राम की खोज, शबरी की प्रतीक्षा
Episode 11 of 20 in रामायण: वाल्मीकि की कथा.
Narrated with an AI voice.
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नमस्कार। आइए, बैठिए। पिछली बार हमने सुना था कि राम सोने के हिरण के पीछे दूर निकल गए थे, और उसी बीच पंचवटी से सीता को हर लिया गया। बूढ़े जटायु ने आकाश में रथ को रोकने की कोशिश की। और सीता ने अपने गहने एक-एक करके नीचे पहाड़ियों पर गिरा दिए।
आज की बैठक में हम राम के साथ उस सूनी कुटिया तक लौटेंगे।
*[ठहराव]*
राम को अभी-अभी पता चला है कि वह हिरण एक छल था। लौटते हुए रास्ते में उन्हें लक्ष्मण मिलते हैं। लक्ष्मण सीता को अकेला छोड़कर इसलिए आए थे क्योंकि सीता ने बहुत आग्रह करके उन्हें भाई की सहायता के लिए भेजा था। राम का मन बैठ जाता है। वे बार-बार पूछते हैं, तुमने उसे अकेला क्यों छोड़ा? दोनों भाई तेज़ी से कुटिया की ओर भागते हैं।
कुटिया वहीं है। सीता के लगाए फूल वहीं हैं। घास की चटाइयाँ वहीं बिछी हैं। बस सीता नहीं हैं।
*[ठहराव]*
यहाँ वाल्मीकि जी कुछ ऐसा करते हैं जो पहली बार सुनने वालों को चौंका देता है। वे राम को टूटने देते हैं। ये वही राम हैं जो बिना माथे पर शिकन लाए राज्य छोड़कर चल दिए थे। और अब वे एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक दौड़ रहे हैं। कदम्ब से पूछते हैं, तुमने मेरी सीता को देखा? बेल से पूछते हैं, अशोक से पूछते हैं, ऊँचे अर्जुन के पेड़ से पूछते हैं। गोदावरी नदी से पूछते हैं, और नदी चुप रहती है। हिरणों से पूछते हैं, और वाल्मीकि कहते हैं कि सारे हिरण मुड़कर दक्षिण दिशा की ओर देखने लगते हैं।
मुझे यह बहुत अच्छा लगता है कि वाल्मीकि जी ने यह हिस्सा रखा। वे चाहते तो हमें ऐसा नायक दे सकते थे जो कभी डगमगाता ही नहीं। पर उन्होंने हमें एक ऐसा पति दिया जिसकी पत्नी खो गई है और जिसका मन कुछ सोच नहीं पा रहा। दुख में राम यहाँ तक कह बैठते हैं कि इस चुप्पी का दंड मैं सारे संसार को दूँगा।
*[ठहराव]*
और तब छोटे भाई लक्ष्मण उन्हें सँभालते हैं। बड़े प्यार से याद दिलाते हैं, भैया, शोक में बड़े-बड़े ज्ञानी भी अपना ज्ञान भूल जाते हैं। सारे संसार पर क्रोध करने से सीता नहीं मिलेंगी। खोजने से मिलेंगी। तो दोनों भाई खोज में लग जाते हैं।
जल्दी ही निशान मिलने लगते हैं। ज़मीन पर सीता के केशों से गिरे फूल। किसी रथ के टूटे हुए टुकड़े। एक गिरा हुआ छत्र। और थोड़ा आगे, धरती पर पड़ा एक विशाल पक्षी, बहुत घायल और बहुत कमज़ोर।
ये **जटायु** हैं। गिद्धों के राजा, पिता दशरथ के पुराने मित्र, जिन्होंने वन में सीता की देखभाल का वचन दिया था।
*[ठहराव]*
एक पल को राम समझ नहीं पाते, और उन्हें लगता है कि कहीं यही पक्षी तो दोषी नहीं। तभी जटायु धीरे-धीरे बोलते हैं। वे बताते हैं कि लंका का राजा **रावण** सीता को अपने रथ में ले गया। मैंने उसे रोकने की कोशिश की। पर मैं बूढ़ा था, रोक नहीं पाया। रावण दक्षिण की ओर गया है।
