आगरा, और घर की लंबी राह
Episode 5 of 6 in छत्रपति शिवाजी महाराज: स्वराज्य की कहानी.
Narrated with an AI voice.
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नमस्कार। पिछली बार हमने देखा कि शिवाजी महाराज अपना राज्य कैसे चलाते थे, किसान की भाजी की क्यारी तक का ध्यान रखकर। आज हम दक्कन से बहुत दूर चलेंगे। उत्तर की ओर, मुग़लों की राजधानी **आगरा**। इस कहानी में कोई युद्ध नहीं है। यह कहानी है मान-सम्मान की, धीरज की, और घर से दूर, बंधन में रहते हुए भी दिमाग़ ठंडा रखने की।
*[ठहराव]*
पहले यह जानें कि वे आगरा जा क्यों रहे थे।
1665 में बादशाह **औरंगज़ेब** ने अपने सबसे योग्य सेनापतियों में से एक को दक्कन भेजा। ये थे आमेर के **मिर्ज़ा राजा जयसिंह**, अनुभवी योद्धा और बहुत सधे हुए कूटनीतिज्ञ। उनके अभियान ने मराठा क़िलों पर भारी दबाव डाला, और **पुरंदर** का क़िला घेरे में आ गया। शिवाजी महाराज ने समझा कि सब कुछ खो देने से बेहतर है समझौता कर लेना। जून 1665 में दोनों मिले और **पुरंदर की संधि** हुई। शिवाजी ने तेईस क़िले सौंप दिए और बारह अपने पास रखे। उनके बेटे **संभाजी** को, जो तब मुश्किल से आठ बरस के थे, मुग़ल सेवा में एक मनसब दिया गया। फिर जयसिंह ने ज़ोर दिया कि शिवाजी ख़ुद आगरा जाकर बादशाह से मिलें। उन्होंने भरोसा दिलाया कि वहाँ पूरा सम्मान मिलेगा, और दरबार में मौजूद अपने बेटे **राम सिंह** से कहा कि वे उनकी देखभाल करें।
फ़ैसला आसान नहीं था। उत्तर जाने का मतलब था ख़ुद को बादशाह के हाथों में सौंप देना। पर जयसिंह ने वचन दिया था, और यह उम्मीद भी थी कि दरबार में कोई समझौता हो जाए तो दक्कन को कुछ शांति मिले। मार्च 1666 में शिवाजी छोटे संभाजी और कुछ साथियों के साथ राजगढ़ से निकले। जाने से पहले उन्होंने राज्य अपनी माँ **जिजाबाई** को सौंपा, और उनके साथ भरोसेमंद मंत्रियों को रखा।
*[ठहराव]*
मई में वे आगरा पहुँचे। 12 मई 1666 को उन्हें दरबार में लाया गया। वह बड़ा दिन था, बादशाह की सालगिरह का जश्न, और दरबार अमीरों से भरा था, हर कोई अपनी तय जगह पर।
उस दिन क्या हुआ, इसका हमारे पास काफ़ी पास का ब्योरा है, क्योंकि दरबार में मौजूद राजपूत अधिकारी जयपुर को चिट्ठियाँ भेजते थे, और सरकार ने उनका उपयोग किया। शिवाजी आगे आए और नज़राना पेश किया। फिर उन्हें पीछे ले जाकर पाँच हज़ारी मनसबदारों की पंक्ति में खड़ा कर दिया गया, ऐसे लोगों के पीछे जिन्हें वे अपने से छोटा मानते थे। किसी ने उनसे बात नहीं की। वे सैकड़ों कोस चलकर सम्मान के वचन पर आए थे, और उन्हें लगा कि उन्हें उनकी "औक़ात" दिखाई जा रही है।
वे चुप नहीं रहे। उन्होंने राम सिंह से नाराज़ होकर ऊँची आवाज़ में बात की, तख़्त की ओर पीठ कर ली और पंक्ति से हट गए। कुछ विवरण कहते हैं कि गर्मी और मन के आवेग से वे मूर्छित हो गए, कुछ कहते हैं कि उन्होंने बस वहाँ खड़े होने से इनकार कर दिया। जो भी हुआ हो, दरबार ने वह देखा जिसकी उसे उम्मीद नहीं थी। दक्कन से आए एक मेहमान ने दी गई जगह स्वीकार करने से मना कर दिया था।
*[ठहराव]*
नतीजा जल्दी सामने आया। उन्हें फिर दरबार में आने नहीं दिया गया। राम सिंह के डेरे के पास एक मकान में ठहराया गया, और शहर के कोतवाल **फ़ौलाद ख़ान** की देखरेख में चारों ओर बड़ा पहरा बिठा दिया गया। लगभग तीन महीने तक वे, सीधे शब्दों में, ऐसे बंदी रहे जिन्हें अदब से मेहमान कहा जाता था।
कहानी का यह हिस्सा मुझे सबसे ज़्यादा छूता है, क्योंकि इसमें उनका वह रूप दिखता है जिसकी हम कम बात करते हैं। जिस आदमी की ज़िंदगी पहाड़ों में घोड़े की पीठ पर बीती थी, उसे अब एक बंद मकान में बैठकर इंतज़ार करना था। उन्होंने अर्ज़ियाँ लिखीं। घर लौटने की इजाज़त माँगी। अपने ज़्यादातर लोगों को थोड़े-थोड़े करके दक्कन वापस भेज दिया, ताकि कम लोग ख़तरे में रहें। और वे शांत रहे।
