वह नगरी जिसे कभी छोड़ा नहीं जाता
Episode 1 of 10 in काशी विश्वनाथ: प्रकाश की नगरी.
Narrated with an AI voice.
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- DharmikStudio Originals
- Temple or tirtha
- Kashi Vishwanath Temple
- Narration
- AI voice
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नमस्कार। शुरू करने से पहले, हमारे साथ एक गहरी साँस लीजिए। नाक से धीरे-धीरे भीतर। और फिर आराम से बाहर।
यह काशी विश्वनाथ पर हमारी कथा-माला की पहली बैठक है। आने वाली बैठकों में हम धरती की सबसे पुरानी जीवित नगरियों में से एक में चलेंगे, और उसके हृदय में बसे मंदिर तक पहुँचेंगे। हम गंगा के घाट पर उतरेंगे, मंदिर के आस-पास बसे काशी के परिवार से मिलेंगे, सुनेंगे कि यह भवन आज जैसा है वैसा कैसे बना, और एक पूरा दिन मंदिर के भीतर बिताएँगे। आज हम एक ही प्रश्न से शुरुआत करते हैं। कहते हैं कि शिव काशी को कभी नहीं छोड़ते। यह बात आई कहाँ से?
पहले ग्रंथों की ओर चलते हैं।
स्कन्द पुराण का एक पूरा भाग केवल इसी नगरी के लिए है। उसे काशी खण्ड कहते हैं। उसमें काशी के कई नाम आते हैं। एक नाम है आनन्दवन, यानी आनंद का वन। एक नाम है वाराणसी, क्योंकि यह नगरी दो छोटी नदियों के बीच बसी है, उत्तर में वरुणा और दक्षिण में असि। पर आज जिस नाम की बात हमें करनी है, वह थोड़ा शांत-सा नाम है। काशी खण्ड इस धरती को अविमुक्त कहता है।
उस नाम को खोलने से पहले, काशी शब्द के बारे में एक बात। अक्सर कहा जाता है कि काशी शब्द एक ऐसी धातु से बना है जिसका अर्थ है चमकना, प्रकाशित होना। इसीलिए काशी को प्रकाश की नगरी कहा जाता है, और हमारी कथा-माला का नाम भी यही है। रोज़ की बोलचाल में ज़्यादातर लोग बनारस कहते हैं। घाट पर एक ही बातचीत में आपको काशी, वाराणसी और बनारस, तीनों नाम सुनने को मिल जाएँगे। किसी को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। तीनों एक ही प्यारी नगरी के नाम हैं।
मुक्त का अर्थ है छोड़ा हुआ। अविमुक्त का अर्थ है वह स्थान जिसे कभी छोड़ा न जाए। पुराण कहता है कि शिव और पार्वती इस भूमि को एक क्षण के लिए भी नहीं छोड़ते। वहीं से यह कहावत चली है। बनारस की किसी गली में जब कोई बूढ़ी माँ कहती हैं, "बाबा कहीं नहीं जाते", तो वे अपने शब्दों में वही बात दोहरा रही होती हैं जो पुराण ने बहुत पहले कह दी थी। काशी में शिव को प्यार से बाबा ही कहा जाता है।
इस नाम पर थोड़ा ठहरना अच्छा लगता है। हम में से ज़्यादातर लोग तीर्थ को ऐसी जगह मानते हैं जहाँ हम जाते हैं, दर्शन करते हैं, और घर लौट आते हैं। काशी खण्ड इस बात को उलट देता है। उसकी कथा में ठहरने वाली तो नगरी है। यात्री आते हैं और चले जाते हैं। शिव वहीं रहते हैं। काशी के लोग यह भाव रोज़ के जीवन में भी रखते हैं। वे कहते हैं कि हम तो बाबा की नगरी में मेहमान हैं, घर के मालिक तो हमेशा घर पर ही रहते हैं।
अब यह प्रश्न कि यहाँ शिव की पूजा ज्योतिर्लिंग के रूप में क्यों होती है। ज्योतिर्लिंग, यानी वह स्थान जहाँ शिव को प्रकाश के स्तंभ के रूप में पूजा जाता है। इसके लिए हम शिव पुराण के पास चलते हैं।
