ऐसा राज्य जहाँ किसान की फ़सल सुरक्षित थी
Episode 4 of 6 in छत्रपति शिवाजी महाराज: स्वराज्य की कहानी.
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नमस्कार। पिछली बार हम सह्याद्रि के क़िलों पर चढ़े थे और फिर समंदर तक उतरे थे, जहाँ शिवाजी महाराज ने अपनी नौसेना खड़ी की। आज हम ज़मीन पर रहेंगे। खेतों में, दफ़्तरों में, सेना की छावनियों में। क़िले जीते भी जाते हैं और हाथ से निकल भी जाते हैं। स्वराज्य को जिस चीज़ ने टिकाए रखा, वह था उसे चलाने का ढंग। तो आज की बात है शासन-व्यवस्था की। शब्द सुनकर लगेगा कि बात रूखी होगी। पर यक़ीन मानिए, इसके भीतर की कहानियाँ बिल्कुल रूखी नहीं हैं।
*[ठहराव]*
शुरुआत एक सवाल से करते हैं, जिसका जवाब उस ज़माने के हर राजा को देना पड़ता था। अपने सैनिकों और अफ़सरों को वेतन कैसे दें?
सत्रहवीं सदी के दक्कन में इसका आम जवाब था ज़मीन। किसी सरदार को एक पूरा इलाक़ा **जागीर** या **मोकासा** के रूप में दे दिया जाता। वह उस इलाक़े का लगान वसूलता और उसी से अपनी फ़ौज पालता। तरीक़ा आसान था, पर ख़तरनाक भी। एक-दो पीढ़ी में सरदार उस इलाक़े को अपना समझने लगता। बेटे को सौंप देता। राजा की बात तभी मानता जब उसका मन होता। और उस इलाक़े के किसान के सिर पर दो मालिक हो जाते, जिनमें अक्सर पास वाला ज़्यादा सख़्त होता।
शिवाजी महाराज ने दूसरा रास्ता चुना। उनके जीवन पर सबसे पहली मराठी बखर **कृष्णाजी अनंत सभासद** ने 1697 में लिखी। सभासद बताते हैं कि महाराज सैनिकों को इलाक़े नहीं बाँटते थे। उन्हें ख़ज़ाने से, नक़द या अनाज में, तय शर्तों पर वेतन मिलता था। लगान राज्य के अपने अधिकारी वसूलते और राज्य के ख़ज़ाने में जमा करते। अपवाद भी थे, और इतिहासकारों ने उन्हें दर्ज किया है। पर दिशा साफ़ थी। सैनिक स्वराज्य की सेवा करता था, उसका कोई टुकड़ा उसकी मिल्कियत नहीं था।
*[ठहराव]*
अब ज़रा मावल की घाटियों के किसी किसान की नज़र से सोचिए। वह अपना हिस्सा राज्य के एक अधिकारी को देता था। उस अधिकारी को हिसाब रखना होता था, और ऊपर किसी को जवाब देना होता था। ज़मीन की नाप होती थी। सरकार और सरदेसाई दोनों लिखते हैं कि महाराज के एक वरिष्ठ मंत्री **अण्णाजी दत्तो** ने कोंकण और देश में ज़मीन की पैमाइश करवाई। एक तय लंबाई की छड़ी से खेत नापे गए, मिट्टी और फ़सल देखी गई, और उसी हिसाब से राज्य का हिस्सा तय हुआ। जिन किसानों के पास कुछ नहीं था, उन्हें बीज और बैलों के लिए मदद दी जा सकती थी, जिसे वे धीरे-धीरे लौटा सकते थे।
इसमें लड़ाई वाला रोमांच नहीं है। पर किसी भी किसान से पूछिए, तब भी और आज भी, कि उसे सरकार से क्या चाहिए। वह जानना चाहता है कि उसे कितना देना है। वह एक बार देना चाहता है। और फिर चैन से अपनी फ़सल उगाना चाहता है।
*[ठहराव]*
