खोज शुरू होती है

Episode 13 of 20 in रामायण: वाल्मीकि की कथा.

Narrated with an AI voice.

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नमस्कार। पिछली बार हनुमान जी पहली बार राम से मिले, पवित्र अग्नि के सामने राम और सुग्रीव मित्र बने, और सुग्रीव फिर से किष्किन्धा के राजा बने। फिर बारिश आ गई, और राम-लक्ष्मण प्रस्रवण पर्वत की एक गुफा में प्रतीक्षा करने चले गए।

आज बारिश थमेगी, और खोज शुरू होगी।

*[ठहराव]*

वाल्मीकि जी को वर्षा ऋतु से बहुत प्रेम है। वे बादलों को हाथियों जैसा बताते हैं, नाचते मोर, मटमैले पानी से भरी बहती नदियाँ, और लंबे मौन के बाद फिर से गाते मेंढक। पर हर सुंदर चीज़ राम को सीता की याद दिलाती है। चार महीने बहुत लंबा समय होता है, जब कोई अपना मुसीबत में हो और यह तक पता न हो कि वह है कहाँ।

कई शामें राम गुफा के मुहाने पर चुपचाप बैठे रहते हैं। लक्ष्मण उनके पास बैठते हैं। वे उनका दुख बातों से हटाने की कोशिश नहीं करते। बस जब राम निराश होने लगते हैं, तो कहते हैं, जो साहस नहीं छोड़ता, वह अपना खोया हुआ पा ही लेता है, शोक को अपना बल मत निगलने दीजिए। राम सुनते हैं, और सँभल जाते हैं।

नीचे किष्किन्धा में हाल कुछ और है। सुग्रीव को राज्य मिल गया, पत्नी मिल गई, और बरसों छिपकर रहने के बाद अब वे आराम का सुख ले रहे हैं। दिन बीतते जाते हैं। शरद ऋतु आ जाती है। आसमान साफ़ हो जाता है। और सुग्रीव की ओर से अब भी कोई ख़बर नहीं।

सबसे पहले **हनुमान** जी का ध्यान जाता है। वे सुग्रीव के पास जाकर आदर से याद दिलाते हैं कि जिस मित्र से सहायता मिली हो, उसका उपकार समय पर लौटाना चाहिए। सुग्रीव मान जाते हैं और वानरों को इकट्ठा करने का आदेश दे देते हैं। पर फिर अपने आराम के दिनों में खो जाते हैं।

*[ठहराव]*

पर्वत पर राम शरद का साफ़ आसमान देखते हैं और उनका धीरज टूट जाता है। वे लक्ष्मण से कहते हैं, किष्किन्धा जाओ। सुग्रीव को याद दिलाओ कि जिस रास्ते बाली गए, वह रास्ता अब भी खुला है। लक्ष्मण को भाई के लिए क्रोध करने के लिए कभी ज़्यादा कारण की ज़रूरत नहीं पड़ी। वे धनुष उठाकर चल देते हैं।

वानर उन्हें आते देखते हैं और घबरा जाते हैं। और यहाँ वाल्मीकि जी चुपचाप एक बहुत सुंदर दृश्य रचते हैं। सुग्रीव पहले बाहर नहीं जाते। वे **तारा** को भेजते हैं।

तारा बाली की रानी थीं, अपनी बुद्धिमत्ता के लिए जानी जाती थीं। वे शांत भाव से एक क्रोधित राजकुमार के सामने आती हैं। बहस नहीं करतीं। बहाने नहीं बनातीं। वे लक्ष्मण से कहती हैं, आपका नाराज़ होना ठीक है। सुग्रीव से लापरवाही हुई है। पर वे भूले नहीं हैं। इस समय भी हर वन और हर पर्वत से वानर इकट्ठा हो रहे हैं। आइए, भीतर चलिए। आप जैसे सज्जन को क्रोध शोभा नहीं देता।

और लक्ष्मण का क्रोध पिघल जाता है।

*[ठहराव]*

जब भी मैं किसी को गरम माहौल ठंडा करते देखता हूँ, मुझे तारा याद आती हैं। उन्होंने समस्या को नकारा नहीं। उसे मान लिया, और फिर आगे का रास्ता दिखाया। यह एक बड़ा गुण है।

