दशाश्वमेध और शाम की गंगा आरती
Episode 8 of 10 in काशी विश्वनाथ: प्रकाश की नगरी.
Narrated with an AI voice.
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- 12 min
- By
- DharmikStudio Originals
- Temple or tirtha
- Kashi Vishwanath Temple
- Narration
- AI voice
In this episode
- दशाश्वमेध घाट पर दस अश्वमेध यज्ञों की कथा और शाम की भव्य गंगा आरती का वर्णन है।
- आरती के दौरान दीप, शंख, घंटी और फूलों से नदी को सम्मानपूर्वक अर्पित किया जाता है।
- दर्शकों को शांति से बैठने, सुरक्षा का ध्यान रखने और आरती के बाद पत्तों का दीया प्रवाहित करने की सलाह दी गई है।
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नमस्कार। पिछले एपिसोड में हमने पुरानी काशी के दक्षिणी छोर पर, अस्सी पर एक सुबह बिताई। आज हम उत्तर की ओर दशाश्वमेध चलते हैं, नगरी का सबसे व्यस्त घाट, और शाम की गंगा आरती तक वहीं रुकते हैं।
हम दिन चढ़े पहुँचते हैं। दशाश्वमेध चौड़ा है और भीड़ से भरा। बाज़ार से एक चौड़ी सड़क सीधी नदी तक उतरती है, और अपने साथ सब कुछ बहा लाती है: सिर पर गठरी रखे तीर्थयात्री, गेंदे की टोकरियाँ लिए फूल वाले, कुर्सी पर अपनी दादी को उठाकर लाता एक परिवार, पुकारते नाविक, और पत्तों के छोटे दोने बेचते बच्चे, जिनमें एक दीया और कुछ फूल रखे होते हैं। बाँस की बड़ी छतरियों के नीचे पंडे बैठे हैं, यानी वे पुरोहित जो तीर्थयात्रियों को उनके कर्मकांड करवाते हैं। हर एक के पास लकड़ी का तख़्त, एक छोटा दर्पण, चंदन, और उन परिवारों की बही जिनकी वे सेवा करते हैं।
कई परिवार पीढ़ियों से एक ही पंडा परिवार के पास आते हैं। कहा जाता है कि कुछ पंडों के पास पुरानी बहियाँ हैं, जिनमें किसी परिवार के काशी आने का ब्योरा लिखा है, दादा, पिता, बेटा, और कभी-कभी कोई यात्री वहाँ किसी ऐसे पूर्वज का नाम खोज लेता है जो बहुत पहले यहाँ आया था। अगर आपका कोई पारिवारिक पंडा है, तो आप जानते होंगे। न हो, तो सीढ़ियों पर बैठने या स्नान करने के लिए इसकी ज़रूरत नहीं।
आइए, एक किनारे की सीढ़ी पर बैठें और सुनें कि इस घाट को यह नाम कैसे मिला।
स्कन्द पुराण का काशी खण्ड, जो काशी को समर्पित है, दिवोदास नाम के एक राजा की लंबी कथा सुनाता है। वे काशी पर इतनी अच्छी और इतनी कड़ाई से राज करते थे कि देवताओं को भी नगरी छोड़नी पड़ी। शिव, जिन्हें काशी सबसे प्रिय है, लौटना चाहते थे, और उन्होंने एक-एक करके दूसरों को आगे भेजा। उनमें ब्रह्मा जी भी थे।
काशी खण्ड के अनुसार ब्रह्मा जी एक वृद्ध ब्राह्मण के रूप में नगरी में आए और राजा दिवोदास से एक बड़े यज्ञ में सहायता माँगी। राजा ने उन्हें सब कुछ दिया, और ब्रह्मा जी ने यहीं गंगा के तट पर दस अश्वमेध यज्ञ किए, पुराने वैदिक विधान के बड़े यज्ञ। दस अश्वमेध, और इसी से घाट का नाम पड़ा, दशाश्वमेध।
