रायगढ़ का राज्याभिषेक, और जो विरासत रह गई
Episode 6 of 6 in छत्रपति शिवाजी महाराज: स्वराज्य की कहानी.
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नमस्कार। पिछली बार शिवाजी महाराज साधु के भेस में आगरा से पैदल घर लौटे थे। आज, हमारे आख़िरी एपिसोड में, हम **रायगढ़** चलते हैं। सह्याद्रि की एक बड़ी, सपाट चोटी वाली पहाड़ी, जिसके लगभग हर तरफ़ खड़ी चट्टानें हैं। 1674 की गर्मियों में यहाँ भारी भीड़ थी। मेहमान, पंडित, सैनिक, दूसरे राज्यों के दूत, सब एक ही समारोह के लिए आए थे। और फिर हम उस सवाल के पास बैठेंगे जिस पर ऐसी हर कथा-माला ख़त्म होनी चाहिए। वे हमारे लिए क्या छोड़ गए?
*[ठहराव]*
पहले यह, कि राज्याभिषेक की ज़रूरत ही क्यों थी?
1674 तक शिवाजी को स्वराज्य खड़ा करते लगभग तीस बरस हो चुके थे। क़िले थे, नौसेना थी, ख़ज़ाना था, सेना थी। फिर भी आसपास की दुनिया की नज़र में, काग़ज़ पर, वे अब भी एक बाग़ी थे। बीजापुर के सुल्तान और मुग़ल बादशाह उन्हें ऐसा ज़मींदार कह सकते थे जो अपनी हद से आगे बढ़ गया। संधियों और पत्रों के पीछे किसी संप्रभु राजा का नाम चाहिए था। अपनी प्रजा को, और उनकी सेवा करने वाले अधिकारियों को भी, यह भरोसा चाहिए था कि जिस राज्य की वे सेवा करते हैं वह सचमुच एक राज्य है, जिसका राजा विधिवत अभिषिक्त है और जिसे कोई स्थानीय सरदार कहकर टाल नहीं सकता। राज्याभिषेक ने यह सवाल हमेशा के लिए सुलझा दिया।
परंपरा का प्रश्न भी था। उस इलाक़े में लंबे समय से किसी राजा का वैदिक विधि से अभिषेक नहीं हुआ था। शिवाजी ने काशी से एक बड़े विद्वान को बुलाया, **गागाभट्ट**, जिनका धर्मशास्त्र का ज्ञान पूरे भारत में जाना जाता था। गागाभट्ट ने विषय की जाँच की, शिवाजी के कुल को क्षत्रिय माना, और अभिषेक कराने को तैयार हुए।
*[ठहराव]*
समारोह कई दिन चले। पहले शिवाजी भवानी माँ की पूजा के लिए प्रतापगढ़ गए। रायगढ़ पर उनका यज्ञोपवीत संस्कार हुआ, और उन्हें सोने और दूसरी वस्तुओं से तौला गया, जो बाद में दान कर दी गईं। और 6 जून 1674 को, ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी के दिन, पवित्र नदियों के जल से उनका अभिषेक हुआ और वे सिंहासन पर बैठे। उन्होंने **छत्रपति** की उपाधि धारण की, यानी राजछत्र के स्वामी। उसी दिन से एक नया संवत गिना जाने लगा, **राज्याभिषेक शक**।
इस समारोह का एक बाहरी गवाह भी है। अंग्रेज़ों की ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंबई से अपने दूत **हेनरी ऑक्सेंडन** को एक व्यापारिक समझौते के लिए भेजा था। वे दरबार में मौजूद थे, और उन्होंने अपनी डायरी में सिंहासन, उपहारों और भीड़ के बारे में लिखा। वे एक विदेशी व्यापारी थे, जिन्हें मराठों के गौरव से कुछ लेना-देना नहीं था, इसीलिए इतिहासकारों के लिए उनका ब्योरा काम का है।
