दशाश्वमेध: दस यज्ञों का घाट
Episode 2 of 10 in काशी विश्वनाथ: प्रकाश की नगरी.
Narrated with an AI voice.
- Reading time
- 10 min
- Listening time
- 13 min
- By
- DharmikStudio Originals
- Temple or tirtha
- Kashi Vishwanath Temple
- Narration
- AI voice
Read along
नमस्कार। काशी विश्वनाथ पर हमारी कथा-माला में आपका फिर से स्वागत है। पिछली बार हम मंदिर के बाहर की गली में खड़े थे और हमने अविमुक्त नाम का अर्थ सुना था, वह स्थान जिसे शिव कभी नहीं छोड़ते। आज हम थोड़ा आगे चलते हैं, सीढ़ियाँ उतरकर, नदी तक।
मंदिर से निकलकर अगर आप लोगों के बहाव के साथ गंगा की ओर चलें, तो जल्दी ही काशी के सबसे भीड़ वाले घाट पर पहुँच जाएँगे। घाट यानी नदी किनारे की सीढ़ियाँ। इस घाट का नाम है दशाश्वमेध। सुबह-सुबह यह घाट नहाने वालों का होता है। लोग कमर तक पानी में हाथ जोड़े खड़े हैं। फूल बेचने वाले गेंदे और गुलाब की टोकरियाँ लिए बैठे हैं। पंडे, यानी यात्रियों के कुल-पुरोहित, अपनी बड़ी-बड़ी छतरियों के नीचे बैठे हैं। नाव वाले धीमे से पूछते हैं, नाव में घूमेंगे?
शाम को यही सीढ़ियाँ फिर भर जाती हैं, इस बार गंगा आरती के लिए। पुजारियों की एक पंक्ति बड़े-बड़े दीप नदी की ओर उठाती है, और लोग सीढ़ियों से और नावों से देखते हैं। बहुत से लोग काशी में बस यही एक घाट जानते हैं। पर इस घाट के नाम में ही एक कथा छिपी है, और वह काशी खण्ड की लंबी कथाओं में से एक है।
दश यानी दस। अश्वमेध यानी घोड़े वाला यज्ञ, वैदिक काल के बड़े यज्ञों में से एक। तो दशाश्वमेध का अर्थ हुआ दस अश्वमेध यज्ञों का स्थान। पर ये यज्ञ किसने किए? इसके लिए पुराण की ओर चलते हैं।
कथा समझने के लिए पहले उस यज्ञ के बारे में एक बात। पुराने ग्रंथों में अश्वमेध एक बहुत बड़ा और खर्चीला राजकीय अनुष्ठान था। उसकी तैयारी में लंबा समय लगता था, बहुत से पुरोहित लगते थे और बहुत साधन लगते थे। इसे राजा करते थे, और यह राज्य और समृद्धि का चिह्न माना जाता था। एक अश्वमेध भी बहुत कम होता था। एक ही स्थान पर दस अश्वमेध हों, यह ऐसी बात थी जिसकी चर्चा पीढ़ियों तक होती।
अब जो कथा हम सुनाते हैं, वह पुराण का वर्णन है, स्कन्द पुराण के काशी खण्ड से। हम इसे सीधे-सादे ढंग से सुनाएँगे, और उतना ही कहेंगे जितना ग्रंथ में आता है।
काशी खण्ड बताता है कि एक समय संसार संकट में था, और उसे ठीक से चलाने वाला कोई राजा नहीं था। सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ऐसे राजा की खोज में थे जो सब ठीक कर सके। उन्हें रिपुंजय नाम के एक राजर्षि मिले, जो काशी में तप कर रहे थे। ब्रह्मा जी ने उनसे धरती का राज सँभालने को कहा।
राजर्षि मान गए, पर एक शर्त के साथ। उन्होंने कहा कि अगर मैं राज करूँ, तो देवता अपने-अपने लोकों में रहें और धरती मुझ पर छोड़ दें। वे अपने ऊपर किसी के बिना राज करना चाहते थे। ब्रह्मा जी ने शर्त मान ली। राजर्षि राजा बने, और उन्हें दिवोदास नाम मिला।
