, इसलिए हर साल वह दिन बदल जाता है। यह मैं इसलिए बता रहा हूँ कि अगर आप अलग-अलग तारीख़ें सुनें, तो उलझें नहीं। कहानी इससे नहीं बदलती।

*[ठहराव]*

अब ज़रा उस ज़माने की कल्पना कीजिए। दक्खन में सेनाएँ बार-बार आती-जाती थीं। गाँव जल जाते या खाली हो जाते। किसान खेत बोता, और यह पक्का नहीं होता था कि फसल काट भी पाएगा। उस समय बड़े हो रहे किसी बच्चे के लिए "हमारी रक्षा कौन करेगा?" किताब का कोई सवाल नहीं था। यह हर गाँव के कुएँ पर पूछा जाने वाला सवाल था।

शहाजी ज़्यादातर समय दूर दक्षिण में, बेंगलुरु की तरफ़ रहते थे। इसलिए बालक को पाला जिजाबाई ने। और यहाँ से कहानी पहुँचती है **पुणे**।

उन दिनों का पुणे वह शहर नहीं था जिसे आज आप जानते हैं। वह एक छोटा कस्बा था, जो बुरी तरह उजड़ चुका था। इतिहास बताता है कि पहले आई एक सेना ने उसे तबाह किया था, और यह जताने के लिए कि यहाँ अब कोई न बसे, ज़मीन पर हल फिरवा दिया था। लोग वहाँ से चले गए थे।

पुणे और आसपास का इलाक़ा शहाजी की जागीर था। आगे के वर्षों में जिजाबाई छोटे शिवाजी के साथ वहाँ रहने आईं। जागीर का कामकाज **दादोजी कोंडदेव** नाम के एक प्रशासक देखते थे।

*[ठहराव]*

अब वह हिस्सा, जिसे महाराष्ट्र में लोग बड़े प्यार से सुनाते हैं। कहा जाता है कि जिजाबाई ने पुणे की ज़मीन पर फिर से हल चलवाया, और कुछ लोग कहते हैं कि वह सोने का हल था। हल सोने का रहा हो या लोहे का, हर किसान ने इसका मतलब समझ लिया। यह ज़मीन शापित नहीं है। लौट आओ, अपने खेत बोओ, हम तुम्हारे साथ खड़े हैं।

धीरे-धीरे लोग लौटने लगे। ज़मीन की नाप-जोख हुई। लगान इतना रखा गया कि किसान उसे सह सके। जिनके पास कुछ नहीं था, उन्हें बीज और बैल उधार दिए गए। इतिहासकार इस धीरज भरे काम का बड़ा श्रेय दादोजी कोंडदेव को देते हैं। उन्होंने बालक शिवाजी को ख़ुद कितना गढ़ा, इस पर इतिहासकारों में आज भी चर्चा है, और हम उसका फ़ैसला यहाँ नहीं करेंगे। इतना ज़रूर कह सकते हैं कि शिवाजी ने बचपन में एक टूटी हुई जगह को खेत-खेत करके फिर से बसते देखा। अच्छा प्रशासन ज़मीन पर कैसा दिखता है, यह उन्होंने अपनी आँखों से देखा।

पुणे में परिवार के लिए एक घर बना, जिसे **लाल महल** कहते हैं। आज आप वहाँ जो इमारत देखते हैं, वह पुरानी जगह पर नए सिरे से बनाई गई है।

*[ठहराव]*

जिजाबाई ने बेटे को क्या सिखाया?

स्रोत उन्हें गहरी आस्था और दृढ़ इच्छा वाली स्त्री बताते हैं। उन्होंने बेटे को **रामायण** और **महाभारत** की कथाएँ सुनाईं, जैसे आज भी भारत की माँएँ सुनाती हैं। पर सोचिए, उस घाटी में पल रहे एक लड़के के मन में कौन-सी कथाएँ बैठी होंगी। पिता का वचन निभाने के लिए राजगद्दी छोड़ते राम। वह मुकुट लेने से इनकार करते भरत, जो उनका नहीं था। पांडव, जिन्होंने सब कुछ खो दिया, पर जो सही था उसे नहीं छोड़ा।

ये सिर्फ़ देवताओं और वीरों की कहानियाँ नहीं थीं। ये इस बारे में थीं कि राजा को कैसा होना चाहिए। राजा अपना वचन निभाता है। जो अपनी रक्षा नहीं कर सकते, राजा उनकी रक्षा करता है। राजा दूसरे की चीज़ नहीं छीनता।

