उत्तर के घाट - पंचगंगा से आदि केशव तक, जहाँ वरुणा गंगा से मिलती है
पंचगंगा से आदि केशव तक, जहाँ वरुणा गंगा से मिलती है
Episode 10 of 10 in काशी विश्वनाथ: प्रकाश की नगरी.
Narrated with an AI voice.
- Reading time
- 10 min
- Listening time
- 12 min
- By
- DharmikStudio Originals
- Temple or tirtha
- Kashi Vishwanath Temple
- Narration
- AI voice
In this episode
- काशी के घाटों पर यह अंतिम पदयात्रा है।
- पंचगंगा घाट पर पाँच नदियों के संगम की कथा है।
- आदि केशव पर वरुणा नदी गंगा से मिलती है।
Read along
नमस्कार। काशी के घाटों पर हमारी श्रृंखला की यह आख़िरी पदयात्रा है। हमने पुरानी नगरी के दक्षिणी छोर, अस्सी से शुरुआत की थी। आज हम मणिकर्णिका से चलते हैं, जहाँ हमारी पहली पदयात्रा पूरी हुई थी, और शांत घाटों से होते हुए उत्तर की ओर उस जगह तक जाते हैं जहाँ वरुणा नदी गंगा से मिलती है। फिर से भोर है, और रोशनी कोमल है। अगर आप पहले एपिसोड से हमारे साथ चल रहे हैं, तो धन्यवाद। अगर यह आपकी पहली पदयात्रा है, तो आपका स्वागत है, बाकी एपिसोड आप कभी भी सुन सकते हैं।
मणिकर्णिका को पीछे छोड़ते हुए धीरे चलिए, और कैमरा कुछ देर और नीचे रखिए। धुआँ हल्का होता जाता है, गलियाँ खुलने लगती हैं, और किनारा शांत हो जाता है।
मणिकर्णिका के ठीक बाद, सिंधिया घाट के पास, पानी की ओर देखिए। शिव का एक पत्थर का मंदिर नदी की ओर झुका दिखेगा, उसका निचला हिस्सा अक्सर पानी में डूबा, शिखर एक ओर तिरछा। वह क्यों झुका है, इस पर लोगों के पास कई कहानियाँ हैं। जो आप खुद देख सकते हैं, वह यह कि नगरी नदी के कितने पास रहती है, और नदी बरसों में अपने किनारे पर बनी चीज़ों का थोड़ा-थोड़ा हिस्सा वापस ले लेती है।
यहाँ से उत्तर के घाटों पर आने वाले कम हैं, और रोज़ का जीवन ज़्यादा। लोग पत्थर की पटियों पर कपड़े धोते हैं और सीढ़ियों पर सूखने को फैला देते हैं, सफ़ेद और रंगीन कपड़ों की लंबी कतारें। उथले पानी में एक गाय खड़ी है। बच्चे किनारे के पास सीढ़ियों से पानी में कूद रहे हैं, बड़े भाई-बहन ध्यान रख रहे हैं। एक पुरोहित अपनी पोथियों के साथ एक छोटे तख़्त पर अकेले बैठे हैं। किसी को जल्दी नहीं।
कुछ देर बाद हम पंचगंगा घाट पहुँचते हैं। यह पंचतीर्थी के उन पाँच स्थानों में से एक है, जिनके साथ हम इस पूरी श्रृंखला में चलते आए हैं।
पंचगंगा यानी पाँच गंगाएँ। काशी खण्ड कहता है कि यहाँ गंगा से चार और नदियाँ मिलती हैं, जो दिखाई नहीं देतीं: यमुना, सरस्वती, किरणा और धूतपापा। इसलिए पंचगंगा के स्नान को एक साथ पाँच नदियों का स्नान कहा जाता है। इस किनारे की हर कथा की तरह, यह भी अलग-अलग ढंग से कही जाती है, और हम इसे वैसे ही सुना रहे हैं।
घाट के ऊपर, खड़ी सीढ़ियाँ चढ़कर, बिंदु माधव का मंदिर है, विष्णु का एक रूप, जिनका काशी में शिव के साथ-साथ आदर होता है। काशी खण्ड में काशी में विष्णु के स्थान के बारे में बहुत कुछ कहा गया है, और बहुत से तीर्थयात्री आगे बढ़ने से पहले ऊपर चढ़कर यहाँ दर्शन करते हैं।