यहीं से हम एक चिट्ठी तक पहुँचते हैं। उस दौर के काग़ज़ों में यह मुझे सबसे प्यारी लगती है, क्योंकि इसमें राजा की अपनी आवाज़ सुनाई देती है।
1670 के दशक की शुरुआत में सेना का एक हिस्सा बरसात के दिनों में कोंकण के **चिपळूण** के पास ठहरा हुआ था। बरसात काटते सैनिक बेचैन हो जाते हैं, और बेचैन सैनिक आसपास के गाँवों पर बोझ बन सकते हैं। शिवाजी महाराज ने वहाँ के अधिकारियों को चिट्ठी लिखी। चिट्ठी लंबी है और बहुत व्यावहारिक। अनाज के भंडार की बात, चारे की बात, इस बात का ध्यान कि गोदाम में कहीं आग न लग जाए। और फिर बात आती है किसानों की।
अपने शब्दों में कहें तो महाराज ने लिखा, रैयत को तकलीफ़ मत देना। अनाज, घास, लकड़ी या भाजी चाहिए, तो बाज़ार के भाव से ख़रीदो। किसी किसान के खेत से ज़बरदस्ती भाजी का एक डंठल तक मत लेना। अगर तुमने बुरा बर्ताव किया, तो लोग कहेंगे कि तुमसे तो पहले आए मुग़ल सैनिक ही अच्छे थे, और यह हम सबके लिए शर्म की बात होगी।
*[ठहराव]*
सोचिए ज़रा। एक राजा, जिसने बरसों संघर्ष किया, जिसके पास क़िले थे, घोड़े थे, नौसेना थी, वह अपने अफ़सरों को भाजी की एक गड्डी के बारे में लिख रहा है। उन्हें एक सीधी-सी बात समझ आती थी। स्वराज्य तभी टिकेगा जब लोग उसे अपना मानेंगे। जिस किसान की फ़सल अपने ही सैनिक उजाड़ दें, उसे क्या फ़र्क़ पड़ेगा कि क़िले पर झंडा किसका है।
सभासद ने कूच करती सेना के नियम भी लिखे हैं। सैनिक किसी स्त्री को बंदी नहीं बनाएँगे, और छावनी में कड़ा अनुशासन रहेगा। ईमानदारी से यह भी कहना चाहिए कि उस सदी में युद्ध हर जगह आम लोगों पर भारी पड़ता था, और शिवाजी के अभियान भी इससे अलग नहीं थे। पर जो नियम उन्होंने बनाए, वे अपने समय में असाधारण थे, और लोगों को याद रहे।
*[ठहराव]*
अपनी ही सेवा में कोई प्रजा के साथ अन्याय करता, तो महाराज देर नहीं लगाते थे। उनके शुरुआती दौर का एक काग़ज़ मिलता है, पुणे के पास के **रांझे** गाँव के पाटील के बारे में। उस आदमी ने गाँव की एक स्त्री के साथ अन्याय किया था। युवा शिवाजी ने उसे बुलवाया, मामला सुना, उसे कड़ी सज़ा दी और पद से हटा दिया। हर गाँव के मुखिया के लिए संदेश साफ़ था। स्वराज्य में अधिकार एक ज़िम्मेदारी है, मनमानी की छूट नहीं।
*[ठहराव]*
अब कहानी का वह हिस्सा, जिसे अक्सर एक तरफ़ या दूसरी तरफ़ खींचकर ग़लत सुनाया जाता है। इसलिए यहाँ हम काग़ज़ों के पास ही रहेंगे।
शिवाजी महाराज गहरे आस्थावान थे। वे तुळजापुर की भवानी माँ की उपासना करते थे और महाराष्ट्र के संतों का आदर करते थे। साथ ही वे दूसरों की आस्था का भी सम्मान करते थे, और यह हमें उन लोगों से पता चलता है जिनके पास उनकी तारीफ़ करने की कोई वजह नहीं थी।
