पहाड़ियों में मिला मित्र

Episode 12 of 20 in रामायण: वाल्मीकि की कथा.

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नमस्कार। फिर से स्वागत है। पिछली बार राम ने सीता के विरह में शोक किया, बूढ़े जटायु का सम्मान से अंतिम संस्कार किया, और पम्पा सरोवर पर शबरी ने उनका स्वागत किया। कबन्ध ने दोनों भाइयों से कहा था कि ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव नाम के वानर को ढूँढो।

आज वे उन्हें ढूँढ लेते हैं। और साथ में किसी और को भी पा लेते हैं, जो इस कथा के अंत तक राम के साथ रहेंगे।

*[ठहराव]*

ज़रा दृश्य की कल्पना कीजिए। पम्पा में वसंत आ गया है। सरोवर कमलों से भरा है, पेड़ फूलों से लदे हैं। और राम के लिए यह सारी सुंदरता एक चुभन है, क्योंकि सीता इसे देखने के लिए साथ नहीं हैं। वाल्मीकि जी राम के मुँह से वसंत पर एक लंबा, उदास गीत कहलवाते हैं। और लक्ष्मण, हमेशा की तरह, उन्हें आगे चलाते रहते हैं।

ऊपर **ऋष्यमूक** पर्वत पर बैठे **सुग्रीव** उन्हें आते देख रहे हैं। सुग्रीव एक वानर राजकुमार हैं, जिन्हें उनके बड़े भाई **बाली** ने उनके घर, **किष्किन्धा** नगरी से निकाल दिया है। एक पुराने शाप के कारण बाली इस पर्वत पर नहीं आ सकते, इसलिए सुग्रीव अपने चार विश्वासी साथियों के साथ यहीं रहते हैं। अब वे देखते हैं कि वल्कल पहने, धनुष लिए दो लंबे-ऊँचे युवक सीधे उनके पर्वत की ओर चले आ रहे हैं। वे डर जाते हैं। कहीं बाली ने तो नहीं भेजा?

तो वे अपने सबसे समझदार मित्र, अपने मंत्री की ओर मुड़ते हैं। जाओ, पता करो ये कौन हैं। सावधान रहना।

वह मंत्री हैं **हनुमान**।

*[ठहराव]*

हनुमान जी यहाँ बड़ी चतुराई दिखाते हैं। वे वानर के रूप में नहीं जाते। एक घूमते हुए भिक्षु का रूप धरकर नीचे उतरते हैं।

वे बड़े आदर से दोनों भाइयों को प्रणाम करते हैं। उनके तेज की प्रशंसा करते हैं। पूछते हैं, आप कौन हैं, इस सूने वन में क्यों आए हैं, आप दिखते तो राजाओं जैसे हैं पर वेश तपस्वियों का है? और इससे पहले कि वे चिंता करें, हनुमान ख़ुद ईमानदारी से बता देते हैं कि वे कौन हैं और किसने भेजा है। सुग्रीव आपसे मित्रता करना चाहते हैं।

राम ध्यान से सुनते हैं। फिर लक्ष्मण की ओर मुड़कर वह बात कहते हैं जो भक्तों को सदियों से प्रिय है। सुना तुमने, यह कैसे बोलता है? एक भी शब्द ग़लत जगह नहीं। न बहुत लंबा, न बहुत छोटा। चेहरा शांत, स्वर साफ़।

**नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः** (nānṛgvedavinītasya nāyajurvedadhāriṇaḥ)

"जिसने ऋग्वेद न सीखा हो, जिसे यजुर्वेद कंठस्थ न हो, वह ऐसे नहीं बोल सकता।" राम आगे कहते हैं कि जिस राजा के पास ऐसा दूत हो, उसका हर काम सिद्ध होगा।

*[ठहराव]*

कितनी सुंदर बात है न, कि राम हनुमान में सबसे पहले उनकी ताक़त नहीं देखते। वे उनकी बोली देखते हैं। शब्दों के प्रति उनकी सावधानी। हम आम तौर पर हनुमान जी को समुद्र लाँघते या पर्वत उठाते हुए याद करते हैं। पर रामायण उनका परिचय एक सौम्य, विचारशील और पढ़े-लिखे मित्र के रूप में कराती है।