*[ठहराव]*
राज्याभिषेक एक दिन की बात होती है। उसे महत्त्वपूर्ण बनाया उसके साथ आई चीज़ों ने।
शिवाजी ने अपने आठ मंत्रियों के मंडल, **अष्टप्रधान**, को विधिवत पदनाम और ज़िम्मेदारियाँ दीं। पेशवा अब मुख्य प्रधान कहलाए। राजस्व और हिसाब के लिए अमात्य थे, पत्र-व्यवहार के लिए सचिव, राजा के रोज़ के कामों के लिए मंत्री, सेना के लिए सेनापति, दूसरे राज्यों से संबंधों के लिए सुमंत, न्याय के लिए **न्यायाधीश**, और धर्म-कार्य और दान के लिए पंडितराव। हर एक का अपना काम था। सब कुछ किसी एक के हाथ में नहीं था। यह वही सोच है जो हमने तीसरे एपिसोड में क़िलों में देखी थी, जहाँ सारी चाबियाँ किसी एक अधिकारी के पास नहीं होती थीं।
उन्होंने भाषा पर भी ध्यान दिया। सदियों से दक्कन के दरबारों में पदों और काग़ज़ात के लिए फ़ारसी शब्द चलते थे। शिवाजी ने एक विद्वान, **रघुनाथ पंडित**, से संस्कृत और मराठी में शासन के शब्दों का एक कोश तैयार करवाया, **राज्यव्यवहार कोश**। यह किसी को नकारना नहीं था। यह कहने का एक तरीक़ा था कि इस धरती के लोग अपना कामकाज अपने शब्दों में चला सकते हैं। उनके नाम से सोने का सिक्का, होन, और ताँबे का सिक्का, **शिवराई**, ढाले गए।
*[ठहराव]*
और फिर, एक विदाई। **जिजाबाई** ने यह दिन देख लिया था। उन्होंने उजड़े हुए पुणे में राम और पांडवों की कहानियाँ सुनाकर बेटे को बड़ा किया था, और जब वह आगरा में था तब उसके राज्य की देखरेख की थी। राज्याभिषेक के लगभग बारह दिन बाद, 17 जून 1674 को, रायगढ़ की तलहटी में पाचाड में उनका देहांत हो गया। महाराष्ट्र में यह कथा सुनाने वाले अक्सर कहते हैं कि वे बस इसी दिन की राह देख रही थीं। हम इसे इन शब्दों में कहें या न कहें, मन भर आता है। स्वराज्य की पहली गुरु ने उसका अभिषेक देखा, और फिर विदा ले ली।
उसी साल सितंबर में एक दूसरा, छोटा अभिषेक भी हुआ, तांत्रिक आचार्य **निश्चलपुरी** के हाथों, जिन्हें लगा था कि कुछ विधियाँ छूट गई थीं। इतिहासकार दोनों समारोहों को दर्ज करते हैं।
*[ठहराव]*
आख़िरी बरस व्यस्त रहे। 1677 में शिवाजी ने दक्षिण में जिंजी और वेल्लोर की ओर एक लंबा अभियान चलाया, जिससे बड़े इलाक़े मराठा शासन में आए, और तंजावुर में राज करने वाले उनके सौतेले भाई **व्यंकोजी** से कठिन बातचीत भी हुई। यह अभियान जितना हथियारों का था, उतना ही कूटनीति का भी। उसकी बारीकियाँ किसी और दिन।
वे रायगढ़ लौटे, और 1680 के वसंत में उन्हें तेज़ बुख़ार हुआ। 3 अप्रैल 1680 को शिवाजी महाराज ने रायगढ़ पर देह त्याग दी। उनकी उम्र लगभग पचास बरस थी। उनकी समाधि आज भी क़िले पर है, और लोग आज भी लंबी सीढ़ियाँ चढ़कर वहाँ शीश नवाने जाते हैं।
