पहाड़ों पर किले, समुद्र पर जहाज़

Episode 3 of 6 in छत्रपति शिवाजी महाराज: स्वराज्य की कहानी.

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नमस्कार। पिछली बार हम रायरेश्वर में उन नौजवान साथियों के साथ खड़े थे जिन्होंने स्वराज्य का वचन दिया, और हमने देखा कि उस वचन को तोरणा और राजगढ़ में पहला घर मिला। आज हम दो ऐसी चीज़ें देखेंगे जिन्हें शिवाजी ने बहुत सोच-समझकर बनाया। पहाड़ों पर किले, और समुद्र पर जहाज़।

*[ठहराव]*

पहले ज़मीन की बात। **सह्याद्रि**, यानी पश्चिमी घाट, महाराष्ट्र की पूरी लंबाई में एक दीवार की तरह खड़े हैं। चट्टान काली बेसाल्ट की है। पहाड़ सीधे खड़े उठते हैं, ऊपर से सपाट और किनारों पर खड़ी ढलान। बरसात में महीनों तक मूसलाधार पानी गिरता है, नाले नदियाँ बन जाते हैं, और रास्ते बादलों में खो जाते हैं।

कम पैसे और कम सिपाहियों वाले एक छोटे राज्य के लिए ये पहाड़ वरदान थे। ऐसी चोटी पर बना किला, जिसमें चट्टान काटकर पानी के टाँके बने हों और भीतर अनाज भरा हो, कुछ सौ लोग लंबे समय तक सँभाल सकते थे। और आसपास के गाँव जानते थे कि पास ही सुरक्षा की एक जगह है।

शिवाजी के बाद की एक पीढ़ी में, उनके एक मंत्री के परिवार से राजनीति पर एक मराठी ग्रंथ आया, **आज्ञापत्र**, जिसे 1716 में रामचंद्रपंत अमात्य ने लिखा। किलों वाले अध्याय का सार यह है कि पूरा राज्य किलों पर टिका है; किलों के बिना ज़मीन खुले मैदान जैसी है, जिस पर से कोई भी गुज़र जाए। शिवाजी के जीवन का यही सबक था, जिसे उनकी सेवा करने वालों ने लिख दिया।

उनके जीवन के अंत तक, वृत्तांत स्वराज्य के अधीन बहुत बड़ी संख्या में किले गिनाते हैं। जिनमें जीते हुए, मरम्मत किए हुए और नए बनाए, सब शामिल हैं। ठीक-ठीक गिनती हर वृत्तांत में अलग है।

*[ठहराव]*

पर किला उतना ही अच्छा होता है जितने अच्छे उसे चलाने वाले लोग। और यहाँ शिवाजी ने एक समझदार गृहस्थ की तरह सोचा।

सभासद बताते हैं कि हर किले पर तीन मुख्य अधिकारी होते थे। **हवालदार** किले का प्रमुख होता था। चाबियाँ उसके पास रहतीं, और सूरज डूबने पर दरवाज़े उसी की मौजूदगी में बंद होते और सूरज उगने पर खुलते। **सबनीस** हाज़िरी और हिसाब रखता था, कौन पहरे पर है, किसे वेतन मिला, क्या ख़र्च हुआ। **कारखानीस** भंडार सँभालता था, अनाज, चारा, बारूद, निर्माण का सामान।

अब समझदारी वाली बात सुनिए। ये तीनों, आम तौर पर, अलग-अलग पृष्ठभूमि और परिवारों से चुने जाते थे, ताकि सब एक ही गुट के न हों और आपस में मिलकर राज्य के ख़िलाफ़ न जा सकें। हर कोई दूसरों पर नज़र रखता था। किला किसी एक आदमी की मुट्ठी में नहीं था। और सिपाहियों को वेतन ख़ज़ाने से मिलता था, स्थानीय सरदार से नहीं, इसलिए उनकी वफ़ादारी किसी एक व्यक्ति से नहीं, स्वराज्य से जुड़ती थी। इस बारे में अगले एपिसोड में और सुनेंगे।