लक्ष्मण हनुमान को अपनी पूरी कथा सुनाते हैं। तब हनुमान अपना असली रूप लेते हैं, दोनों भाइयों को अपने कंधों पर बिठाते हैं, और उन्हें ऊपर सुग्रीव के पास ले जाते हैं।

*[ठहराव]*

अब दो ऐसे लोगों की भेंट होती है जिन्होंने बहुत कुछ खोया है। राम का राज्य छूटा, पत्नी बिछड़ी। सुग्रीव का भी राज्य छूटा, पत्नी भी बिछड़ी। दोनों को एक-दूसरे का दुख समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

हनुमान दोनों के बीच अग्नि जलाते हैं। राम और सुग्रीव साथ-साथ उसकी परिक्रमा करते हैं, और अग्नि को साक्षी मानकर वचन देते हैं कि सुख में भी और दुख में भी मित्र रहेंगे। राम सुग्रीव को उनका घर लौटाने में मदद करेंगे। सुग्रीव राम को सीता ढूँढने में मदद करेंगे।

तभी सुग्रीव को कुछ याद आता है। कुछ दिन पहले, वे कहते हैं, हमने रावण को एक स्त्री को आकाश में ले जाते देखा था। वह राम का नाम पुकार रही थी। उसने हमें पर्वत की चोटी पर बैठे देखा और अपने उत्तरीय में बाँधकर एक पोटली नीचे गिरा दी। हमने उसे सँभालकर रखा है।

वे पोटली लाते हैं। राम उसे खोलते हैं और सीता के गहने देखते हैं। उनके मुँह से शब्द नहीं निकलते। वे गहनों को सीने से लगा लेते हैं।

और यहाँ वाल्मीकि एक छोटा-सा प्रसंग देते हैं जो लोगों को याद रह जाता है। राम लक्ष्मण से पूछते हैं, क्या तुम इन्हें पहचानते हो? लक्ष्मण कहते हैं, भैया, मैं इनके बाजूबंद नहीं पहचानता, कुंडल भी नहीं पहचानता। पर ये नूपुर पहचानता हूँ, क्योंकि रोज़ मैं उनके चरणों में प्रणाम करता था।

*[ठहराव]*

अब हम इस काण्ड के सबसे कठिन हिस्से पर आते हैं। मैं इसे वैसे ही सीधे और संक्षेप में कहूँगा जैसे वाल्मीकि कहते हैं, और सोचने का काम आप पर छोड़ दूँगा।

सुग्रीव बताते हैं कि बाली ने उन्हें क्यों निकाला। एक बार बाली एक असुर से लड़ने गुफा के भीतर गए और सुग्रीव से बाहर प्रतीक्षा करने को कहा। बहुत समय बाद सुग्रीव ने गुफा से लाल रंग का पानी बहते देखा और ऐसी आवाज़ें सुनीं मानो बाली का अंत हो गया हो। दुखी होकर उन्होंने गुफा का मुँह बंद किया और घर लौट आए, और मंत्रियों ने उन्हें राजा बना दिया। पर बाली जीवित लौटे। उन्हें लगा कि भाई ने धोखा दिया है। उन्होंने सुग्रीव को निकाल दिया, और सुग्रीव की पत्नी **रुमा** को भी अपने पास रख लिया।

सुग्रीव के मन में अब भी संशय है। वे कहते हैं, बाली बहुत बलवान हैं, क्या आप सचमुच मेरी मदद कर पाएँगे? तब वाल्मीकि एक सौम्य-सी परीक्षा की बात कहते हैं। सुग्रीव राम को साल के सात विशाल पेड़ों की एक कतार दिखाते हैं और पूछते हैं, क्या आप इनमें से एक को भी भेद सकते हैं? राम एक ही बाण छोड़ते हैं, और वह सातों पेड़ों को, उनके पीछे के पहाड़ को भी भेदकर, वापस उनके तरकश में लौट आता है। सुग्रीव नतमस्तक हो जाते हैं। उनका संशय भी चला जाता है और डर भी।

ध्यान देने की बात है कि राम इस परीक्षा से बुरा नहीं मानते। डरे हुए मित्र को भरोसे की ज़रूरत होती है, और राम बिना किसी शिकायत के वह भरोसा दे देते हैं।

सुग्रीव बाली को ललकारते हैं। दोनों में भिड़ंत होती है और सुग्रीव को भागना पड़ता है। दूसरी बार सुग्रीव फूलों की माला पहनकर ललकारते हैं, ताकि राम दोनों भाइयों को पहचान सकें। जब दोनों भाई आपस में जूझ रहे होते हैं, तब पेड़ों की ओट में खड़े राम बाण चलाते हैं, और बाली गिर पड़ते हैं।

*[ठहराव]*

धरती पर पड़े बाली राम से सीधा प्रश्न करते हैं। मैं तो तुमसे लड़ नहीं रहा था। तुमने छिपकर ऐसा क्यों किया? क्या यही तुम्हारा धर्म है?