कार्तिक के महीने में पंचगंगा अपने आकाश दीपों के लिए जाना जाता है। टोकरियों में रखे छोटे दीये घाट के ऊपर ऊँचे बाँसों पर टाँगे जाते हैं, और काशी में लोग कहते हैं कि ये पितरों की याद में, उन्हें राह दिखाने के लिए जलाए जाते हैं। अगर आप कभी कार्तिक में आएँ, तो साँझ को ऊपर देखिए, वे सीढ़ियों के ऊपर हवा में झूलते दिखेंगे। अपने शहर के लिए सही तिथियाँ पंचांग में देख लीजिए।
पंचगंगा संत कवि कबीर की एक कथा के लिए भी याद किया जाता है। कबीर काशी में जन्मे और यहीं रहे, और बहुत से धर्मों के लोग उन्हें प्रेम करते हैं। काशी की परंपरा में, युवा कबीर गुरु रामानंद से सीखना चाहते थे। एक दिन भोर से पहले वे इन सीढ़ियों पर लेट गए, जहाँ रामानंद स्नान को आते थे। अँधेरे में गुरु का पैर उन्हें छू गया, और रामानंद के मुँह से राम का नाम निकला। कबीर ने उसी नाम को जीवन भर की सीख मान लिया। यह प्रेम से कही जाने वाली परंपरा है, और हम इसे उसी तरह सुना रहे हैं।
घाट से ऊपर देखें, तो सीढ़ियों के ऊपर एक मस्जिद की ऊँची मीनारें भी दिखेंगी। तीन सौ साल से ज़्यादा समय से वे इस क्षितिज का हिस्सा हैं। किनारे के इस एक हिस्से पर ही आप देख सकते हैं कि कितने धर्मों और कितनी जगहों के लोगों ने गंगा के किनारे अपना घर बसाया है।
हम आगे चलते हैं। यहाँ सीढ़ियाँ पुरानी और टूटी-फूटी हैं, और लोग कम आते-जाते हैं। पैरों का ध्यान रखिए, ख़ासकर जहाँ पत्थर गीला हो या सीढ़ियाँ घिस गई हों।
हम गाय घाट से गुज़रते हैं, जहाँ गायों को नदी तक लाया जाता है, और त्रिलोचन घाट से, जिसका नाम त्रिलोचन शिव, यानी तीन नेत्रों वाले शिव पर है। फिर छोटे-छोटे घाट आते हैं, किसी पर बस कुछ सीढ़ियाँ, किसी पर एक मंदिर और एक पेड़। सुबह यहाँ ज़्यादातर मोहल्ले के लोग मिलते हैं, जो अपने शांत स्नान और अपनी शांत प्रार्थना के लिए आते हैं।
एक पल रुककर पीछे देखिए। यहाँ से घाट दक्षिण की ओर एक लंबे धनुष की तरह मुड़ते चले जाते हैं, एक के बाद एक, सब सूर्योदय की ओर मुख किए। शिखर और पुराने महल अब दूरी पर छोटे दिखते हैं। भीड़ वाले घाटों का शोर यहाँ तक नहीं पहुँचता। बस नावें याद दिलाती हैं, जो नदी में ऊपर-नीचे धीरे-धीरे सरक रही हैं।
आगे नदी पर एक लंबा पुल है, जिस पर सड़क भी है और रेल भी। उसके नीचे राजघाट है। यह काशी के सबसे पुराने हिस्सों में से एक है। यहाँ की ऊँची ज़मीन पर खुदाई करने वाले पुरातत्वविदों को एक ऐसी बस्ती के निशान मिले जो दो हज़ार साल से भी ज़्यादा पुरानी है। लोग बहुत लंबे समय से इस किनारे पर रहते आए हैं, इस नदी से जल भरते आए हैं, और साँझ को दीये जलाते आए हैं।
और अब हम अपनी पदयात्रा के अंत पर, आदि केशव पहुँचते हैं।