शिव पुराण के पहले भाग, विद्येश्वर संहिता में एक कथा आती है। एक समय ब्रह्मा जी और विष्णु जी में यह मतभेद हुआ कि दोनों में बड़ा कौन है। तभी दोनों के बीच अग्नि का एक स्तंभ प्रकट हुआ, जिसका न आदि था न अंत। विष्णु जी उसका मूल खोजने नीचे गए। ब्रह्मा जी उसका शिखर खोजने ऊपर गए। कोई भी छोर तक नहीं पहुँच सका। पुराण इस स्तंभ को शिव का वह रूप बताता है जिसे किसी माप में नहीं बाँधा जा सकता। ज्योति यानी प्रकाश। ज्योतिर्लिंग वह स्थान है जहाँ उसी प्रकाश का स्मरण और पूजन होता है।
आगे कोटिरुद्र संहिता में शिव पुराण भारत भर के ऐसे बारह स्थानों के नाम गिनाता है। यही सूची एक छोटे-से स्तोत्र में भी है, जिसे बहुत से परिवार कंठस्थ रखते हैं, द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र। परंपरा इसे आदि शंकराचार्य की रचना मानती है। इस नगरी वाली पंक्ति में यह स्तोत्र वाराणसी में विश्वेश का नाम लेता है। वह पंक्ति संस्कृत में सुनना चाहें, तो किसी गुरु से या घर के किसी बड़े से सीखिए, जो उसे ठीक वैसे बोल सकें जैसे बोली जानी चाहिए।
विश्वेश, विश्वेश्वर, विश्वनाथ। तीनों का अर्थ एक ही है, सारे विश्व के स्वामी। यानी मंदिर का नाम अपने आप में एक बात कहता है। इस छोटी-सी नगरी में जिनकी पूजा होती है, वे पूरे जगत के नाथ हैं। इसमें एक कोमलता भी है। सारे जगत के स्वामी ने घंटियों, गायों और संकरी गलियों वाली, नदी किनारे की एक भीड़ भरी नगरी को वह जगह चुना जिसे वे कभी नहीं छोड़ते।
चलिए, थोड़ी देर के लिए ग्रंथ रख देते हैं और गली में खड़े होते हैं।
जो काशी गए हैं, वे यह रास्ता जानते हैं। गलियाँ संकरी हैं। जहाँ आप पैर रखना चाहते हैं, वहीं कोई गाय आराम कर रही है। कोई दुकान पीतल के लोटे और लाल धागा बेच रही है। कोई सिर पर गेंदे के फूलों की टोकरी लिए जा रहा है। साइकिल पर एक लड़का घंटी बजाता है और न जाने कैसे रास्ता बना ही लेता है। फिर एक मोड़ पर भीड़ घनी हो जाती है और मंदिर की घंटियों की आवाज़ सुनाई देने लगती है।
आपके आस-पास लोग छोटी-छोटी भेंट लिए चल रहे हैं। किसी के हाथ में गंगाजल का लोटा है। किसी के पास कुछ बेलपत्र। किसी के पास माला। कुछ लोग धीमे स्वर में शिव का नाम ले रहे हैं। कुछ चुप हैं। एक बुज़ुर्ग को उनका पोता सहारा देकर ले जा रहा है। सब एक ही दिशा में जा रहे हैं।
आज आप जिस मंदिर में प्रवेश करते हैं, वह बहुत बड़ा नहीं है। इसका वर्तमान भवन सन् 1780 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर ने बनवाया। उन्होंने भारत के अनेक स्थानों पर मंदिर और घाट बनवाए और सँवारे। लगभग पचास वर्ष बाद पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने शिखर और गुंबद पर चढ़ाने के लिए सोना दिया। इसीलिए बनारस के बहुत से लोग आज भी इसे स्वर्ण मंदिर कहते हैं। मंदिर न्यास के अपने इतिहास में ये दोनों दान दर्ज हैं।
