भोर में अस्सी - नदी का नाम और सुबह की सभा

नदी का नाम और सुबह की सभा

Episode 7 of 10 in काशी विश्वनाथ: प्रकाश की नगरी.

Narrated with an AI voice.

Reading time
9 min
Listening time
12 min
By
DharmikStudio Originals
Temple or tirtha
Kashi Vishwanath Temple
Narration
AI voice

In this episode

  • अस्सी घाट का नाम असि नदी से आया है।
  • सुबह की सभा में वेद पाठ और आरती होती है।
  • सूरज उगने पर नदी में अर्घ्य देना एक अच्छा तरीका है।

Read along

नमस्कार। काशी के घाटों पर आपका फिर से स्वागत है। पिछले एपिसोड में हमने एक ही सुबह में अस्सी से मणिकर्णिका तक पूरा किनारा नापा था। आज हम कुछ धीमे चलेंगे। हम अपनी पदयात्रा के पहले घाट, अस्सी पर लौटते हैं, और तब तक यहीं रहते हैं जब तक सूरज अच्छी तरह ऊपर न आ जाए।

जब हम पहुँचते हैं, तो अभी अँधेरा है। घाट की बत्तियाँ जल रही हैं, नदी काली है, और उस पार से रोशनी के छोटे-छोटे बिंदु दिखते हैं। सीढ़ियों के ऊपर एक दुकान पर चाय चढ़ चुकी है। कुछ लोग शॉल ओढ़े पत्थर पर बैठे इंतज़ार कर रहे हैं। आइए, सीढ़ियों पर एक जगह ढूँढ़ें और उनके साथ बैठ जाएँ।

ज़रा आसपास की आवाज़ें सुनिए। इस समय नदी लगभग चुप है, बस सबसे निचली सीढ़ी पर हल्की-सी छप-छप। चाय की दुकान की गर्म दीवार से सटा एक कुत्ता सो रहा है। पीछे गलियों में कहीं एक मंदिर की घंटी एक बार बजती है और रुक जाती है। ऊपर सड़क पर एक रिक्शा चरमराता हुआ निकल जाता है। नीचे का पत्थर अभी भी रात की ठंडक लिए हुए है।

पहले नाम की बात। अस्सी नाम असि से आया है, एक छोटी नदी जो नगर के दक्षिणी छोर पर यहाँ गंगा में मिलती है। दूर उत्तर में एक और नदी, वरुणा, भी गंगा से मिलती है। स्कन्द पुराण का काशी खण्ड, जो पूरा का पूरा काशी को समर्पित है, कहता है कि काशी का पवित्र क्षेत्र इन्हीं दो नदियों के बीच है। बहुत से लोग वाराणसी नाम को भी ऐसे ही समझाते हैं, वरुणा और असि के बीच बसी नगरी।

तो जब आप अस्सी पर बैठते हैं, तो पुरानी पवित्र नगरी के एक छोर पर बैठे होते हैं। इसीलिए बहुत से तीर्थयात्रियों की गंगा किनारे की यात्रा यहीं से शुरू होती है।

काशी में असि के नाम को लेकर एक कथा भी कही जाती है। असि का एक अर्थ है तलवार। एक स्थानीय परंपरा कहती है कि एक बड़े युद्ध के बाद देवी दुर्गा ने अपनी तलवार नीचे फेंकी, और जहाँ वह गिरी, वहाँ से यह छोटी नदी निकली। यह कथा अलग-अलग ढंग से सुनाई जाती है, और कुछ लोगों ने इसे सुना भी नहीं है। हम इसे स्थानीय परंपरा के रूप में, जैसे घाटों पर कही जाती है, वैसे ही सुना रहे हैं।

आज अगर आप असि नदी को ढूँढ़ें, तो शायद हैरान हों। शहर के बढ़ने के साथ यह बहुत बदल गई है, अब एक पतली-सी धारा है, और सूखे महीनों में इसे पहचानना भी मुश्किल हो सकता है। पर नाम घाट के साथ बना रहा, और संगम के पास शिव का एक छोटा मंदिर है, संगमेश्वर, यानी नदियों के मिलन के स्वामी।