रात के पहरों के नियम थे, हर बरसात के बाद दीवारें जाँचने के नियम थे, भंडार में कितना अनाज हमेशा रहना चाहिए, इसके नियम थे। सुनने में साधारण लगता है। पर यही साधारण काम लोगों को सुरक्षित रखता था।

*[ठहराव]*

कुछ किले शिवाजी ने नए बनवाए। उनमें से एक था **प्रतापगढ़**, जो लगभग 1656 में कोंकण के ऊपर एक धार पर बना, और मंत्री मोरोपंत पिंगले ने उसका काम देखा। 1659 में प्रतापगढ़ के नीचे बीजापुर के सेनापति अफ़ज़ल ख़ान के साथ एक मुलाक़ात संघर्ष में बदल गई, और शिवाजी उससे उबर आए; बीजापुर की सेना जल्दी ही लौट गई। जो बात कम सुनाई जाती है, वह इसके बाद की है। अफ़ज़ल ख़ान को उसी जगह दफ़नाया गया, और उनकी क़ब्र आज भी किले के नीचे है। जो भी हुआ हो, दिवंगत के साथ सम्मान का व्यवहार होना चाहिए था।

एक और किला था **रायगढ़**। तब उसे रायरी कहते थे, और 1656 में वह स्वराज्य में आया। शिवाजी ने उसे अपनी राजधानी चुना, और उसे बड़े पैमाने पर फिर से बनाया गया। निर्माण का ज़िम्मा था **हिरोजी इंदुलकर** पर।

उनके बारे में एक प्यारी परंपरा है। काम पूरा हुआ तो शिवाजी ने पूछा कि उन्हें क्या इनाम चाहिए। हिरोजी ने न ज़मीन माँगी, न सोना। उन्होंने बस इतना माँगा कि किले पर बने जगदीश्वर मंदिर की एक सीढ़ी पर उनका नाम खुदे, जहाँ से राजा रोज़ गुज़रें। उनके नाम वाला एक शिलालेख आज भी वहाँ यात्रियों को दिखाया जाता है। बातचीत ठीक ऐसे हुई हो या न हुई हो, यह कहानी उस राज्य के बारे में एक सच्ची बात कहती है। सेवा अपने आप में सम्मान थी।

*[ठहराव]*

अब पहाड़ों से उतरकर समुद्र की ओर चलते हैं।

सह्याद्रि के नीचे **कोंकण** है। खाड़ियों, नदियों और छोटे बंदरगाहों वाला एक लंबा, पतला तट। शिवाजी के समय इस तट के आगे का समुद्र बहुत व्यस्त था। पुर्तगालियों के पास गोवा और दूसरी जगहें थीं। अंग्रेज़ बंबई आ चुके थे। डच तट के साथ व्यापार करते थे। और **जंजीरा के सिद्दी**, जो किनारे के पास एक द्वीप-किले में रहते थे, एक मज़बूत समुद्री ताक़त थे, जो पहले आदिलशाही दरबार की और बाद में मुग़लों की सेवा में रहे।

दक्खन के ज़मीनी शासकों ने समुद्र को ज़्यादातर दूसरों के भरोसे छोड़ रखा था। शिवाजी ने देखा कि यह भूल है। अगर तट आपका है पर उसके आगे का पानी नहीं, तो आपके अपने लोगों का नमक, चावल, लकड़ी और व्यापार किसी और की मर्ज़ी से ही आगे बढ़ेगा। आपके बंदरगाहों से निकलने वाले यात्री और व्यापारी बिना सुरक्षा के रहेंगे।

इसलिए लगभग **1657 से 1659** के बीच, आज के ठाणे के पास कल्याण और भिवंडी में, शिवाजी ने जहाज़ बनवाने शुरू किए। शुरू में उन्होंने इस काम के जानकार पुर्तगाली कारीगरों को रखा। बरसों में बेड़ा बढ़ता गया। बड़े जहाज़ थे जिन्हें **गुराब** कहते थे, और बहुत-से छोटे, तेज़ **गलबत**, जो चप्पू से भी चलते और पाल से भी, और कोंकण की उथली खाड़ियों में आसानी से घुस जाते।