*[ठहराव]*
उनके बाद बहुत समय तक उनकी याद ज़्यादातर गाँवों में ज़िंदा रही, **शाहीरों** के गीतों में। ये घूमते लोक-गायक मेलों और उत्सवों में उन पर पोवाड़े गाते थे। 1869 में समाज-सुधारक **ज्योतिराव फुले** ने शिवाजी पर एक लंबा पोवाड़ा लिखा, और उन्हें किसानों और आम लोगों का राजा कहा। कुछ बरस बाद, 1890 के दशक में, **लोकमान्य तिलक** ने शिवजयंती के सार्वजनिक उत्सव और रायगढ़ पर उनकी समाधि के जीर्णोद्धार की शुरुआत में बड़ी भूमिका निभाई। आज महाराष्ट्र के बच्चे दिवाली पर मिट्टी के क़िले बनाते हैं, परिवार छुट्टियों में रायगढ़ और शिवनेरी चढ़ते हैं, और हवाई अड्डों, स्टेशनों और विश्वविद्यालयों पर उनका नाम है। हर पीढ़ी ने उनमें वह पाया जिसकी उसे ज़रूरत थी। किसान ने ऐसा राजा पाया जो उसके खेत की रक्षा करता था। सुधारक ने आम लोगों का शासक पाया। और आज का विद्यार्थी उनमें साहस पाता है।
*[ठहराव]*
तो वे क्या छोड़ गए?
एक राज्य, बेशक, जो उनके बाद भी टिका रहा। बहुत कठिन बरसों के बाद वह ऐसी शक्ति बना जिसने अगली पूरी सदी तक भारत की दिशा तय की। पर अगर आप इससे पहले के पाँच एपिसोड फिर से याद करें, तो मुझे लगता है जवाब इससे कहीं शांत मिलेगा।
वे शासन करने का एक ढंग छोड़ गए। सैनिकों को राज्य से वेतन, ताकि कोई इलाक़ा किसी की निजी जागीर न बने। ज़मीन की नाप, और किसान का हिस्सा तय। अधिकारियों को चिट्ठी, कि ज़बरदस्ती भाजी का एक डंठल भी न लिया जाए। हर आस्था के पूजा-स्थल सुरक्षित, जैसा दूसरे पक्ष के इतिहासकार तक ने लिखा। आठ मंत्रियों में बँटी ज़िम्मेदारियाँ। शासन के शब्द जनता की अपनी भाषा में। और इस सबके पीछे, पुणे में एक माँ, जो एक बालक को सिखा रही थी कि राजा अपनी प्रजा के लिए होता है।
**आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए।** शिवाजी महाराज को उनके साहस के लिए याद किया जाता है। पर जो उन्होंने बनाया, वह छोटी-छोटी बातों में न्याय की वजह से टिका। इस हफ़्ते घर या काम की अपनी कोई एक छोटी ज़िम्मेदारी लीजिए, और उसे ज़रूरत से थोड़ा ज़्यादा न्याय के साथ निभाइए। घर में स्वराज्य ऐसे ही शुरू होता है।
यहाँ हमारी यह कथा-माला पूरी होती है। छहों बैठकों में हमारे साथ सुनने के लिए धन्यवाद। अगर कहानी का कोई हिस्सा आपके मन को छू गया हो, तो उसे अपने परिवार के किसी बच्चे को, अपने शब्दों में सुनाइए। ये कहानियाँ हमेशा ऐसे ही आगे बढ़ती आई हैं।
**श्रेय (पढ़कर सुनाएँ):** सभासद बखर, जेधे शकावली, हेनरी ऑक्सेंडन की डायरी सहित अंग्रेज़ी फ़ैक्टरी रिकॉर्ड, और जदुनाथ सरकार व गो. स. सरदेसाई के इतिहास के आधार पर DharmikStudio टीम द्वारा लिखित। AI स्वर में वाचन। कोई भूल हो तो इस एपिसोड पर "गलती बताएँ" का उपयोग करें।