सुग्रीव हाथ जोड़कर लक्ष्मण के पास आते हैं और क्षमा माँगते हैं। फिर वे अपना वचन पूरी तरह निभाते हैं। पर्वतों, वनों और समुद्र-तटों से अनगिनत वानर और रीछ आ पहुँचते हैं। सुग्रीव अपनी सेना लेकर राम के पास जाते हैं और योजना बनती है।

खोजी दल चारों दिशाओं में निकलते हैं। सुग्रीव, जो बाली से बचते हुए कभी पूरी दुनिया में भटके थे, हर दल के नायक को उस दिशा की धरती का पूरा वर्णन सुनाते हैं: नदियाँ, पर्वत, लोग, समुद्र। पढ़ते हुए लगता है मानो कोई प्राचीन नक्शा हो। वे सबको एक महीने का समय देते हैं।

**विनत** पूर्व की ओर जाते हैं, उगते सूरज की दिशा में। तारा के पिता **सुषेण** पश्चिम की ओर, उस समुद्र तक जहाँ सूरज डूबता है। **शतबलि** उत्तर की ओर, बर्फ़ीले पहाड़ों की तरफ़।

कल्पना कीजिए उन वानरों के निकल पड़ने की। हज़ारों-हज़ार, पहाड़ चढ़ते, नदियाँ पार करते, गाँवों में पूछते, गुफाओं में झाँकते। किसी को नहीं पता कि कौन-सा दल उन्हें ढूँढेगा। इसलिए हर दल ऐसे खोजता है मानो वही ढूँढेगा।

*[ठहराव]*

दक्षिण का दल सबसे ज़रूरी है, क्योंकि जटायु ने बताया था कि रावण दक्षिण की ओर गया। उसके नायक हैं युवा **अंगद**, और उनके साथ हैं हनुमान और रीछों के बूढ़े, ज्ञानी राजा **जाम्बवान**।

अब देखिए राम क्या करते हैं। इतने सारे लोगों में वे हनुमान की ओर मुड़ते हैं। अपनी अँगूठी उतारते हैं, जिस पर उनका नाम अंकित है, और हनुमान को दे देते हैं। यह सीता को दिखाना, ताकि वह जान ले कि तुम मेरी ओर से आए हो।

किसी ने राम से नहीं कहा था कि हनुमान सफल होंगे। वे बस उन पर भरोसा करते हैं। कभी-कभी यही भरोसा किसी को अपने काम के लायक़ बना देता है।

*[ठहराव]*

दक्षिण का दल जंगलों और पहाड़ों में खोजता है। एक बार प्यास से बेहाल और रास्ता भटके हुए वे एक अँधेरी गुफा में घुसते हैं, और भीतर एक छिपा हुआ, जगमगाता बगीचा पाते हैं, जिसकी देखभाल **स्वयंप्रभा** नाम की एक तपस्विनी करती हैं। वे उन्हें भोजन कराती हैं और अपनी शक्ति से उन्हें दक्षिणी समुद्र के किनारे पहुँचा देती हैं।

पर महीना बीत चुका है। कुछ नहीं मिला। अंगद का दिल टूट जाता है। उन्हें लगता है कि ख़ाली हाथ सुग्रीव के पास लौटना संभव नहीं, और वे तय करते हैं कि समुद्र के किनारे बैठकर तब तक उपवास करेंगे जब तक जीवन है। बाकी साथी भी, उनके प्रति निष्ठा से, उनके पास बैठ जाते हैं।

वहाँ बैठे-बैठे, जो कुछ बिगड़ा उसकी उदास बातें करते हुए, किसी के मुँह से जटायु का नाम निकलता है।

*[ठहराव]*

पास के पर्वत पर ऊपर एक बहुत बूढ़ा पक्षी रहता है, जो इतना कमज़ोर है कि उड़ नहीं सकता। उनका नाम **सम्पाति** है, और वे जटायु के बड़े भाई हैं। बरसों से उन्होंने अपने भाई का नाम नहीं सुना था। वे ऊपर से पुकारते हैं, तुमने जटायु के बारे में क्या कहा?