इस हिस्से में **राम सिंह** को भी याद करना चाहिए। वे बादशाह के अधिकारी थे, पर उनके पिता ने शिवाजी को वचन दिया था। दरबार की चिट्ठियों में वे दोनों के बीच फँसे दिखते हैं, और कुछ समय तक उन्होंने अपने मेहमान के अच्छे आचरण की ज़मानत भी ली। जब वचन निभाना असुविधाजनक हो जाए, तब भी उसे निभाना अपने आप में एक तरह का साहस है, और उन हफ़्तों में राजपूत राजकुमार ने वह साहस दिखाया।
*[ठहराव]*
फिर वे बीमार पड़ गए, या उन्होंने ऐसा कहा। बखरें बताती हैं कि ठीक होने की ख़ुशी में, और आशीर्वाद के लिए, वे रोज़ शहर के साधुओं, ब्राह्मणों और फ़क़ीरों को मिठाई के बड़े-बड़े टोकरे भेजने लगे। कहार उन टोकरों को बाँस पर लटकाकर ले जाते। शुरू में पहरेदार उन्हें खोलकर देखते थे। कुछ दिनों में उन्हें आदत हो गई, और वे बिना देखे जाने देने लगे।
अगस्त 1666 की एक शाम शिवाजी और संभाजी उन्हीं में से दो टोकरों में छिपकर मकान से निकल गए। सभासद इसी तरह बताते हैं, और सरकार इस ढाँचे को मानते हैं। पीछे, **हिरोजी फ़र्ज़ंद** शिवाजी के पलंग पर चादर ओढ़कर लेटे रहे, बस हाथ और उसमें शिवाजी की अँगूठी बाहर दिखती रही। **मदारी मेहतर** नाम का एक किशोर सेवक पास बैठकर उनके पैर दबाता रहा, जैसे बीमार मालिक के पैर दबाए जाते हैं। पहरेदारों ने झाँका तो सब सामान्य लगा। कुछ घंटे बाद हिरोजी और वह लड़का यह कहकर बाहर निकल आए कि मालिक सो रहे हैं, उन्हें कोई न जगाए। जब तक किसी ने ठीक से देखा, कमरा ख़ाली था।
*[ठहराव]*
अब घर की राह। सैकड़ों कोस का रास्ता, और पूरा साम्राज्य उन्हें ढूँढ रहा था।
वे सीधे दक्षिण नहीं गए, जहाँ उनकी तलाश सबसे पहले होती। पहले वे **मथुरा** की ओर गए। संभाजी इतने छोटे थे कि भेस बदलकर तेज़ और कठिन सफ़र नहीं कर सकते थे। इसलिए शिवाजी ने उन्हें वहाँ एक भरोसेमंद ब्राह्मण परिवार के पास छोड़ दिया, जो उनके मंत्री मोरोपंत पिंगळे के रिश्तेदार थे, और जिन्होंने बालक को सुरक्षित रखा और बाद में घर पहुँचाया। फिर शिवाजी कुछ साथियों के साथ रमते साधुओं के भेस में, चेहरे पर भस्म मलकर, उन रास्तों से चले जिन पर तीर्थयात्री चलते थे। रास्ते को लेकर बखरें एकमत नहीं हैं। कुछ कहती हैं कि वे पूरब में प्रयाग और काशी तक गए और फिर दक्षिण मुड़े।
सितंबर में, या कुछ विवरणों के अनुसार साल के आख़िर में, वे **राजगढ़** पहुँचे। महाराष्ट्र में यह प्रसंग बड़े प्रेम से सुनाया जाता है। एक थका-हारा साधु द्वार पर आया और राजमाता से मिलने की विनती की। जिजाबाई ने उसे देखा और पहचान न सकीं। फिर उसने झुककर अपना सिर उनके चरणों पर रख दिया, और माँ ने अपने बेटे को पहचान लिया। हर बात ठीक ऐसे ही हुई थी या नहीं, हम नहीं कह सकते। पर इसका भाव सच्चा है। एक माँ महीनों से राह देख रही थी, यह जाने बिना कि बेटे को फिर देख पाएगी या नहीं।
*[ठहराव]*
तो आइए, आज की बातें समेट लें।
पुरंदर की संधि के बाद शिवाजी महाराज सम्मान के वचन पर आगरा गए। दरबार में उन्हें उनके दर्जे से नीचे खड़ा किया गया, और उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। लगभग तीन महीने वे पहरे में रहे, और धीरज और सूझबूझ नहीं छोड़ी। बखरों के अनुसार वे मिठाई के टोकरों में छिपकर निकले, संभाजी को मथुरा में सुरक्षित छोड़ा, और भेस बदलकर घर की ओर चले, जब तक कि एक दिन माँ ने अपने द्वार पर खड़े साधु में अपना बेटा नहीं पा लिया।
**आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए।** आगरा में शिवाजी अपनी ताक़त का इस्तेमाल नहीं कर सकते थे। उन्होंने धीरज से काम लिया, और धीरे-धीरे बनाई गई योजना से। अगली बार जब आप ख़ुद को किसी ऐसी जगह फँसा महसूस करें जहाँ से निकलना मुश्किल लगे, तो रोज़ बाहर निकलने की दिशा में एक छोटा, स्थिर क़दम उठाइए। छोटे क़दम जुड़ते जाते हैं।
हमारे आख़िरी एपिसोड में हम रायगढ़ चलेंगे, जहाँ 1674 में शिवाजी महाराज का छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक हुआ, और देखेंगे कि वे अपने पीछे क्या छोड़ गए।
**श्रेय (पढ़कर सुनाएँ):** सभासद बखर, जेधे शकावली, आगरा दरबार की राजस्थानी चिट्ठियाँ, और जदुनाथ सरकार व गो. स. सरदेसाई के इतिहास के आधार पर DharmikStudio टीम द्वारा लिखित। AI स्वर में वाचन। कोई भूल हो तो इस एपिसोड पर "गलती बताएँ" का उपयोग करें।