सीढ़ियाँ थोड़ा ऊपर चढ़िए, तो वही पीपल का पेड़ मिलेगा जिसके पास से हम पहले एपिसोड में गुज़रे थे। उसके नीचे एक शिवलिंग है, शिव का वह सादा गोल रूप जिसकी पूजा होती है। कोई भी उस पर जल चढ़ा सकता है। लोग पीतल का छोटा लोटा लेकर आते हैं, थोड़ा जल चढ़ाते हैं, पत्थर को छूते हैं, और आगे बढ़ जाते हैं। कोई एक मिनट रुकता है, कोई बहुत देर। कितनी देर रुकना है, यह कोई तय नहीं करता।

अब आसमान हल्का होने लगा है। यही वह समय है जब सुबह की सभा शुरू होती है।

पिछले कुछ वर्षों से अस्सी की सीढ़ियों पर सुबह का एक नियमित कार्यक्रम होता है। वेद पढ़ने वाले विद्यार्थी कतार में बैठकर पाठ करते हैं। गंगा जी की सुबह की आरती होती है, नदी की ओर दीप उठाए जाते हैं। अक्सर संगीत होता है, कोई गायक या बाँसुरी, और उसके बाद घाट पर चटाइयाँ बिछाकर लोग योग करते हैं। मौसम के साथ इसका रूप कुछ बदलता रहता है, तो अगर आपको कुछ अलग दिखे तो हैरान मत होइए।

पाठ मनुष्य की आवाज़ में होता है, उन विद्यार्थियों की आवाज़ में जिन्होंने इसे अपने गुरुओं से सीखा है, और हम उसे उन्हीं के लिए छोड़ते हैं। हम बस उसका भाव बता सकते हैं। सीढ़ियों से एक स्थिर, सधी हुई ध्वनि उठती है, और उस पार रोशनी बढ़ती जाती है। जो लोग संस्कृत का एक शब्द नहीं जानते, वे भी चुपचाप बैठकर सुनते हैं। कुछ की आँखें बंद हो जाती हैं।

अगर आप वहाँ हों, तो जहाँ बताया जाए वहाँ बैठिए, आवाज़ धीमी रखिए, और फ़ोन साइलेंट पर रखिए। नदी या आसमान की फ़ोटो लेने में कोई हर्ज नहीं। पर जब आरती हो रही हो, तो फ़ोन नीचे रखकर बस देखना अच्छा लगता है।

देखिए, यहाँ और कौन-कौन है। पास के विश्वविद्यालय के विद्यार्थी, कोई किताब लिए, कोई क्रिकेट का बल्ला। एक बुज़ुर्ग दंपति, जो बरसों से हर सुबह आते हैं। आंध्र से आया तीर्थयात्रियों का एक दल, रंग-बिरंगी साड़ियों में महिलाएँ, जो अपने दिन के दर्शन शुरू कर रही हैं। नाविक धीरे-धीरे पुकारते हैं, कोई नदी में चलना चाहे तो।

इनमें से कुछ तीर्थयात्रियों के लिए आज पंचतीर्थी का दिन है। काशी खण्ड पर आधारित काशी की परंपरा में नदी किनारे पाँच पवित्र स्नान-स्थल हैं: अस्सी, दशाश्वमेध, आदि केशव, पंचगंगा और मणिकर्णिका। कुछ लोग एक ही दिन में पाँचों पर स्नान करते हैं, और अक्सर यहीं दक्षिणी छोर से शुरू करते हैं। कुछ लोग इसे कई दिनों में करते हैं। परंपराएँ अलग-अलग हैं, और हर परिवार का अपना ढंग है।

इस समय बहुत से लोग नाव से घाट देखना पसंद करते हैं। अगर आप जाएँ, तो पंजीकृत नाविक चुनिए, लाइफ़ जैकेट माँगिए और पहनिए, भले ही नाव में कोई और न पहने। नाव में सीटों से ज़्यादा लोग न बैठें, और चढ़ने से पहले ही किराया और रास्ता तय कर लीजिए, ताकि बाद में किसी को बुरा न लगे। नाव चलते समय बैठे रहिए। बीच धारा से पूरी नगरी का मोड़ एक साथ दिखता है, उत्तर की ओर एक के बाद एक उठते घाट, सब आपकी ओर मुख किए।

