स्वराज्य की शपथ
Episode 2 of 6 in छत्रपति शिवाजी महाराज: स्वराज्य की कहानी.
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नमस्कार। पिछली बार हमने शिवनेरी के बालक और पुणे में उसकी माँ से मुलाक़ात की थी, और मावल घाटी के उन नौजवानों से भी, जो उसके दोस्त बने। आज वही नौजवान साथ मिलकर एक पहाड़ी पर चढ़ते हैं।
*[ठहराव]*
पुणे से दक्षिण-पश्चिम में, भोर कस्बे के पास, एक सपाट चोटी वाली पहाड़ी है। उस पर शिव का एक छोटा, सादा-सा मंदिर है, जिसे **रायरेश्वर** कहते हैं। कोई भव्य इमारत नहीं। पत्थर की दीवारें, नीची छत, भीतर एक शिवलिंग। बरसात में पूरा पठार हरे और पीले फूलों से भर जाता है।
महाराष्ट्र की परंपरा कहती है कि लगभग **1645** में, जब शिवाजी करीब पंद्रह साल के थे, वे मावल के कुछ साथियों के साथ यहाँ आए। रायरेश्वर के शिवलिंग के सामने उन्होंने एक वचन दिया। वे इस धरती पर **स्वराज्य**, यानी अपना राज, स्थापित करने के लिए काम करेंगे।
यह हमें कैसे पता है? कुछ तो परंपरा से, जो परिवारों और पुराने वृत्तांतों में चली आई है। और कुछ एक पत्र से। उस साल दादाजी नरस प्रभु देशपांडे नाम के एक अधिकारी को लिखे पत्र में शिवाजी कहते हैं कि रायरेश्वर देव ने उन्हें सफलता दी है, और वही इस स्वराज्य को पूरा करेंगे। पत्र में **हिंदवी स्वराज्य** शब्द आता है, यानी इस धरती के लोगों का अपना राज। कई पुराने पत्रों की तरह, इतिहासकारों ने इसे भी बारीकी से परखा है। पर उस शपथ की स्मृति बहुत पुरानी है, और लोगों को बहुत प्यारी है।
*[ठहराव]*
इन नौजवानों के लिए स्वराज्य का मतलब क्या था? यह किसी किताब का शब्द नहीं था। पिछली बार की बात याद कीजिए। सेनाएँ गुज़रतीं तो गाँव उजड़ जाते। किसान को अपनी ही फसल का भरोसा नहीं होता। और स्थानीय अधिकारी जो चाहे ले लेते, क्योंकि ऊपर कोई देखने वाला नहीं था।
तो उनके लिए स्वराज्य का अर्थ बहुत सीधा था। ऐसा शासक जो इतना पास हो कि आपकी बात सुन सके। ऐसा लगान जिसे चुकाकर भी घर में रोटी बने। ऐसा सिपाही जो आपके खेत में घुसकर अनाज न उठाए। और ऐसा न्याय जो इस बात पर न टिका हो कि आप किसके घर पैदा हुए।
और बहुत जल्दी, किशोर शिवाजी की परीक्षा ठीक इसी आख़िरी बात पर हुई।
*[ठहराव]*
लगभग उसी समय, पुणे के पास रांझे नाम के एक गाँव के **पाटिल**, यानी मुखिया, की शिकायत उनके पास पहुँची। पाटिल ने अपने ही गाँव की एक स्त्री के साथ अन्याय किया था। पाटिल बड़ा आदमी होता था। उसके परिवार के पास यह पद पीढ़ियों से था। बहुत से नए शासक ऐसे आदमी को ख़ुश रखने के लिए आँखें मूँद लेते।
शिवाजी ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने पाटिल को अपने सामने बुलवाया, मामला सुना, और उसे पद से हटाकर कड़ी सज़ा दी। इस मामले का एक दस्तावेज़ आज भी मौजूद है। पुणे के इलाक़े के लोगों के लिए संदेश साफ़ था। इस नौजवान के राज में अगर कोई मुखिया उन्हीं लोगों को नुक़सान पहुँचाएगा जिनकी सेवा के लिए वह है, तो उसकी ताक़त उसे नहीं बचाएगी।