कथा आगे बढ़ती है, और ब्रह्मा जी को भी, बाकियों की तरह, काशी छोड़ने का मन नहीं हुआ। वे यहीं रह गए, और काशी खण्ड कहता है कि यहाँ उनके नाम से एक शिवलिंग स्थापित हुआ। हम कथा वैसे ही सुना रहे हैं जैसे ग्रंथ में है। घाट पर पूछें, तो आपको यह कुछ अलग ढंग से सुनने को मिल सकती है, और काशी अपनी कथाओं को ऐसे ही जीवित रखती है।
दोपहर में घाट की रफ़्तार धीमी पड़ जाती है। पत्थर पर धूप तेज़ है। दशाश्वमेध के बगल में प्रयाग घाट है, जिसका नाम प्रयाग के संगम पर पड़ा, और सीढ़ियों पर शीतला माता का एक छोटा मंदिर है, जहाँ महिलाएँ जल और फूल लेकर आती हैं। नाविक अपनी नावों की छाँव में सो रहे हैं। एक नाई किसी ऐसे व्यक्ति की हजामत कर रहा है जिसने अभी-अभी अपने पिता के लिए कोई पारिवारिक कर्म पूरा किया है। कोई कबूतरों को दाना डाल रहा है। शाम की भीड़ से पहले पानी पीने, चुपचाप बैठने और पैरों को आराम देने का यह अच्छा समय है।
दोपहर ढलते ही आरती समिति के युवक तैयारी शुरू कर देते हैं। वे घाट के किनारे, नदी की ओर मुख किए, लकड़ी के ऊँचे तख़्तों की एक कतार लगाते हैं। हर तख़्त पर एक-सी चीज़ें सजाकर रखी जाती हैं: कई तलों वाला पीतल का बड़ा दीपक, शंख, घंटी, धूप, फूल, चँवर और मोरपंख का पंखा। वे सीढ़ियाँ बुहारते हैं और जल छिड़कते हैं। धीरे-धीरे लोग पीछे सीढ़ियों पर जगह लेने लगते हैं, और सामने नदी पर नावें जुटने लगती हैं।
सूर्यास्त के कुछ देर बाद आरती शुरू होती है। एक जैसे वस्त्रों में युवा पुजारियों की कतार तख़्तों पर आती है। शंख बजता है। फिर सब एक साथ, धीमी और मिलती-जुलती गति में, एक-एक वस्तु गंगा जी को अर्पित करते हैं। पहले धूप, हवा में गोल-गोल घुमाई जाती है। फिर लौ से भरे भारी दीपक, उठाए और घुमाए जाते हैं, और रोशनी पानी के ऊपर झूल जाती है। फिर चँवर और मोरपंख, धीरे-धीरे डुलाए जाते हैं, जैसे किसी सम्मानित अतिथि को हवा की जाती है। पूरे समय घंटियाँ बजती हैं, और गंगा जी के भजन मनुष्य की आवाज़ में गाए जाते हैं, कभी कोई गायक, कभी पूरी भीड़।
पूरी आरती लगभग पौन घंटे चलती है। आयोजकों के साथ शब्द और क्रम थोड़े बदलते हैं, और अस्सी पर और कुछ दूसरे घाटों पर भी आरती होती है, हर एक का अपना ढंग। जो ज़्यादा नहीं बदलता, वह है भाव। देश के हर कोने से और विदेश से आए हज़ारों लोग एक साथ चुप हो जाते हैं, और अँधेरी नदी पर लौ को घूमते देखते हैं।
नदी की आरती क्यों? भारत के बहुत से परिवारों में गंगा को माँ कहा जाता है, गंगा मैया, और उनसे वैसा ही व्यवहार होता है जैसा किसी प्रिय और आदरणीय से। बहुत से घरों में अतिथि या देवता का स्वागत और आभार आरती से ही होता है, सामने दीप घुमाकर। तो शाम को नगरी अपने दीप उस नदी की ओर घुमाती है जिसने दिन भर उसे जल, काम और आस्था दी। आप यह विश्वास मानें या न मानें, आपके बगल में बैठे लोगों के लिए इसका क्या अर्थ है, यह आप महसूस कर सकते हैं।
अब आरती को सम्मान से देखने के कुछ सरल तरीके, ताकि आपके लिए भी और आसपास सबके लिए भी सब ठीक रहे।
जल्दी आइए। सीढ़ियों पर जगह चाहिए तो सूर्यास्त से कम से कम एक घंटा पहले। जहाँ स्वयंसेवक बताएँ, वहाँ बैठिए, और बैठे हुए लोगों के सामने खड़े मत होइए। अगर तख़्तों के आगे की जगह खाली रखी गई है, तो उसे खाली ही रहने दीजिए। घाट के किसी हिस्से में जूते उतारने को कहा जाए, तो उतार दीजिए, और उन्हें थैले में अपने पास रखिए।
