मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र - श्मशान घाट, सम्मान के साथ
श्मशान घाट, सम्मान के साथ
Episode 9 of 10 in काशी विश्वनाथ: प्रकाश की नगरी.
Narrated with an AI voice.
- Reading time
- 10 min
- Listening time
- 13 min
- By
- DharmikStudio Originals
- Temple or tirtha
- Kashi Vishwanath Temple
- Narration
- AI voice
In this episode
- हरिश्चंद्र घाट पर राजा हरिश्चंद्र के वचन और ईमानदारी को याद करें।
- मणिकर्णिका घाट पर दाह-संस्कार की गरिमा का सम्मान करें और दूर रहें।
- दुख के समय दूसरों को शांत सम्मान और गरिमा दें।
Read along
नमस्कार। यह एपिसोड बाकियों से थोड़ा अलग है। आज हम हरिश्चंद्र घाट और मणिकर्णिका घाट चलेंगे, काशी की वे दो जगहें जहाँ दाह-संस्कार होते हैं। हम मृत्यु और विदाई की बात करेंगे। अगर आपने हाल ही में किसी अपने को खोया है, और यह बहुत पास लगे, तो यहीं रुक जाना बिल्कुल ठीक है, किसी और दिन लौट आइए। अगर आप साथ हैं, तो आइए, धीरे-धीरे चलें।
परिवार अपने प्रियजनों को, कभी-कभी बहुत दूर से, काशी क्यों लाते हैं?
स्कन्द पुराण का काशी खण्ड, जो इस नगरी को समर्पित है, काशी को अविमुक्त कहता है, यानी वह स्थान जिसे शिव कभी नहीं छोड़ते। वह कहता है कि काशी में देह छोड़ने वालों को शिव तारक मंत्र देते हैं, वह मंत्र जो पार उतार दे। इसी से बहुत से हिंदू परिवारों के लिए काशी जीवन के अंत में भरोसे की जगह बन गई। नगरी में ऐसे घर हैं जहाँ बुज़ुर्ग अपने आख़िरी दिन बिताने आते हैं, और जो परिवार समय पर नहीं पहुँच पाते, वे बाद में अंतिम संस्कार के लिए अपने प्रिय को यहाँ लाते हैं।
मृत्यु और उसके बाद के बारे में मान्यताएँ हर परिवार और हर परंपरा में अलग हैं। हम उन्हें समझाने या उनमें ऊँच-नीच करने नहीं आए। हम थोड़ा समझने आए हैं, और ठीक से व्यवहार करने।
पहले हम हरिश्चंद्र घाट चलते हैं, किनारे के दक्षिणी हिस्से में, केदार घाट से कुछ पहले। यह दोनों श्मशान घाटों में छोटा है। इसका नाम राजा हरिश्चंद्र को याद करता है, और उनकी कथा उत्तर भारत का लगभग हर बच्चा कभी न कभी सुनता है। यह मार्कण्डेय पुराण में है, और काशी के घाटों पर भी कही जाती है, और ब्योरों में कथाएँ अलग-अलग हैं। सीधे-सादे शब्दों में, कथा यह है।
हरिश्चंद्र अयोध्या के राजा थे, जो अपने वचन से कभी न डिगने के लिए प्रसिद्ध थे। ऋषि विश्वामित्र ने उनकी परीक्षा लेनी चाही। परीक्षा के दौरान राजा ने एक वचन निभाने के लिए अपना पूरा राज्य दे दिया। जब ऋषि ने फिर भी अपनी दक्षिणा माँगी, तो हरिश्चंद्र के पास कुछ नहीं बचा था। तो वे काशी आए, अपनी पत्नी और छोटे बेटे को सेवा के लिए बेच दिया, और फिर स्वयं को यहीं, इसी किनारे पर, श्मशान के स्वामी के हाथ बेच दिया।