और यहीं कठिनाई आई। अगर देवताओं को धरती छोड़नी थी, तो शिव को भी काशी छोड़नी पड़ती। इसलिए शिव, पार्वती के साथ, मंदर नाम के पर्वत पर चले गए। जिस नगरी को कभी छोड़ा नहीं जाता, वह कुछ समय के लिए अपने स्वामी के बिना रह गई।
पुराण दिवोदास को एक अच्छा राजा बताता है। वे न्याय से राज करते थे। प्रजा सुखी थी। नगरी में व्यवस्था थी। इस कथा की यही बात हमें छू जाती है। एक ही कठिनाई थी, कि शिव को अपनी नगरी की याद सताती थी।
तो पुराण कहता है कि शिव ने एक के बाद एक दूत काशी भेजने शुरू किए, इस आशा में कि लौटने का कोई रास्ता निकले। पहले उन्होंने योगिनियों को भेजा। वे काशी आईं, नगरी की सुंदरता देखी, और लौटी ही नहीं। फिर शिव ने सूर्य देव को भेजा। काशी खण्ड कहता है कि शिव ने सूर्य से राजा के राज में कोई दोष खोजने को कहा था, क्योंकि कोई दोष मिलता तो लौटने का रास्ता खुल जाता। सूर्य आए, दोष खोजा, कोई दोष नहीं मिला, और वे भी यहीं रह गए। काशी में लोग आज भी घाटों पर सूर्य के मंदिरों को इस कथा से जोड़ते हैं।
फिर शिव ने स्वयं ब्रह्मा जी से जाने को कहा।
ब्रह्मा जी एक बूढ़े ब्राह्मण के वेश में काशी आए। वे राजा दिवोदास के पास गए और कहा कि वे यज्ञ करना चाहते हैं, राजा सहायता करें। राजा बड़े उदार थे। उन्होंने जो कुछ चाहिए था, सब दिया। राजा के सहयोग से ब्रह्मा जी ने नदी किनारे इसी स्थान पर एक के बाद एक दस अश्वमेध यज्ञ किए।
पुराण कहता है कि इसीलिए यह स्थान दशाश्वमेध कहलाया। काशी खण्ड यह भी बताता है कि ब्रह्मा जी को भी नगरी इतनी भा गई कि वे लौटे नहीं। वे यहीं रह गए, और उन्होंने यहाँ शिव का एक लिंग स्थापित किया, जिसे ग्रंथ ब्रह्मेश्वर कहता है।
इसके बाद भी कथा कई अध्यायों तक चलती है। काशी खण्ड बताता है कि कैसे गणेश जी नगरी में आए, फिर विष्णु जी, दोनों वेश बदलकर, और कैसे अंत में राजा दिवोदास, संतुष्ट और हर मोह से मुक्त होकर, शिव के लोक को चले गए। तभी शिव काशी लौटे, और नगरी को फिर उसके स्वामी मिले। गणेश जी वाला भाग हम अगली बैठक में सुनेंगे।
पूरी कथा सुनें तो एक कोमल-सी बात सामने आती है। जो भी किसी काम से काशी आता है, वह यहीं रह जाता है। योगिनियाँ रह गईं। सूर्य रह गए। ब्रह्मा जी रह गए। इस नगरी में एक खिंचाव है जिसे कोई ठीक-ठीक समझा नहीं पाता। काशी के लोग मुस्कुराकर कहते हैं कि आज भी ऐसा ही है। बहुत से लोग एक हफ़्ते के लिए आए थे और तीस साल बाद भी यहीं हैं।
एक बात हम ईमानदारी से और जोड़ दें। पुराण का वर्णन वह है जिससे परंपरा इस नाम को समझाती है। कुछ इतिहासकार इस नाम को भारशिव नाम के राजवंश से भी जोड़ते हैं, जिनके बारे में पुराने अभिलेखों में लिखा है कि उन्होंने गंगा किनारे दस अश्वमेध यज्ञ किए। ये दोनों व्याख्याएँ अलग-अलग तरह के स्रोतों से आती हैं। हम दोनों को आदर से, साथ-साथ रखते हैं। दोनों ही तरह से यह घाट दस यज्ञों की स्मृति संजोए हुए है।
