फिर से बना मंदिर: भवन की कथा
Episode 4 of 10 in काशी विश्वनाथ: प्रकाश की नगरी.
Narrated with an AI voice.
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- DharmikStudio Originals
- Temple or tirtha
- Kashi Vishwanath Temple
- Narration
- AI voice
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नमस्कार। काशी विश्वनाथ पर हमारी कथा-माला में आपका फिर से स्वागत है। अब तक हमने अविमुक्त नाम का अर्थ सुना, दशाश्वमेध पर नदी किनारे बैठे, और काशी के परिवार से मिले, माँ अन्नपूर्णा, काल भैरव और ढुण्ढिराज गणेश। आज हम स्वयं भवन की बात करेंगे।
यह पत्थर, सोने और बहुत से हाथों की कथा है। यह ऐसी कथा भी है जो कभी-कभी गुस्से के साथ सुनाई गई है। हम इसे शांति से सुनाएँगे, जैसे काशी का कोई बुज़ुर्ग अपने पोते-पोती को सुनाए, जो पता है उतना कहते हुए, और बाकी को सावधानी से छोड़ते हुए।
शुरुआत नगरी से करते हैं, जो इसके किसी भी मंदिर से बहुत पुरानी है।
काशी का नाम बहुत पुराने ग्रंथों में आता है, और इतिहास में यह प्राचीन भारत के बड़े राज्यों में से एक का नाम था। सदियों में बहुत-सी परंपराओं को यहाँ और आस-पास घर मिला। नगरी के बाहर ही सारनाथ है, जहाँ बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया, और जिसे संसार भर के बौद्ध पवित्र मानते हैं। जैन परंपरा अपनी मान्यता में वाराणसी को अपने तीर्थंकर पार्श्वनाथ की जन्मभूमि मानती है। ये सब अपनी-अपनी परंपराओं के हैं, और हम इनका नाम बस यह कहने के लिए लेते हैं कि काशी सदा से बहुत से साधकों की नगरी रही है।
शिव के उपासकों के लिए काशी का हृदय सदा विश्वनाथ रहे हैं। जैसा हमने पहली बैठक में सुना, यात्री यहाँ इतनी सदियों से आ रहे हैं कि ठीक-ठीक गिनना कठिन है। और उन सदियों में मंदिर का भवन एक-सा नहीं रहा।
सबसे सीधे शब्दों में कहें तो, विश्वनाथ का मंदिर एक से अधिक बार टूटा और फिर बना। भवन बने, इतिहास की उथल-पुथल में गिराए गए, और फिर लोग जुटे और दोबारा बनाया। इतिहासकार हर दौर के बारे में विस्तार से लिखते हैं, और उनमें हमेशा सहमति नहीं होती। हम हर घटना में नहीं जाएँगे, और किसी को खलनायक नहीं कहेंगे। हम उस बात को थामे रखना चाहते हैं जो हर बार बाद में हुई। पूजा रुकी नहीं, और लोग बनाने के लिए लौटते रहे।
एक पुनर्निर्माण जिसे अक्सर याद किया जाता है, सोलहवीं सदी के अंत में हुआ। विवरण बताते हैं कि उस समय के प्रसिद्ध मंत्री राजा टोडरमल ने काशी के एक आदरणीय विद्वान नारायण भट्ट के साथ मिलकर यहाँ मंदिर बनवाने में सहायता की। वह मंदिर भी टिका नहीं। उसके बाद लंबे समय तक विश्वनाथ की पूजा सादे ढंग से, छोटी जगहों में चलती रही, उन पुजारियों और परिवारों के सहारे जिन्होंने बिना किसी भव्य भवन के भी रोज़ की पूजा जारी रखी।