*[ठहराव]*
शिवाजी के पत्रों पर एक मुद्रा लगती थी। वह संस्कृत में थी, और उसमें लड़ाइयों की कोई डींग नहीं थी। आइए, उसे सुनें।
**प्रतिपच्चन्द्रलेखेव वर्धिष्णुर्विश्ववन्दिता। शाहसूनोः शिवस्यैषा मुद्रा भद्राय राजते॥** *pratipaccandralekheva vardhiṣṇur viśvavanditā | śāhasūnoḥ śivasyaiṣā mudrā bhadrāya rājate ||*
सीधे शब्दों में: "शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के चाँद की पतली रेखा की तरह, जो दिन-ब-दिन बढ़ती है और जिसे संसार प्रणाम करता है, शाहजी के पुत्र शिव की यह मुद्रा सबके कल्याण के लिए शोभित है।"
उन्होंने जो चित्र चुना, उस पर ध्यान दीजिए। नया चाँद। तलवार नहीं, शेर नहीं। कुछ छोटा, जो धीरे-धीरे, हर रात थोड़ा-थोड़ा बढ़ता है। और आख़िरी शब्द है **भद्राय**, यानी भलाई के लिए, कल्याण के लिए। मुद्रा ख़ुद बता देती है कि यह राज किसलिए है।
*[ठहराव]*
अब वचन को एक ठिकाना चाहिए था।
लगभग 1646 में, जब शिवाजी करीब सोलह साल के थे, उन्होंने और उनके साथियों ने पुणे के दक्षिण-पश्चिम में एक ऊँची धार पर बसे **तोरणा** किले को अपने हाथ में लिया। वह बीजापुर के अधीन था, पर वहाँ पहरा कम था, और वृत्तांतों के अनुसार किला बिना लड़ाई के उनके पास आ गया। सभासद, जिन्होंने शिवाजी के जीवन का सबसे पुराना मराठी वृत्तांत लिखा, बताते हैं कि किले की मरम्मत के समय उसमें गड़ा हुआ पुराना ख़ज़ाना मिला। शिवाजी ने उसे अपने ऊपर ख़र्च नहीं किया। उन्होंने पास की मुरुंबदेव नाम की पहाड़ी पर नया किला बनवाया और उसका नाम रखा **राजगढ़**, राजा का किला। बरसों तक राजगढ़ ही उनका घर और राजधानी रहा।
अगर आप कभी राजगढ़ चढ़ें, तो समझ जाएँगे कि यह उन्हें इतना प्रिय क्यों था। पहाड़ी तीन लंबी भुजाओं में फैली है, और हर भुजा के सिरे पर एक किलेबंद चबूतरा है जिसे **माची** कहते हैं: पद्मावती, सुवेळा और संजीवनी। बीच में, सबसे ऊपर, भीतरी किला है, बालेकिल्ला। चोटी से सह्याद्रि की एक के बाद एक धारें दिखती हैं, और साफ़ दिन में आसपास के छोटे किले भी। यह ऐसा घर था जो अपने पूरे पड़ोस पर नज़र रख सकता था। जिजाबाई भी वहीं रहती थीं, और नए राज्य का रोज़ का बहुत-सा काम, पत्र, हिसाब, सुनवाइयाँ, उसी पहाड़ी पर होता था।
फिर इलाक़े के दूसरे किले भी आए। कुछ स्थानीय सरदारों से समझौते से, कुछ फुर्ती से। कोंढाणा, जो आगे चलकर सिंहगढ़ के नाम से मशहूर हुआ। पुरंदर। इन बरसों के उनके साथियों के नाम महाराष्ट्र का हर बच्चा जानता है। **तानाजी मालुसरे**, **येसाजी कंक**, **बाजी पासलकर**। किसानों के बेटे, अपनी ही पहाड़ियों के किले सँभालते हुए।
*[ठहराव]*
फिर एक कठिन परीक्षा आई, पर दूसरी तरह की।