जटायु के पास बस इतना कहने भर की साँस बची थी। इतना कहकर वे राम की गोद में ही अपना शरीर छोड़ देते हैं।
यहाँ वाल्मीकि फिर से हमें राम का हृदय दिखाते हैं। राम लक्ष्मण से कहते हैं, यह पक्षी मेरे पिता का मित्र था। इसने सीता के लिए अपने प्राण दे दिए। यह मुझे पिता जितना ही प्रिय है। राम स्वयं लकड़ियाँ इकट्ठी करते हैं, अग्नि जलाते हैं, और पूरे विधि-विधान से, जल और मंत्रों के साथ, जटायु का अंतिम संस्कार करते हैं, जैसे कोई पुत्र अपने पिता का करता है।
ज़रा सोचिए। अयोध्या का एक राजकुमार, शोक में डूबा, जल्दी में, फिर भी रुककर एक पक्षी को वह पूरा सम्मान देता है जो किसी बुज़ुर्ग को दिया जाता है। रामायण में प्रेम इस बात से नहीं नापा जाता कि किसने कौन-सा शरीर पाया है। वह इस बात से नापा जाता है कि उसने किया क्या।
*[ठहराव]*
अब दोनों भाई घने जंगल से होते हुए दक्षिण-पश्चिम की ओर बढ़ते हैं। रास्ते में उन्हें **कबन्ध** नाम का एक विचित्र प्राणी मिलता है, एक विशाल आकार जिसका सिर साफ़ दिखाई नहीं देता, और जो उनका रास्ता रोक लेता है। दोनों भाई उसे उस रूप से मुक्त करते हैं, और वह एक पुराने शाप से छूट जाता है। कृतज्ञ होकर वह उन्हें वही सलाह देता है जिसकी उन्हें सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी।
वह कहता है, पम्पा सरोवर की ओर जाओ। उसके पास ऋष्यमूक पर्वत है, जहाँ **सुग्रीव** नाम के एक वानर अपने कुछ विश्वासी मित्रों के साथ छिपकर रहते हैं। उनका भी घर छिन गया है, उनकी पत्नी भी उनसे दूर है। उनसे मित्रता करो। वे सीता को खोजने में तुम्हारी मदद करेंगे।
और कबन्ध यह भी कहता है, पम्पा के पश्चिमी किनारे पर **शबरी** नाम की एक वृद्ध तपस्विनी रहती हैं। उनसे ज़रूर मिलना।
*[ठहराव]*
तो अब शबरी की बात। वन में राम जितने लोगों से मिलते हैं, उनमें शायद शबरी ही वे हैं जिन्हें भक्त सबसे ज़्यादा अपने दिल के पास रखते हैं।
वाल्मीकि की कथा में शबरी वन में रहने वाली एक स्त्री हैं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन **मतंग** ऋषि के आश्रम के मुनियों की सेवा में बिताया। जब उनके गुरु इस संसार से विदा होने लगे, तो उन्होंने शबरी से कहा, तुम यहीं रहना। एक दिन राम आएँगे। उनकी सेवा करना, तुम्हें परम गति मिलेगी।
तो वे वहीं रहीं। बरस पर बरस। आश्रम को साफ़ रखतीं। रास्ते बुहारतीं। पम्पा के आसपास के जंगल से फल चुनकर रखतीं। उन्हें नहीं पता था कि राम कब आएँगे। बस इतना पता था कि गुरु ने कहा है, आएँगे।
*[ठहराव]*
और एक दिन वे आते हैं।
वाल्मीकि इसे बहुत सादगी से कहते हैं। शबरी दोनों भाइयों को देखकर उठ खड़ी होती हैं। राम के चरण छूती हैं। पैर धोने के लिए जल देती हैं, पीने के लिए जल देती हैं। और वन से इसी दिन के लिए चुनकर रखे फल उनके आगे रख देती हैं।
राम बड़े स्नेह से उनका हाल पूछते हैं, आपकी साधना कैसी चल रही है, तप में कोई विघ्न तो नहीं? शबरी कहती हैं, आपके दर्शन से मेरा सारा जीवन पूरा हो गया। वे दोनों भाइयों को आश्रम दिखाती हैं, वह वेदी जहाँ उनके गुरु पूजा करते थे, वे फूल जो इतने बरसों बाद भी मुरझाए नहीं।