घाट से कुछ मिनट भीतर की ओर चलें तो लोलार्क कुंड है, एक गहरा, बहुत पुराना सीढ़ीदार कुंड, जिसे काशी में सूर्य की उपासना से जोड़ा जाता है। सुबह के बाद समय हो, तो रास्ता पूछ लीजिए। वह एक शांत जगह है, पर सीढ़ियाँ खड़ी हैं, इसलिए सँभलकर जाइए।

अब सूरज उग आया है। यही वह क्षण है जब बहुत से लोग नदी में उतरकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं।

अगर आप खुद देना चाहें, तो एक सरल तरीका यह है। पानी के किनारे या सबसे निचली सूखी सीढ़ी पर सूर्य की ओर मुँह करके खड़े होइए। लोटा लीजिए, या बस अंजलि बनाइए, और उसमें जल भर लीजिए। उसे लगभग छाती की ऊँचाई तक उठाइए, और जल को पतली धार में धीरे-धीरे वापस नदी की ओर गिरने दीजिए। बहुत से लोग गिरते जल के बीच से उगते सूरज को देखते हैं। कोई अपने परिवार से सीखी प्रार्थना बोलता है। आपकी अपनी कोई प्रार्थना हो, तो धीरे से, अपने शब्दों में कहिए। न हो, तो एक सीधा-सा धन्यवाद काफ़ी है।

आइए, अभी साथ मिलकर करें, आप जहाँ भी हों। घर पर हों तो खिड़की की रोशनी की ओर मुड़िए। एक धीमी साँस लीजिए, और अपने शब्दों में धन्यवाद कहिए।

गंगा में उतरने से पहले सुरक्षा की कुछ बातें, क्योंकि हम चाहते हैं कि आप सकुशल घर लौटें।

सिर्फ़ सीढ़ियों के पास नहाइए, जहाँ और लोग नहा रहे हों। कई घाटों पर पानी में ज़ंजीरें या खंभे लगे होते हैं, उन्हें पकड़े रहिए। भोर में नदी शांत दिखती है, पर थोड़ा आगे धारा तेज़ है, और तल अचानक गहरा हो सकता है। कृपया तैरकर आगे न जाइए, और कभी अकेले मत नहाइए। बच्चों को पास रखिए और उनका हाथ पकड़े रहिए। बरसात में जब नदी चढ़ी हो और पानी तेज़ बह रहा हो, तो सीढ़ियों से ही अर्घ्य देना ठीक है, पानी में न उतरें। जल पुलिस या घाट के कर्मचारी बाहर आने को कहें, तो उनकी बात मानिए।

गंगा को साफ़ रखिए। पानी में साबुन या शैम्पू न लगाइए, और सीढ़ियों पर या नदी में प्लास्टिक न छोड़िए। अब कई घाटों पर फूल और पूजा-सामग्री रखने की अलग जगह होती है। मिले तो उसी का उपयोग कीजिए।

जब तक हम उठते हैं, घाट भर चुका है। चाय की दुकान पर कतार लगी है। योग की चटाइयाँ लपेटी जा रही हैं। नावें उत्तर की ओर, भीड़ वाले घाटों की तरफ़ बढ़ रही हैं, और पानी पर रोशनी धूसर से सुनहरी हो गई है।

आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए। अस्सी पर दिन अँधेरे में शुरू होता है, उन लोगों के साथ जो रोशनी से पहले आकर उसका इंतज़ार करते हैं। कल सूर्योदय से कुछ मिनट पहले उठिए, किसी शांत जगह बैठिए, और रोशनी को आते देखिए। और कुछ करने की ज़रूरत नहीं।

अगले एपिसोड में हम उत्तर की ओर दशाश्वमेध चलेंगे, काशी का सबसे व्यस्त घाट, और शाम की गंगा आरती तक वहीं रुकेंगे।

Keep going