नगरी इस भवन से कहीं अधिक पुरानी है। काशी का नाम बहुत प्राचीन ग्रंथों में आता है, और तीर्थयात्री यहाँ इतनी सदियों से आ रहे हैं कि ठीक-ठीक गिनना कठिन है। मंदिर एक से अधिक बार फिर से बना, और यह कथा हम आगे की एक बैठक में ध्यान से सुनेंगे। जो नहीं बदला, वह है पूजा। मंदिर न्यास प्रतिदिन कई आरतियाँ करता है। भोर से पहले मंगला आरती से दिन शुरू होता है और रात को शयन आरती पर पूरा होता है। शाम की सप्तर्षि आरती सात पुजारी मिलकर करते हैं, सात महान ऋषियों की स्मृति में।
काशी खण्ड की एक और बात है, जो इस नगरी के प्रति लोगों के भाव को गढ़ती है। वह मणिकर्णिका की बात करता है, वह घाट जहाँ दिन-रात दाह संस्कार होते हैं। पुराण कहता है कि काशी में जो देह छोड़ते हैं, उन्हें स्वयं शिव तारक मंत्र देते हैं, वह मंत्र जो पार उतारता है। इसीलिए सदियों से बुज़ुर्ग अपने जीवन के अंतिम वर्ष काशी में बिताने आते रहे हैं। उनके लिए यह दुख की यात्रा नहीं है। वे इसे घर लौटना कहते हैं।
काशी में आपको इसके बारे में कई बातें सुनने को मिलेंगी। कुछ परिवार कहते हैं कि मंत्र दाहिने कान में कहा जाता है। कुछ कहते हैं कि यह बस इस स्थान की कृपा है। ये स्थानीय परंपराएँ हैं, प्रेम से कही जाती हैं, और परिवार-परिवार में अलग होती हैं। हम इन्हें वैसे ही सुनाते हैं जैसे कही जाती हैं, किसी को दूसरी से अधिक सही बताए बिना।
मणिकर्णिका के पास कभी कुछ देर बैठिए, तो आप देखेंगे कि वहाँ कितनी शांति है। परिवार आते हैं, जाते हैं। लकड़ियाँ रखी हैं। नदी बहती जा रही है। ऊपर गलियों में जीवन चलता रहता है। काशी के लोग इतने समय से इस घाट के पास रहते आए हैं कि उसकी बात बड़े सहज भाव से करते हैं, जैसे किसी पुराने पड़ोसी की।
और एक छोटी-सी स्थानीय परंपरा हमें बहुत प्यारी लगती है। काशी में कहते हैं कि शिव नगरी के राजा हैं, पर नगरी का पेट भरती हैं माँ अन्नपूर्णा, जिनका मंदिर विश्वनाथ से बस कुछ कदम दूर है। बहुत से यात्री विश्वनाथ जी के दर्शन के तुरंत बाद माँ अन्नपूर्णा के दर्शन करते हैं। भाव बड़ा कोमल है और बड़ा अपना-सा। घर में पिता मुखिया हो सकते हैं, पर जब तक माँ परोसती नहीं, कोई भोजन नहीं करता।
इस कथा-माला में आगे हम माँ अन्नपूर्णा से फिर मिलेंगे, और उनसे भी जो काशी की अपनी मान्यता में इस नगरी का घर चलाते हैं।
तो आइए, आज जो सुना उसे समेट लें।
स्कन्द पुराण का काशी खण्ड इस नगरी को अविमुक्त कहता है, वह स्थान जिसे शिव कभी नहीं छोड़ते। शिव पुराण प्रकाश के स्तंभ की कथा कहता है और बारह ज्योतिर्लिंगों में वाराणसी का नाम लेता है, जहाँ शिव विश्वनाथ के रूप में पूजे जाते हैं। वर्तमान मंदिर 1780 में अहिल्याबाई होलकर ने बनवाया और बाद में महाराजा रणजीत सिंह के दिए सोने से मढ़ा गया। और काशी के लोग मणिकर्णिका और माँ अन्नपूर्णा से जुड़ी अपनी कोमल परंपराएँ सँजोए हुए हैं, जो पुराणों को रोज़ के जीवन में ले आती हैं।
आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए। अविमुक्त का अर्थ है जिसे कभी न छोड़ें। कल सुबह दिन शुरू होने से पहले एक ऐसी जगह, एक ऐसे व्यक्ति, या एक ऐसी अच्छी आदत के बारे में सोचिए जिसे आप कभी छोड़ना नहीं चाहते। एक धीमी साँस जितनी देर उसे मन में थामे रहिए। बस इतना ही।
अगली बैठक में हम नदी की ओर उतरेंगे, दशाश्वमेध घाट पर, और सुनेंगे कि काशी खण्ड इस घाट के नाम के बारे में क्या कहता है।