इस पर एक पल सोचिए। बरसों तक यात्री काशी आते रहे। वे दशाश्वमेध और मणिकर्णिका पर नहाते रहे। वे ढुण्ढिराज, माँ अन्नपूर्णा और काल भैरव को प्रणाम करते रहे। और वे विश्वनाथ को जल चढ़ाते रहे, तब भी जब उनके चारों ओर का भवन छोटा और सादा था। जिस नगरी को कभी छोड़ा नहीं जाता, उसने अपने स्वामी को सँजोए रखा, शिखर हो या न हो।
फिर अठारहवीं सदी में मध्य भारत की एक रानी आईं।
अहिल्याबाई होलकर नर्मदा के किनारे बसे महेश्वर से राज करती थीं। उन्होंने कम उम्र में पति को खोया, बाद में ससुर और पुत्र को भी, और राज का काम स्वयं सँभाला। उन्हें एक सावधान और न्यायी शासिका के रूप में याद किया जाता है। उन्हें भारत भर के तीर्थों को दिए उनके दानों के लिए भी याद किया जाता है। मंदिर, घाट, कुएँ, यात्रियों के लिए धर्मशालाएँ। उनका नाम बहुत से प्रदेशों के तीर्थों में मिलता है।
अहिल्याबाई स्वयं शिव की भक्त थीं। अक्सर कहा जाता है कि वे अपने राज्य को शिव की धरोहर मानती थीं, और उनके आदेश शंकर के नाम से जारी होते थे। इस रीति का ठीक-ठीक रूप जो भी रहा हो, उसका भाव उनकी स्मृति में साफ़ दिखता है। लोग उन्हें ऐसी भक्त के रूप में याद करते हैं जिन्होंने राज्य के धन को दूसरों की अमानत माना, यात्रियों, राहगीरों और गरीबों के काम आने के लिए। मालवा के बहुत से घरों में आज भी उनका चित्र लगा है, और काशी में भी उन्हें बड़े अपनेपन से याद किया जाता है।
काशी में विश्वनाथ का जो मंदिर आज खड़ा है, वह उन्होंने बनवाया। वह 1780 में पूरा हुआ। बड़े मंदिरों के हिसाब से यह एक सादा भवन है, पत्थर का बना, गर्भगृह के ऊपर उठते शिखर के साथ। यह गलियों के बीच सटकर खड़ा है, जैसे काशी के पुराने मंदिर हमेशा खड़े रहे हैं।
अहिल्याबाई का मंदिर पूरा होने के लगभग पचास वर्ष बाद, दूर उत्तर-पश्चिम से एक और राजा ने अपनी भेंट दी। पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने शिखर और गुंबद को मढ़ने के लिए सोना दिया। यही वह सोना है जो आज गलियों के ऊपर चमकता दिखता है, और इसीलिए बनारस के इतने लोग विश्वनाथ मंदिर को स्वर्ण मंदिर कहते हैं।
मंदिर न्यास के अपने प्रकाशित इतिहास में ये दोनों भेंटें दर्ज हैं, अहिल्याबाई का भवन और रणजीत सिंह का सोना। हमें यह बात मन को छूती है कि जो मंदिर आज हम देखते हैं, उसे मालवा की एक रानी ने खड़ा किया और पंजाब के एक राजा ने सोने से मढ़ा। बरसों में और भी बहुत लोगों ने दिया, राजाओं ने, व्यापारियों ने, साधारण परिवारों ने, कुछ के नाम दर्ज हैं और बहुतों के नाम कोई नहीं जानता। यह भवन भारत के बहुत से हिस्सों की ओर से एक छोटी-सी नगरी को दी गई भेंट है।
अब हम अपने समय के पास आते हैं।
1983 में उत्तर प्रदेश राज्य के एक क़ानून के तहत मंदिर का प्रबंध एक न्यास को सौंपा गया। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास आज मंदिर की रोज़ की पूजा और यात्रियों की व्यवस्था देखता है। यही न्यास मंदिर का इतिहास और आरतियों की सूची भी प्रकाशित करता है, जिनकी बात हम अगली बैठक में करेंगे।