वाल्मीकि इस प्रश्न से बचते नहीं। वे बाली को पूरा प्रश्न पूछने देते हैं। और राम को उत्तर देने देते हैं। राम कहते हैं कि यह भूमि इक्ष्वाकु राजाओं के शासन में है, जो अब भरत के हाथ में है, और ग़लत काम को सुधारना राजा का कर्तव्य है। बाली ने अपने छोटे भाई के जीवित रहते उसकी पत्नी को अपने पास रख लिया, जिसे धर्म बहुत बड़ा अपराध मानता है, पुत्रवधू को अपनाने जैसा। राम कहते हैं, इसीलिए मैंने ऐसा किया।

इस प्रसंग पर सदियों से चर्चा होती आई है। कुछ लोगों को राम का उत्तर पूरा लगता है। कुछ के मन में अब भी एक प्रश्न रह जाता है। लगता है वाल्मीकि ख़ुद दोनों के लिए जगह छोड़ते हैं, क्योंकि वे बताते हैं कि राम की बात सुनकर बाली उसे स्वीकार कर लेते हैं और बस एक बात माँगते हैं। मेरे पुत्र **अंगद** का ध्यान रखना। उसे वैसे ही सँभालना जैसे भरत और लक्ष्मण को सँभालते हो।

बाली की पत्नी **तारा**, जो बहुत समझदार और गरिमामयी स्त्री हैं, उनके लिए गहरा शोक करती हैं। राम उन्हें सांत्वना देते हैं और बाली का अंतिम संस्कार पूरे सम्मान से करवाते हैं।

*[ठहराव]*

और इस तरह सुग्रीव किष्किन्धा लौटते हैं। उनका राज्याभिषेक होता है, रुमा उनके पास लौट आती हैं, और युवा अंगद युवराज बनाए जाते हैं। अग्नि के सामने हुई मित्रता ने अपना पहला वचन निभा दिया। अब सुग्रीव की बारी है।

पर बारिश आने वाली है। चौमासे में कोई सारी दुनिया में खोज नहीं कर सकता। राम और लक्ष्मण वर्षा ऋतु बिताने के लिए **प्रस्रवण** पर्वत की एक गुफा में जाकर रहने लगते हैं।

*[ठहराव]*

तो आइए, आज की बातें समेट लें।

हनुमान पहली बार राम से एक भिक्षु के वेश में मिले, और राम ने लक्ष्मण से कहा कि वेदों को जाने बिना कोई इतना सुंदर नहीं बोल सकता। अग्नि को साक्षी मानकर राम और सुग्रीव मित्र बने, और सुग्रीव ने राम को वे गहने दिखाए जो सीता ने आकाश से गिराए थे। और वाल्मीकि ने बाली की कठिन कथा सीधे-सीधे कही, राम का कारण बताया, और अंत में सुग्रीव का राज्याभिषेक हुआ और अंगद युवराज बने।

**आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए।** राम ने हनुमान में सबसे पहले उनकी बोली पर ध्यान दिया। कल किसी एक बातचीत में अपने शब्दों का वैसा ही ध्यान रखिए जैसा हनुमान जी ने रखा। न ज़्यादा, न कम, और मीठा।

अगले एपिसोड में बारिश थमेगी, एक वचन भूला-सा लगेगा, और आख़िरकार सीता की बड़ी खोज शुरू होगी।

*[हवा धीमी होती है। 2 सेकंड मौन।]*

**श्रेय (पढ़कर सुनाएँ):** वाल्मीकि रामायण के किष्किन्धा काण्ड के आधार पर DharmikStudio टीम द्वारा लिखित। AI स्वर में वाचन। कोई भूल हो तो इस एपिसोड पर "गलती बताएँ" का उपयोग करें।

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