वानर उन्हें सब कुछ बताते हैं। सम्पाति अपने भाई के लिए शोक करते हैं। फिर वे वह ख़बर देते हैं जिसके लिए ये सब इतने दिनों से भटक रहे थे। मेरी आँखें अब भी तेज़ हैं, वे कहते हैं, और मैं समुद्र के पार बहुत दूर तक देख सकता हूँ। वहाँ, सौ योजन दूर, **लंका** नाम की द्वीप-नगरी है। और लंका के एक बगीचे में सीता बैठी हैं।

वाल्मीकि यहाँ एक प्यारी-सी बात जोड़ते हैं। वानरों की मदद करते-करते सम्पाति के खोए हुए पंख फिर से उग आते हैं, जैसा एक ऋषि ने कभी उनसे कहा था। वे आकाश में उड़ जाते हैं, और वानर ख़ुशी से झूम उठते हैं।

*[ठहराव]*

अब पता है कि सीता कहाँ हैं। पर उनके और लंका के बीच समुद्र है। एक-एक करके सारे नायक बताते हैं कि वे कितनी दूर छलाँग लगा सकते हैं। दस योजन। बीस। पचास। नब्बे। अंगद कहते हैं कि मैं लंका तक पहुँच तो जाऊँगा, पर लौट पाऊँगा, इसका भरोसा नहीं।

और इस पूरे समय हनुमान जी एक ओर चुपचाप बैठे हैं।

बूढ़े जाम्बवान उनके पास जाते हैं। वे हनुमान को याद दिलाते हैं कि वे कौन हैं। तुम्हारी माता **अंजना** थीं। तुम्हारे पिता **वायु** देव हैं, पवन। जब तुम छोटे-से थे, तुमने उगते सूरज को देखा और उसे पका हुआ फल समझकर पकड़ने के लिए आकाश में छलाँग लगा दी थी। तुम अपना बल भूल गए हो। अब उठो।

जैसे-जैसे जाम्बवान बोलते हैं, हनुमान का आकार बढ़ने लगता है। वे उठ खड़े होते हैं, और बड़े, और बड़े, तेज से भरे हुए, और कहते हैं, मैं समुद्र पार करूँगा। मैं सीता को ढूँढूँगा। मैं उनकी ख़बर लेकर आऊँगा।

*[ठहराव]*

तो आइए, आज की बातें समेट लें।

जब सुग्रीव सुख-सुविधा में अपना वचन भूल गए, तो लक्ष्मण उन्हें याद दिलाने गए, और तारा ने अपनी कोमल, समझदार बातों से लक्ष्मण को शांत किया। सुग्रीव ने चारों दिशाओं में खोजी दल भेजे, और राम ने अपनी अँगूठी हनुमान को दी, इस भरोसे के साथ कि सीता को यही ढूँढेंगे। बूढ़े सम्पाति ने खोजियों को बताया कि सीता समुद्र पार लंका में हैं, और जाम्बवान ने हनुमान को वह बल याद दिलाया जिसे वे भूल गए थे।

**आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए।** जाम्बवान ने हनुमान को कुछ नया नहीं दिया। बस वही याद दिलाया जो पहले से उनके भीतर था। क्या आपके आसपास कोई है जो भूल गया है कि वह क्या-क्या कर सकता है? इस सप्ताह उसे उसके बारे में कोई एक सच्ची, अच्छी बात ज़रूर बताइए।

अगले एपिसोड में हनुमान जी महेन्द्र पर्वत पर खड़े होंगे, एक गहरी साँस लेंगे, और छलाँग लगाएँगे।

*[समुद्री हवा। 2 सेकंड मौन।]*

**श्रेय (पढ़कर सुनाएँ):** वाल्मीकि रामायण के किष्किन्धा काण्ड के आधार पर DharmikStudio टीम द्वारा लिखित। AI स्वर में वाचन। कोई भूल हो तो इस एपिसोड पर "गलती बताएँ" का उपयोग करें।

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