बहुत लंबे समय तक मंदिर तक केवल संकरी गलियों से पहुँचा जा सकता था, जिनके दोनों ओर घर ही घर थे। जो लोग हाल के बदलावों से पहले गए हैं, उन्हें याद होगा कि कैसे भेंट को सिर के ऊपर उठाए भीड़ में से निकलना पड़ता था। नदी बहुत पास थी, बस थोड़ा नीचे उतरने पर, पर मंदिर से दिखती नहीं थी।
2021 में मंदिर के चारों ओर एक बड़ा नया परिसर खुला, जिसे काशी विश्वनाथ धाम कहते हैं। यह मंदिर को एक चौड़े रास्ते और खुले आँगनों के साथ सीधे गंगा के घाटों से जोड़ता है, यात्रियों के लिए भवन हैं और लोगों के जुटने के लिए जगह है। इसके लिए मंदिर के आस-पास के बहुत से पुराने घर लिए गए। काम के दौरान उन घरों के भीतर कई छोटे पुराने देवस्थान मिले, कुछ बरसों में दीवारों और कमरों के भीतर आ गए थे। इनमें से बहुतों को सँजोकर सबके सामने लाया गया।
धाम के बारे में काशी के लोगों के भाव अलग-अलग हैं, जैसे किसी भी पुराने मोहल्ले में बड़े बदलाव पर होते हैं। कुछ लोग खुली जगह से और इस बात से खुश हैं कि बुज़ुर्ग और परिवार मंदिर तक आसानी से पहुँच पाते हैं। कुछ लोगों को पुरानी गलियों और वहाँ के घरों की याद आती है। हम इन भावों में से किसी को नहीं चुनेंगे। दोनों एक ही नगरी के प्रेम से आते हैं।
इतना साफ़ है कि मंदिर फिर से नया हुआ है, अपने समय के ढंग से। उसके हृदय में गर्भगृह, अहिल्याबाई का पत्थर का मंदिर और रणजीत सिंह का सोना, आज भी वहीं है जहाँ था। पूजा पहले की तरह चलती है, भोर से पहले के दीप से लेकर रात के दीप तक।
तो आइए, आज जो सुना उसे समेट लें।
काशी अपने किसी भी भवन से बहुत पुरानी है, और लंबे समय से बहुत से साधकों का घर रही है। विश्वनाथ का मंदिर एक से अधिक बार टूटा और फिर बना। सोलहवीं सदी के अंत का एक पुनर्निर्माण राजा टोडरमल और विद्वान नारायण भट्ट के नाम से याद किया जाता है। उसके बाद लंबे समय तक पूजा सादे ढंग से चलती रही। 1780 में अहिल्याबाई होलकर ने आज का मंदिर बनवाया, और लगभग पचास वर्ष बाद महाराजा रणजीत सिंह ने उसे मढ़ने के लिए सोना दिया। 1983 से एक न्यास मंदिर का प्रबंध करता है, और 2021 में काशी विश्वनाथ धाम ने मंदिर को नदी की ओर खोल दिया।
आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए। इस कथा के हर बदलाव में मंदिर को आगे ले जाने वाले वे लोग थे जो बार-बार बनाने लौटे, और वे पुजारी जिन्होंने दीप जलाए रखा। अगर आपके जीवन में कुछ टूटा है, कोई आदत, कोई मित्रता, पूजा का कोई नियम, तो इस हफ़्ते उसे फिर से बनाने की ओर एक छोटा-सा कदम सोचिए। कदम बड़ा होना ज़रूरी नहीं। शुरुआत के लिए एक दीप काफ़ी है।
अगली और इस कथा-माला की अंतिम बैठक में हम मंदिर के भीतर एक पूरा दिन बिताएँगे, भोर से पहले की मंगला आरती से रात की शयन आरती तक, और बात करेंगे कि दर्शन सावधानी और आदर से कैसे करें।