फिर शबरी राम से अनुमति माँगती हैं कि वे शरीर छोड़कर वहाँ जाएँ जहाँ उनके गुरु गए हैं। राम अनुमति देते हैं। शबरी शांत मन से अपने तप की अग्नि में प्रवेश करती हैं, और वाल्मीकि कहते हैं कि वे उन दिव्य लोकों को चली गईं, वही गति जिसकी वे प्रतीक्षा कर रही थीं।
*[ठहराव]*
अब, हम में से बहुतों ने बचपन में शबरी की कहानी थोड़े अलग रूप में सुनी है। उसमें शबरी हर बेर को चखकर देखती हैं, ताकि राम को सिर्फ़ मीठे बेर मिलें। लक्ष्मण थोड़ा झिझकते हैं, और राम बड़े प्रेम से वे जूठे बेर खा लेते हैं, क्योंकि उनके पीछे का प्रेम किसी भी नियम से बड़ा है।
यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण में नहीं है। यह बाद की कथाओं और लोकगीतों से आया है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में शबरी को एक और ही उपहार दिया है, वहाँ राम उन्हें नवधा भक्ति का उपदेश देते हैं। ये सब रामायण के ही परिवार के सदस्य हैं। वाल्मीकि हमें एक सादा, शांत दृश्य देते हैं। बाद के भक्तों ने उसमें अपने मन की कोमलता भर दी। हमें एक को चुनकर दूसरे को छोड़ने की ज़रूरत नहीं।
सारी कथाएँ जिस बात पर एक हैं, वह यह है। एक स्त्री, जिसके पास न राज्य था, न शास्त्रों की पढ़ाई, न कोई बड़ा कुल-नाम, उसने निष्ठा से प्रतीक्षा की, और राम स्वयं उसके द्वार पर आए। उन्होंने उसे बुलवाया नहीं। वे ख़ुद चलकर आए।
*[ठहराव]*
तो आइए, आज की बातें समेट लें।
हमेशा धीर रहने वाले राम शोक से डगमगा गए और पेड़ों, नदी और हिरणों से सीता का पता पूछने लगे। लक्ष्मण ने उन्हें सँभाला और खोज शुरू हुई। उन्हें जटायु मिले, जिन्होंने बताया कि रावण सीता को दक्षिण की ओर ले गया, और राम ने स्वयं जटायु का अंतिम संस्कार किया, जैसे कोई पुत्र पिता का करे। कबन्ध ने उन्हें सुग्रीव की राह दिखाई। और मतंग ऋषि के आश्रम में गुरुओं की सेवा करने वाली शबरी ने अपने चुने हुए फलों से राम का स्वागत किया, और वाल्मीकि कहते हैं कि उन्हें वह गति मिली जिसकी वे प्रतीक्षा कर रही थीं।
**आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए।** शबरी बरसों तक रोज़ एक छोटा-सा काम करती रहीं, उस व्यक्ति के लिए रास्ता बुहारतीं जिसके आने का उन्हें पूरा भरोसा था। क्या आपके जीवन में भी कोई छोटा काम है जो आप निष्ठा से करते आ रहे हैं, चाहे कोई देखे या न देखे? कल उसे थोड़े और प्यार से कीजिए। बस इतना।
अगले एपिसोड में हम किष्किन्धा की पहाड़ियों पर चढ़ेंगे, जहाँ मीठी वाणी और तेज़ बुद्धि वाला एक वानर यह जानने नीचे उतरता है कि ये दो अजनबी कौन हैं। उनका नाम है हनुमान।
*[बाँसुरी। 2 सेकंड मौन।]*
**श्रेय (पढ़कर सुनाएँ):** वाल्मीकि रामायण के अरण्य काण्ड के आधार पर, और गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस से बाद की परंपरा के एक उल्लेख के साथ, DharmikStudio टीम द्वारा लिखित। AI स्वर में वाचन। कोई भूल हो तो इस एपिसोड पर "गलती बताएँ" का उपयोग करें।