छठ के घाट की एक शाम
Episode 3 of 4 in कार्तिक की कथाएँ: दीयों के महीने की कहानियाँ.
Narrated with an AI voice.
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- DharmikStudio Originals
- Narration
- AI voice
In this episode
- छठ 13 से 16 नवंबर तक है; संध्या अर्घ्य 15 तारीख़ को है।
- छठ लोक परंपरा है, जो माँओं और गीतों से आगे बढ़ती है।
- अर्घ्य डूबते सूर्य को और फिर सूर्योदय पर दिया जाता है।
Read along
नमस्ते। यह है कार्तिक की कथाएँ। आज रात कोई एक कथा नहीं है। एक नदी का किनारा है, और उस पर पूरा परिवार।
छठ लोक पर्व है। यह बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई का है, और हर उस शहर का जहाँ अब वहाँ के परिवार रहते हैं। इसके चरण किसी एक पुस्तक में नहीं लिखे। माँएँ बेटियों को सिखाती हैं, और बाकी गीत आगे ले जाते हैं। सूर्य की उपासना बहुत पुरानी है, और ऋग्वेद में सूर्य के सूक्त हैं। छठ में सूर्यदेव के साथ छठी मैया की पूजा होती है।
इस साल छठ शुक्रवार 13 नवंबर से सोमवार 16 नवंबर तक है। संध्या अर्घ्य रविवार 15 नवंबर को है।
*[ठहराव]*
उस रविवार की दोपहर सोचिए। व्रती ने पिछली शाम से कुछ खाया-पिया नहीं है। बेटा या भाई बाँस का दउरा सिर पर उठाता है। उसमें सूप हैं, ठेकुआ, केले, गन्ने, नारियल और सिंघाड़े से भरे। पूरा परिवार घाट की ओर चलता है, और महिलाएँ गाने लगती हैं। एक बहुत पुराना गीत ऐसे शुरू होता है: काँच ही बाँस के बहँगिया, बहँगी लचकत जाए। बाँस की बहँगी हरी और ताज़ी है, और बोझ से लचकती जाती है।
पानी पर पहुँचकर व्रती पानी में उतरते हैं, डूबते सूर्य की ओर मुख करते हैं, और सूप ऊपर उठाते हैं। एक-एक करके परिवार के लोग लोटे से जल या दूध सूप पर से सूर्य की ओर अर्पित करते हैं। कोई जल्दी नहीं करता।
*[ठहराव]*
अगले दिन भोर से पहले सब लौटते हैं, और उगते सूर्य के लिए यही करते हैं। फिर व्रती प्रसाद बाँटते हैं, और व्रत पूरा होता है।
अगर आप छठ रख रहे हैं, तो अपना ध्यान रखिए। बुज़ुर्ग, अस्वस्थ, गर्भवती, मधुमेह वाले या दवा लेने वाले पहले डॉक्टर से बात करें। पानी में वहीं तक जाएँ जहाँ खड़े हो सकें, और बच्चों को पास रखें। नमस्ते।