एक-दो फ़ोटो लेने में हर्ज नहीं। पर फ़्लैश बंद रखिए, फ़ोन नीचे रखिए, और पूरे समय उसे दूसरों के सिर के ऊपर मत उठाए रखिए। हो सके तो आरती के कुछ हिस्से में फ़ोन पूरी तरह रख दीजिए। जो आपने महसूस किया, वह आपको उससे ज़्यादा याद रहेगा जो आपने रिकॉर्ड किया।
जब लोग खड़े हों, आप भी खड़े हो सकते हैं। जब लोग हाथ जोड़ें, आप भी जोड़ सकते हैं, या बस चुपचाप बैठे रह सकते हैं। किसी को उम्मीद नहीं कि आप हर चरण जानते हों, और किसी को आपको यह महसूस नहीं कराना चाहिए कि आप ग़लत कर रहे हैं।
आख़िर में अक्सर एक दीप भीड़ की ओर लाया जाता है। बहुत से लोग लौ पर हाथ फेरकर आँखों या माथे से लगाते हैं, रोशनी का आशीर्वाद लेते हैं। चाहें तो आप भी ऐसा कर सकते हैं। न चाहें, तो सिर थोड़ा झुका देना काफ़ी है।
आरती के बाद बहुत से लोग पत्तों के दोने में फूलों के साथ एक छोटा दीया नदी में प्रवाहित करते हैं। अगर आप करें, तो ऐसा दोना चुनिए जो सिर्फ़ पत्तों और फूलों का हो, और उसे सबसे निचली सीढ़ी या नाव से धीरे से रखिए। कृपया गंगा में प्लास्टिक, पन्नी या पैकेट मत डालिए।
सुरक्षा की एक बात। दशाश्वमेध की सीढ़ियाँ खड़ी हैं और भीड़ भरी, और अँधेरे में ठीक से दिखती भी नहीं। बुज़ुर्गों के लिए पानी से दूर, ऊपर बैठना आसान रहेगा। बच्चों का हाथ पकड़े रहिए, और बिछड़ने की हालत में मिलने की एक जगह पहले से तय कर लीजिए। अपना सामान अपने पास रखिए।
नाव से देखें, तो पंजीकृत नाविक के साथ जाइए, लाइफ़ जैकेट माँगिए और पहनिए। नाव में ज़्यादा लोग न हों, और बैठे रहिए। जब घाट के सामने बहुत सी नावें सट जाएँ, तो एक नाव से दूसरी पर मत चढ़िए। बरसात में जब नदी ऊँची और तेज़ हो, तो नावों को जाने की अनुमति नहीं भी मिल सकती, और कभी-कभी आरती सीढ़ियों पर ऊपर या किसी छत पर होती है। घाट के कर्मचारी और जल पुलिस जो कहें, वही मानिए।
साल की कुछ रातों में, ख़ासकर कार्तिक पूर्णिमा की देव दीपावली पर, पूरा किनारा एक छोर से दूसरे छोर तक दीपों से जगमगा उठता है, और भीड़ बहुत बड़ी होती है। किसी पर्व पर आने की सोच रहे हों, तो अपने शहर के लिए सही तिथि पंचांग में देख लीजिए, और बहुत जल्दी पहुँचने की योजना बनाइए।
जब तक हम चलते हैं, भीड़ छँटने लगी है। पुजारी दीपक बक्सों में रख रहे हैं। पत्तों के छोटे दीये धीरे-धीरे धारा के साथ बह रहे हैं, कुछ अभी भी जल रहे हैं। फूल वाले झाड़ू लगा रहे हैं। नदी फिर अँधेरी और शांत है।
आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए। आरती में हज़ारों अनजान लोग एक साथ रुककर एक ही रोशनी को देखते हैं। आज रात सोने से पहले एक छोटा दीया जलाइए, या बस एक को छोड़कर सारी बत्तियाँ बुझा दीजिए, और एक मिनट उसके साथ चुपचाप बैठिए।
अगले एपिसोड में हम काशी के श्मशान घाटों, हरिश्चंद्र और मणिकर्णिका चलेंगे, धीरे से, सम्मान के साथ।