नाविक ज़्यादातर तट के समुदायों से आए, कोळी, भंडारी और दूसरे, जो ज़िंदगी भर से समुद्र को जानते थे। स्रोत जिन सेनानायकों के नाम लेते हैं, उनमें **मायनाक भंडारी** और **दौलत ख़ान** हैं। नौसेना ऐसी जगह थी जहाँ पृष्ठभूमि से ज़्यादा हुनर की क़द्र थी।

*[ठहराव]*

फिर आए समुद्री किले।

**25 नवंबर 1664** को, दक्षिण कोंकण में मालवण के पास कुरटे नाम के एक छोटे चट्टानी द्वीप पर **सिंधुदुर्ग** की नींव रखी गई। सिंधु यानी समुद्र, दुर्ग यानी किला। कहते हैं कि हज़ारों कारीगरों को यह काम पूरा करने में लगभग तीन साल लगे, और नींव को सीसे से मज़बूत किया गया। भीतर, परंपरा चूने में दबे एक हाथ और एक पैर के निशान दिखाती है, जिन्हें शिवाजी का माना जाता है। आज भी किले की दीवारों के भीतर कुछ परिवार रहते हैं, और उसके पास के किनारे से मछुआरों की नावें आज भी निकलती हैं।

दूसरे समुद्री किले भी मज़बूत किए गए या नए बने। **विजयदुर्ग**, **सुवर्णदुर्ग**, जंजीरा के पास **पद्मदुर्ग**, और जीवन के आख़िरी बरसों में बंबई के पास **खांदेरी**। इनके साथ स्वराज्य अपने तट पर नज़र रख सकता था।

*[ठहराव]*

तो आज हमने जो सुना, उसे एक बार समेट लेते हैं।

सह्याद्रि के पहाड़ों ने शिवाजी को प्राकृतिक गढ़ दिए, और उनके मंत्री के परिवार के एक बाद के ग्रंथ ने कहा कि राज्य किलों पर टिका है। हर किले को तीन अधिकारी चलाते थे, हवालदार, सबनीस और कारखानीस, इस तरह चुने हुए कि सारी ताक़त किसी एक के पास न रहे, और सिपाहियों को वेतन राज्य देता था। रायगढ़ राजधानी बना, और परंपरा उसके निर्माता हिरोजी इंदुलकर को याद करती है, जिन्होंने बस एक सीढ़ी पर अपना नाम माँगा। और शिवाजी ने समुद्र की ओर रुख़ किया, लगभग 1657 से जहाज़ बनवाए और 1664 में सिंधुदुर्ग की नींव रखी, ताकि अपने लोगों के तट और व्यापार की रक्षा हो।

**आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए।** किला इसलिए सुरक्षित रहता था क्योंकि कोई हर शाम दरवाज़ा बंद करता था और हर हफ़्ते अनाज जाँचता था। अपने घर का कोई एक छोटा-सा रोज़ का काम चुनिए, ऐसा जिस पर किसी का ध्यान नहीं जाता, और इस हफ़्ते उसे पूरे मन से कीजिए। चुपचाप की गई देखभाल भी एक तरह की रक्षा है।

अगले एपिसोड में हम किलों से उतरकर खेतों और दफ़्तरों में चलेंगे, यह देखने के लिए कि शिवाजी महाराज अपना राज्य कैसे चलाते थे। वे अपने लोगों को वेतन कैसे देते थे, किसानों की रक्षा कैसे करते थे, और हर आस्था के साथ कैसा व्यवहार करते थे।

*[लहरें। 2 सेकंड मौन।]*

**श्रेय (पढ़कर सुनाएँ):** सभासद बखर, आज्ञापत्र, जदुनाथ सरकार की "शिवाजी एंड हिज़ टाइम्स", गो. स. सरदेसाई की "न्यू हिस्ट्री ऑफ़ द मराठाज़" और सुरेंद्रनाथ सेन की "द मिलिट्री सिस्टम ऑफ़ द मराठाज़" के आधार पर DharmikStudio टीम द्वारा लिखित। AI स्वर में वाचन। कोई भूल हो तो इस एपिसोड पर "गलती बताएँ" का उपयोग करें।

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