उन्होंने वहाँ ईमानदारी से काम किया, हर परिवार से दाह-संस्कार का शुल्क लेते हुए। फिर एक दिन उनके अपने बेटे की मृत्यु हो गई, और उनकी पत्नी बालक को लेकर श्मशान आईं। उनके पास देने को कुछ नहीं था। हरिश्चंद्र ने जो कर्तव्य स्वीकार किया था, उससे बँधे होने के कारण वे बिना शुल्क के संस्कार नहीं होने दे सकते थे, अपने बेटे के लिए भी नहीं। पुराण के अनुसार, रानी ने अपने इकलौते वस्त्र का आधा भाग देना चाहा, और उसी क्षण परीक्षा पूरी हुई। देवता और धर्म प्रकट हुए, बालक को जीवन वापस मिला, और राजा को उनका परिवार और राज्य लौटा दिया गया।
इस कथा से लोग अलग-अलग बातें लेते हैं। कोई उस राजा को याद करता है जिसने सब कुछ खोकर भी वचन निभाया। कोई उस रानी को, जिसने अपना दुख उठाए हुए भी वही किया जो माँगा गया। और काशी में बहुत से लोग याद रखते हैं कि श्मशान का जो काम कुछ लोग छोटा समझते हैं, उसे एक राजा ने ईमानदारी और लगन से किया। यह सुनने में कठिन कथा है, और ऐसी ही होनी चाहिए।
आज हरिश्चंद्र घाट मणिकर्णिका से शांत है। यहाँ आने वाले बहुत से परिवार काशी और आसपास के गाँवों के होते हैं। घाट के आसपास जीवन चलता रहता है, पास की सीढ़ियों पर घर और छोटे मंदिर हैं, पानी पर नावें बँधी हैं। एक पल दूर खड़े रहिए, और कथा के उस राजा के बारे में सोचिए, जो इसी किनारे पर ईमानदारी से अपना काम करता था।
हरिश्चंद्र घाट पर धीरे चलिए। चिताओं और परिवारों से सम्मानजनक दूरी रखिए। दाह-संस्कार या शोक में डूबे लोगों की फ़ोटो या वीडियो मत लीजिए।
अब हम उत्तर की ओर चलते हैं, उन भीड़ वाले घाटों को पार करते हुए जहाँ हम पहले जा चुके हैं, मणिकर्णिका तक।
पास पहुँचते ही घाट के पीछे की गलियाँ संकरी होने लगती हैं। दीवारों के साथ लकड़ियों के बड़े ढेर दिखते हैं, जो पुराने लोहे के तराज़ू पर तौले जाते हैं। शायद आपको गलियों से कुछ लोगों का एक छोटा समूह आता सुनाई दे, जो कपड़े और फूलों में लिपटे अपने प्रियजन को बाँस की अर्थी पर उठाए हैं, और राम के नाम की पुकार लगाते चल रहे हैं। जब वे आएँ, तो एक ओर हट जाइए, स्थिर खड़े रहिए, और उन्हें निकल जाने दीजिए।
मणिकर्णिका के काशी के लिए दो अर्थ हैं, और दोनों साथ-साथ रहते हैं।
पहला है कुंड, घाट के ऊपर सीढ़ियों पर बना पवित्र जलाशय। काशी खण्ड बताता है कि सृष्टि के आरंभ में विष्णु जी ने अपने चक्र से यह कुंड खोदा, उसे भरा, और उसके पास लंबी तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव उन्हें देखने आए, और तभी एक कर्णफूल, एक मणिकर्णिका, कुंड में गिर पड़ा। कथाएँ इस पर अलग हैं कि कर्णफूल शिव का था या पार्वती का, और हम उन्हें वैसे ही सुनाते हैं जैसे कही जाती हैं। कुंड के पास एक पत्थर भी है, जिस पर कहा जाता है कि विष्णु जी के चरण-चिह्न हैं।
दूसरा है श्मशान, काशी का सबसे बड़ा। स्थानीय परंपरा कहती है कि जितना किसी को याद है, यहाँ की अग्नि कभी नहीं बुझी। यह अग्नि और दाह-संस्कार का काम बहुत पीढ़ियों से डोम समुदाय के परिवारों की देखरेख में है, और वे यह कर्तव्य दिन-रात, हर मौसम में निभाते हैं।