यात्रियों और पुरोहितों से आप यह भी सुनेंगे कि काशी में गंगा किनारे पाँच बड़े तीर्थ हैं, जिन्हें पंचतीर्थी कहते हैं, और यह घाट उनमें से एक है। इस स्थानीय परंपरा में पाँच तीर्थ हैं, असि, दशाश्वमेध, आदिकेशव जहाँ वरुणा गंगा से मिलती है, पंचगंगा, और मणिकर्णिका। परिवार यह यात्रा अपने-अपने ढंग से करते हैं, कुछ लोग एक-दो तीर्थ ही करते हैं। कोई एक ही सही तरीका नहीं है।
चलिए, थोड़ी देर के लिए फिर सीढ़ियों पर लौटते हैं।
सुबह-सुबह दशाश्वमेध पर बैठिए, तो आपको वह दिखेगा जो सदियों में बहुत नहीं बदला। एक स्त्री पीतल का छोटा लोटा लिए उगते सूरज की ओर मुँह करके धीरे-धीरे जल वापस नदी में चढ़ा रही है। यह अर्घ्य है, जल का अर्पण। एक बुज़ुर्ग आँखें बंद किए सबसे नीचे की सूखी सीढ़ी पर बैठे हैं, उनके पैर लगभग नदी को छू रहे हैं। दो बच्चे कबूतरों को दाना डाल रहे हैं। एक पुजारी दक्षिण से आए एक परिवार की कलाई पर लाल धागा बाँध रहे हैं, जो बहुत दूर से आए हैं।
ऊपर सीढ़ियों के पास शीतला माता का एक छोटा मंदिर है, जहाँ उत्तर भारत के बहुत से परिवार जाते हैं। उसके आस-पास सिंदूर, चूड़ियों और फूलों की छोटी-छोटी दुकानें हैं। घाट भीड़ और शोर और जीवन से भरा है, फिर भी नदी चुपचाप बहती जाती है, जैसे इनमें से कुछ भी उसे परेशान न कर सके।
यहाँ भीड़ के साथ बह जाना आसान है। अगर आप जाएँ, तो हम एक बात कहेंगे। कोई कोना ढूँढ़िए, पाँच मिनट के लिए ही सही, और बस बैठ जाइए। पानी को देखिए। शोर को पीछे की आवाज़ बन जाने दीजिए। यह वही नदी है जिसके किनारे, पुराण की कथा में, ब्रह्मा जी ने दस बार यज्ञ की अग्नि जलाई थी।
तो आइए, आज जो सुना उसे समेट लें।
दशाश्वमेध का अर्थ है दस अश्वमेध यज्ञों का स्थान। स्कन्द पुराण का काशी खण्ड राजा दिवोदास की कथा कहता है, एक न्यायी राजा जिन्होंने देवताओं से धरती छोड़ने को कहा, और शिव की अपनी नगरी लौटने की चाह की। शिव ने दूत भेजे, और हर दूत यहीं रह गया। ब्रह्मा जी बूढ़े ब्राह्मण के वेश में आए, राजा की सहायता से यहाँ दस अश्वमेध यज्ञ किए, और शिव का लिंग स्थापित करके वे भी यहीं रह गए। इतिहासकार इस नाम की एक और व्याख्या देते हैं, और हम दोनों को साथ रखते हैं। और आज यह घाट वह जगह है जहाँ काशी सुबह नहाती है और शाम को गंगा आरती के लिए जुटती है।
आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए। इस कथा में राजा भी अच्छे थे और देवता भी अच्छे थे, फिर भी एक उलझन थी, और वह धीरे-धीरे, धैर्य से सुलझी, बिना किसी ज़बरदस्ती के। अगली बार जब किसी ऐसे व्यक्ति से मतभेद हो जिसका आप आदर करते हैं, तो दिवोदास और ब्रह्मा जी को याद कीजिए। पहले उदार बनिए, और बात को समय दीजिए।
अगली बैठक में हम फिर गलियों में चढ़ेंगे और काशी के परिवार से मिलेंगे, नगरी का पेट भरने वाली माँ अन्नपूर्णा, उसकी रखवाली करने वाले काल भैरव, और ढुण्ढिराज गणेश, जो काशी खण्ड के अनुसार खोजते हुए आए और यहीं रह गए।