यहाँ एक छोटी नदी, वरुणा, पश्चिम से आकर गंगा में मिलती है। यह पुराने पवित्र क्षेत्र की उत्तरी सीमा है, जैसे दूसरे छोर पर असि दक्षिणी सीमा है। हमने यह श्रृंखला एक नदी से शुरू की थी, और दूसरी पर पूरी कर रहे हैं।
काशी खण्ड बताता है कि जब विष्णु जी काशी आए, राजा दिवोदास की उसी लंबी कथा में जो हमने दशाश्वमेध पर सुनी थी, तो उन्होंने नगरी में पहला कदम यहीं, वरुणा और गंगा के संगम पर रखा। इसीलिए यहाँ का मंदिर आदि केशव कहलाता है, यानी पहले केशव, विष्णु जैसे वे पहली बार आए। यह पंचतीर्थी का पाँचवाँ स्थान है, और पाँचों स्थानों की यात्रा करने वालों के लिए अक्सर नगरी की ओर लौटने से पहले का आख़िरी पड़ाव।
मंदिर सादा और शांत है। नदी के पास खेत हैं, और पानी पर पक्षी। दशाश्वमेध की भीड़ और मणिकर्णिका के धुएँ के बाद यह कोई और ही दुनिया लग सकती है, हालाँकि नगरी वही है, और नदी भी वही।
सीढ़ियों के किनारे खड़े होकर पानी देखिए। साफ़ सुबह में कभी-कभी दोनों नदियाँ कुछ दूर तक साथ-साथ दिखती हैं, वरुणा का रंग थोड़ा गहरा, फिर वे मिलकर पूर्व की ओर साथ बह जाती हैं। आपके पीछे पूरी नगरी है। सामने बस चौड़ी नदी है, और उस पार खुला किनारा।
यह चुप रहने की अच्छी जगह है। आइए, कुछ देर यहाँ साथ बैठें, और बस पानी की आवाज़ सुनें।
यहाँ सावधानी की एक बात। जहाँ दो नदियाँ मिलती हैं, वहाँ पानी का भरोसा नहीं, धाराएँ किनारे से दिखती नहीं। स्नान करना हो या अर्घ्य देना हो, तो सिर्फ़ सीढ़ियों से, उसी जगह जहाँ स्थानीय लोग नहाते हैं, और गहरे में मत जाइए।
आइए, सीढ़ी पर एक पल बैठें और पूरी श्रृंखला को समेटें।
हमने अस्सी से शुरुआत की, अँधेरे में, रोशनी का इंतज़ार करते लोगों के साथ, और सुना कि छोटी असि नदी ने घाट को अपना नाम दिया और नगरी के नाम का एक हिस्सा भी। हमने दशाश्वमेध पर एक शाम बिताई, जहाँ काशी खण्ड ब्रह्मा जी के दस यज्ञों को याद करता है, और जहाँ हज़ारों लोग नदी पर घूमते दीपों को देखते हैं। हम धीरे से हरिश्चंद्र और मणिकर्णिका गए, और सीखा कि दूसरों की विदाई के पास सम्मान से कैसे खड़े हों। और आज सुबह हम शांत घाटों से होते हुए पंचगंगा, राजघाट और आदि केशव पहुँचे, जहाँ वरुणा गंगा से मिलती है।
पूरे रास्ते हमने यह बताने की कोशिश की कि ग्रंथ क्या कहते हैं और काशी क्या याद रखती है, और साफ़-साफ़ बताया कि कौन सी बात कहाँ से है। अगर आप खुद काशी जाएँ, तो और बहुत सी कथाएँ सुनेंगे, और उनमें से बहुत सी अलग ढंग से कही जाएँगी। सबको सुनिए।
आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए। काशी का किनारा दो छोटी नदियों के बीच थमा है, और सब कुछ इन्हीं के बीच होता है। आपका दिन भी एक सुबह और एक शाम के बीच थमा है। कल उसके दोनों छोरों को याद से छुइए: जागते समय धन्यवाद की एक शांत साँस, और सोने से पहले एक और।
हमारे साथ चलने के लिए धन्यवाद। आपकी सुबहें शांत हों, और किसी दिन आप खुद इन सीढ़ियों पर खड़े होकर गंगा के ऊपर रोशनी को आते देखें।