1648 में बीजापुर के दरबार ने शिवाजी के पिता शहाजी को दूर दक्षिण में रोक लिया, हिरासत में ले लिया। परिवार की पूरी स्थिति अचानक ख़तरे में पड़ गई। बीजापुर की एक सेना पुरंदर की ओर भी आई, और शिवाजी के लोगों ने किला सँभाले रखा।
पर शिवाजी ने ग़ुस्से से जवाब नहीं दिया। वे अठारह साल के थे। कोई जल्दबाज़ी का क़दम उठा सकते थे। इसके बजाय उन्होंने धीरज और बातचीत का रास्ता चुना। उन्होंने उस समय दक्खन के सूबेदार, मुग़ल शहज़ादे मुराद बख़्श से संपर्क किया, ताकि बीजापुर शहाजी को नुक़सान पहुँचाने से पहले दस बार सोचे। दूसरे सरदारों ने भी शहाजी के पक्ष में बात की। 1649 में शहाजी छोड़ दिए गए।
और उसके बाद कई बरस तक शिवाजी शांत रहे। उन्होंने नए किले नहीं लिए। जो था उसे मज़बूत किया, अपनी ज़मीन और लोगों की देखभाल की, और प्रतीक्षा की। इतिहासकार सरकार और सरदेसाई, दोनों इस लंबे ठहराव की बात करते हैं। यह उनके स्वभाव के बारे में कुछ कहता है। हिम्मत सिर्फ़ आगे बढ़ने में नहीं होती। कभी-कभी वह रुककर टिके रहने में होती है, उन लोगों की ख़ातिर जो आप पर निर्भर हैं।
*[ठहराव]*
तो आज हमने जो सुना, उसे एक बार समेट लेते हैं।
परंपरा कहती है कि लगभग 1645 में, रायरेश्वर के छोटे-से शिव मंदिर में, शिवाजी और उनके मावल साथियों ने स्वराज्य के लिए काम करने का वचन दिया, और उस साल का एक पत्र रायरेश्वर देव की कृपा से राज्य बनने की बात करता है। उनके लिए स्वराज्य का अर्थ था पास का और न्यायपूर्ण राज: सहने लायक लगान, सुरक्षित खेत और सबके लिए एक-सा न्याय। किशोर शिवाजी ने रांझे के ताक़तवर पाटिल को सज़ा देकर इसे जल्दी ही साबित कर दिया। उनकी संस्कृत मुद्रा ने उनके राज की तुलना प्रतिपदा के चाँद से की, जो सबके कल्याण के लिए रोज़ बढ़ता है। तोरणा और राजगढ़ में वचन को पहला घर मिला। और जब पिता को रोका गया, तो उन्होंने जल्दबाज़ी के बजाय धीरज और बातचीत को चुना।
**आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए।** मुद्रा ने नया चाँद चुना, जो हर रात बस थोड़ा-सा बढ़ता है। कोई एक अच्छी आदत चुनिए जिसे आप काफ़ी समय से शुरू करना चाह रहे हैं। इस हफ़्ते रोज़ उसका एक छोटा-सा हिस्सा कीजिए, जितना छोटा चाहें, और उसे धीरे-धीरे बढ़ने दीजिए।
अगले एपिसोड में हम सह्याद्रि के किलों पर चढ़ेंगे, और फिर नीचे समुद्र तक उतरेंगे, यह देखने के लिए कि शिवाजी ने पहाड़ी किलों की एक पूरी शृंखला और एक नौसेना, दोनों कैसे खड़ी कीं।
*[मंदिर की घंटी। 2 सेकंड मौन।]*
**श्रेय (पढ़कर सुनाएँ):** जदुनाथ सरकार की "शिवाजी एंड हिज़ टाइम्स", गो. स. सरदेसाई की "न्यू हिस्ट्री ऑफ़ द मराठाज़", सभासद बखर और शिवाजी महाराज के प्रकाशित पत्रों के आधार पर DharmikStudio टीम द्वारा लिखित। AI स्वर में वाचन। कोई भूल हो तो इस एपिसोड पर "गलती बताएँ" का उपयोग करें।