पुणे की जागीर में गाँवों के बीच झगड़े निपटाने के लिए आते थे। कभी मेड़ का झगड़ा, कभी कुएँ का, कभी फसल के हिस्से का। परंपरा कहती है कि बालक शिवाजी इन सुनवाइयों में बैठते थे और देखते थे कि फ़ैसले से पहले दोनों पक्षों की बात कैसे सुनी जाती है। आगे चलकर उनके पत्रों में एक ऐसा शासक दिखता है जो ठीक इन्हीं छोटी बातों की परवाह करता था। किसान का अनाज, गाँव का पानी, और वह सिपाही जिसने ऐसी चीज़ ले ली जो उसकी नहीं थी।

*[ठहराव]*

एक और गुरु थी। ख़ुद यह धरती।

पुणे के पश्चिम में **मावल** की घाटियाँ हैं। बरसात में गहरी हरी, छोटी-छोटी नदियों से कटी हुई, और सह्याद्रि की पहाड़ियों से घिरी हुई। इन घाटियों के नौजवान किसान थे। मेहनती, वफ़ादार, और हर पगडंडी, हर चोटी को पहचानने वाले। इन्हें **मावले** कहा जाता था। शिवाजी इन्हीं के बीच बड़े हुए। पहाड़ों पर घूमते, किलों को पहचानते, इन्हीं के साथ बैठकर खाना खाते।

ऐसी किसी घाटी में बरसात की एक शाम सोचिए। छप्पर पर बारिश, कोने में आग, कुछ लड़कों के बीच बँटती भाकरी और प्याज़, और बातें कि किस पहाड़ की चोटी के पास झरना है और मवेशी कौन-सा रास्ता पकड़ते हैं। शिवाजी का आगे का बहुत-सा हुनर इसी पाठशाला में सीखा गया।

उनके ज़िंदगी भर के बहुत से साथी इन्हीं परिवारों से आए। वे राजकुमार नहीं थे। वे किसानों और गाँव के पाटिलों के बेटे थे। आगे चलकर शिवाजी ने जो कुछ बनाया, उसकी रीढ़ यही लोग बने। जो नेता अपने लोगों को नाम से जानता है, जो उनके खेतों में चला है, वह अलग तरह का नेता होता है।

किशोर अवस्था में शिवाजी अपनी माँ के साथ पिता से मिलने बेंगलुरु गए। वहाँ उन्होंने एक बड़ा दरबार देखा, उसकी विद्या, उसके कवि, उसकी शान। शहाजी ने योग्य अधिकारियों को उनके साथ पुणे भेजा। शहाजी भी अपने ढंग से भविष्य की नींव रख रहे थे।

*[ठहराव]*

तो आज हमने जो सुना, उसे एक बार समेट लेते हैं।

शिवाजी का जन्म जुन्नर के पास शिवनेरी किले पर हुआ, सबसे अधिक संभावना 19 फ़रवरी 1630 की है। उनके पिता शहाजी दक्खन के बड़े दरबारों की सेवा में अक्सर दूर रहते थे। माँ जिजाबाई ने उन्हें पुणे में पाला, एक ऐसे कस्बे में जो फिर से जी उठ रहा था, जहाँ किसानों से किए वादे की तरह ज़मीन पर फिर हल चला था। माँ ने उन्हें रामायण और महाभारत दी, और यह समझ दी कि सत्ता आम लोगों की रक्षा के लिए होती है। और मावल घाटियों के नौजवान उनके सिपाही बनने से पहले उनके दोस्त बने।

**आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए।** जिजाबाई का हल एक संदेश था: फिर से शुरू करना सुरक्षित है। इस हफ़्ते अपने आसपास किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचिए जिसे शायद यह सुनने की ज़रूरत है। हौसले का एक शब्द, किसी काम में थोड़ा हाथ बँटाना। बिना किसी दिखावे के, बस दे दीजिए।

अगले एपिसोड में हम रायरेश्वर चलेंगे, जहाँ परंपरा के अनुसार कुछ नौजवानों ने एक शपथ ली थी। और सुनेंगे कि "स्वराज्य" शब्द का उनके लिए क्या अर्थ था।

*[हवा। 2 सेकंड मौन।]*

**श्रेय (पढ़कर सुनाएँ):** जदुनाथ सरकार की "शिवाजी एंड हिज़ टाइम्स", गो. स. सरदेसाई की "न्यू हिस्ट्री ऑफ़ द मराठाज़", जेधे शकावली, शिवभारत और सभासद बखर के आधार पर DharmikStudio टीम द्वारा लिखित। AI स्वर में वाचन। कोई भूल हो तो इस एपिसोड पर "गलती बताएँ" का उपयोग करें।

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