**ख़ाफ़ी ख़ान** मुग़ल पक्ष के इतिहासकार थे। वे शिवाजी के प्रशंसक नहीं थे, कई जगह उनके बारे में कड़े शब्दों में लिखते हैं। फिर भी उन्होंने यह बात दर्ज की, और जदुनाथ सरकार उसे उद्धृत करते हैं। ख़ाफ़ी ख़ान के अनुसार शिवाजी का नियम था कि उनके लोग जहाँ भी जाएँ, किसी मस्जिद को, ख़ुदा की किताब को, या किसी भी स्त्री को कोई हानि न पहुँचाएँ। जब कभी पवित्र **क़ुरान** की कोई प्रति उनके हाथ आती, वे उसे आदर से रखते और अपने किसी मुस्लिम साथी को सौंप देते।
हम यह भी जानते हैं कि मुसलमान उनकी सेवा में भरोसे के पदों पर थे। **सिद्दी हिलाल** घुड़सवार सेना के सरदार थे। **दौलत ख़ान** उनकी नौसेना के एक सेनापति थे। **इब्राहीम ख़ान** और **क़ाज़ी हैदर** के नाम भी उनकी सेवा में दर्ज हैं। मंदिरों को दिए गए दान के काग़ज़ मिलते हैं, और कोंकण में केळशी के सूफ़ी संत **बाबा याक़ूत** की दरगाह को दी गई सनद का भी ज़िक्र मिलता है।
और एक चिट्ठी है, जो 1679 में मुग़ल बादशाह **औरंगज़ेब** को भेजी गई थी, उस समय नए लगाए गए जज़िया कर के विरोध में। जदुनाथ सरकार मानते थे कि यह शिवाजी की ओर से लिखी गई। कुछ इतिहासकारों ने इस पर सवाल उठाए हैं, इसलिए हम इसे उसी सावधानी से सुना रहे हैं। चिट्ठी की मूल बात सीधी है। ईश्वर सब लोगों का स्वामी है, किसी एक समूह का नहीं। जो शासक ईश्वर की जगह बैठा है, उसे अपनी सारी प्रजा को एक नज़र से देखना चाहिए।
यही बात, कि राजा हर प्रजाजन को एक ही नज़र से देखे, आज की हर कहानी में दिखाई देती है।
*[ठहराव]*
तो आइए, आज की बातें समेट लें।
शिवाजी महाराज ने सैनिकों और अधिकारियों को ख़ज़ाने से वेतन दिया, ताकि कोई अफ़सर किसी इलाक़े को अपनी जागीर न बना ले। उनके मंत्रियों ने ज़मीन नापी और किसान का हिस्सा न्याय से तय किया। उन्होंने अपने अधिकारियों को लिखा कि किसान से ज़बरदस्ती भाजी का एक डंठल भी न लिया जाए। अपनी ही सेवा में अधिकार का ग़लत इस्तेमाल करने वालों को उन्होंने सज़ा दी। और दूसरे पक्ष के इतिहासकार तक ने लिखा कि वे मस्जिद, क़ुरान और हर स्त्री का सम्मान करते थे, और मुस्लिम अधिकारियों को ऊँचे पदों पर भरोसे से रखते थे।
**आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए।** शिवाजी महाराज को उस छोटी-सी चीज़ की भी चिंता थी जो कोई सैनिक किसान से ले सकता था। इस हफ़्ते ग़ौर कीजिए कि आप बिना सोचे किसी से क्या ले लेते हैं। उनका समय, उनका धीरज, कोई जगह, किसी काम का श्रेय। उनमें से कोई एक चीज़ लौटा दीजिए।
अगले एपिसोड में शिवाजी महाराज आगरा के मुग़ल दरबार में जाएँगे, और वहाँ पाएँगे कि कभी-कभी साहस की सबसे कठिन परीक्षा चुपचाप इंतज़ार करना होती है।
**श्रेय (पढ़कर सुनाएँ):** सभासद बखर, शिवाजी महाराज के प्रकाशित पत्र, जदुनाथ सरकार और गो. स. सरदेसाई के इतिहास, और सरकार द्वारा उद्धृत ख़ाफ़ी ख़ान के विवरण के आधार पर DharmikStudio टीम द्वारा लिखित। AI स्वर में वाचन। कोई भूल हो तो इस एपिसोड पर "गलती बताएँ" का उपयोग करें।