दूर से आप परिवारों के कुछ कर्म देख सकते हैं, और उन्हें समझ लेना अच्छा है, ताकि आप उलझन में या चौंके नहीं। बहुत से परिवारों में दिवंगत को पहले नदी तक ले जाकर गंगाजल से स्पर्श कराया जाता है। फिर उन्हें लकड़ियों पर रखा जाता है, और कोई निकट संबंधी, अक्सर पुत्र, चिता की परिक्रमा करके घाट पर सदा जलती रखी गई अग्नि से उसे प्रज्वलित करता है। परिवार पास ही प्रतीक्षा करता है। बाद में जो शेष रहता है, उसे नदी को सौंप दिया जाता है। क्षेत्र, समुदाय और परिवार के साथ रीतियाँ बदलती हैं, और हर परिवार को एक पुरोहित उसकी अपनी रीति से कर्म करवाता है।
देखने वालों को पहली बार यह बहुत अजीब लग सकता है। परिवार के लिए हर कदम सेवा है, अपने प्रिय के लिए आख़िरी काम।
अब, यहाँ कैसे रहें। कृपया ये बातें याद रखिए, और जो आपके साथ आए, उसे भी बताइए।
धीरे चलिए, और सम्मानजनक दूरी रखिए। दाह-संस्कार या शोक में डूबे लोगों की फ़ोटो या वीडियो मत लीजिए, न घाट से, न नाव से। अगर आप नाव से मणिकर्णिका के सामने से गुज़र रहे हों, तो फ़ोन और कैमरा रख दीजिए। चिताओं के पास मत जाइए, और परिवारों या काम करने वालों के रास्ते में मत खड़े होइए। गर्मी और धुआँ तेज़ हो सकता है, ज़रूरत हो तो पीछे हट जाइए, और बच्चों को पास रखिए।
परिवारों से कुछ मत पूछिए, कितनी भी नरमी से क्यों न हो। वे अपनी विदाई के लिए आए हैं।
और श्मशान घुमाने की किसी पैसे वाली पेशकश को स्वीकार मत कीजिए। कोई आपके पास आकर सब कुछ समझाने या पास ले जाने की बात कर सकता है, और बाद में पैसे माँग सकता है, कभी यह कहकर कि यह ग़रीब परिवारों की लकड़ी के लिए है। विनम्रता से मना कर दीजिए, और आगे बढ़ जाइए। आप मदद करना चाहें, तो उन लोगों और संस्थाओं के ज़रिए कीजिए जिन्हें आप जानते हैं और जिन पर भरोसा करते हैं।
अगर आप थोड़ी देर दूर से रुकें, तो एक बात दिखेगी जो बहुत से लोगों को हैरान करती है। चिताओं के ठीक बगल में जीवन चलता रहता है। नावें गुज़रती हैं। किसी छत से एक बच्चा पतंग उड़ा रहा है। गलियों में चाय बँट रही है। पास के घाट पर लोग नहा रहे हैं। काशी में मृत्यु खुले में, नगरी के जीवन के बीच होती है, और नगरी उसे चुपचाप सँभाल लेती है।
यहाँ आए परिवारों के लिए यह शोक की जगह है, और भरोसे की भी। उनमें से बहुतों को विश्वास है कि उनके प्रिय को सबसे अच्छी विदाई मिली है। आप जो भी मानते हों, इसका सम्मान कर सकते हैं।
आइए, आप जहाँ भी हों, एक शांत पल साथ बिताएँ। अगर आपने किसी को खोया है, तो अभी उन्हें याद कीजिए। चाहें तो उनका नाम धीरे से लीजिए, या बस मन में। आप प्रार्थना करते हों, तो अपने ढंग से कीजिए। न करते हों, तो बस आभार के साथ उन्हें याद कीजिए।
धन्यवाद।
आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए। मणिकर्णिका पर गरिमा ज़्यादातर इससे दिखती है कि हम क्या नहीं करते। हम घूरते नहीं, वीडियो नहीं बनाते, बहुत पास नहीं जाते। अगली बार जब आप किसी और के दुख के पास हों, अस्पताल में, किसी अंतिम संस्कार में, या सड़क पर, तो उन्हें भी यही शांत सम्मान देकर देखिए।
अगले एपिसोड में, जो इस श्रृंखला का आख़िरी है, हम मणिकर्णिका से उत्तर की ओर शांत घाटों पर चलेंगे, और वहाँ रुकेंगे जहाँ वरुणा गंगा से मिलती है।