छलाँग
Episode 14 of 20 in रामायण: वाल्मीकि की कथा.
Narrated with an AI voice.
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नमस्कार। पिछली बार खोजियों को बूढ़े सम्पाति से पता चला कि सीता समुद्र पार लंका में हैं। कोई यह वचन नहीं दे पाया कि वह पार जाकर लौट भी आएगा। तब जाम्बवान ने हनुमान को याद दिलाया कि वे कौन हैं, और हनुमान उठकर बोले, मैं जाऊँगा।
आज से हम **सुन्दर काण्ड** शुरू कर रहे हैं। बहुत से घरों में रामायण का यह हिस्सा अलग से, एक प्रार्थना की तरह पढ़ा जाता है, ख़ासकर चिंता के दिनों में। आज आप समझ जाएँगे क्यों।
इसे सुन्दर क्यों कहते हैं? वाल्मीकि यह नहीं बताते, इसलिए घरों में अपने-अपने उत्तर चलते हैं। कोई कहता है, क्योंकि इसमें सब कुछ सुंदर है, समुद्र, नगरी, उपवन, और सबसे बढ़कर वह शुभ समाचार जो यह लेकर आता है। कोई कहता है कि हनुमान जी की माता उन्हें प्यार से सुन्दर कहती थीं, तो यह उनका काण्ड है। एक पुरानी कहावत है, सुन्दर काण्ड में क्या सुंदर नहीं है? हमें एक ही उत्तर चुनने की ज़रूरत नहीं। सब एक ही ओर इशारा करते हैं।
और मुश्किल दिनों में यह काण्ड मन को सहारा क्यों देता है, इसकी भी एक वजह है। अब तक कथा में एक के बाद एक बिछोह ही आया है। राज्य छूटा, पिता गए, सीता बिछड़ीं। इस काण्ड में पहली बार हवा का रुख़ बदलता है। कोई अकेला अनजान में निकलता है, और शुभ समाचार लेकर लौटता है।
*[ठहराव]*
काण्ड की पहली पंक्ति ही सब कुछ गति में ला देती है।
**ततो रावणनीतायाः सीतायाः शत्रुकर्शनः** (tato rāvaṇanītāyāḥ sītāyāḥ śatrukarśanaḥ)
"तब, रावण द्वारा ले जाई गई सीता का पता खोजने के लिए..." पंक्ति आगे कहती है कि हनुमान ने उस मार्ग से जाना चाहा जिस पर केवल दिव्य जन चलते हैं, यानी आकाश से।
हनुमान समुद्र किनारे **महेन्द्र पर्वत** पर चढ़ते हैं। सूर्य को प्रणाम करते हैं, इन्द्र को, ब्रह्मा को, अपने पिता पवन देव को, और सभी प्राणियों को। अपना बल समेटते हैं। वाल्मीकि कहते हैं कि उनके पैरों के नीचे पर्वत काँप उठता है, पेड़ों से फूल झरने लगते हैं, और चट्टानों से धाराएँ फूट पड़ती हैं।
और फिर वे छलाँग लगाते हैं।
*[ठहराव]*
किनारे से यह दृश्य सोचिए। वानर चुपचाप देख रहे हैं। लहरों के ऊपर एक विशाल सुनहरा रूप उठ रहा है, भुजाएँ फैली हुई, चारों ओर हवा गरज रही है, और उनकी परछाईं पानी पर किसी जहाज़ की तरह चल रही है।
वाल्मीकि कहते हैं कि समुद्र भी मदद करना चाहता है। उसे याद है कि राम के पूर्वजों, इक्ष्वाकु वंश के राजाओं ने कभी उस पर उपकार किया था। इसलिए वह लहरों के नीचे छिपे **मैनाक** पर्वत से कहता है, ऊपर उठो और हनुमान को विश्राम की जगह दो।
सुनहरा मैनाक ऊपर उठता है और कहता है, थोड़ी देर मुझ पर विश्राम कर लो, कुछ खा लो, अभी बहुत दूर जाना है। हनुमान का मन भर आता है। पर वे रुकते नहीं। वे हाथ से पर्वत को धीरे से छू लेते हैं, मानो उसका स्नेह स्वीकार कर रहे हों, और कहते हैं, मैंने वचन दिया है, जब तक काम पूरा न हो, विश्राम नहीं कर सकता। और आगे उड़ जाते हैं।
मुझे यह प्रसंग बहुत प्यारा लगता है। वे रूखेपन से मना नहीं करते। निमंत्रण का आदर करते हैं। बस अपनी नज़र अपने काम पर रखते हैं।
*[ठहराव]*
आगे एक परीक्षा आती है। देवता हनुमान का बल और बुद्धि देखना चाहते हैं, इसलिए वे नागों की माता **सुरसा** से उनका रास्ता रोकने को कहते हैं। सुरसा विशाल रूप धरकर अपना मुँह खोल देती हैं। कहती हैं, बिना मेरे मुँह में आए कोई आगे नहीं जा सकता।
हनुमान अपना आकार बढ़ाते हैं। सुरसा मुँह और बड़ा करती हैं। हनुमान और बड़े होते हैं। सुरसा और बड़ा करती हैं। तब हनुमान एक चतुराई करते हैं। पल भर में अँगूठे जितने छोटे हो जाते हैं, भीतर जाते हैं, और इससे पहले कि वे मुँह बंद करें, बाहर निकल आते हैं। फिर प्रणाम करके कहते हैं, माता, जैसा आपने कहा, मैं आपके मुख में जाकर आ गया। अब मुझे जाने दीजिए।
सुरसा हँस पड़ती हैं और अपना सौम्य रूप ले लेती हैं। जाओ, वे कहती हैं, तुम्हारा काम सफल हो। तुममें बल भी है और बुद्धि भी।
आगे एक तीसरी बाधा है, समुद्र में रहने वाली **सिंहिका**, जो पानी पर पड़ी परछाईं पकड़कर उड़ने वाले को रोक लेती थी। हनुमान उसकी चाल समझ जाते हैं, जल्दी से उस पर विजय पाते हैं, और आगे बढ़ जाते हैं।
*[ठहराव]*
आख़िरकार वे दूसरे किनारे के एक पर्वत पर उतरते हैं। वाल्मीकि कहते हैं कि उन्हें थकान तक नहीं हुई। सामने, साँझ की रोशनी में, **लंका** फैली है।
लंका बहुत सुंदर है। सोने की दीवारें, ऊँचे-ऊँचे सफ़ेद भवन, बगीचे, कमलों से भरे सरोवर, और दिन-रात पहरा देते द्वार। हनुमान सोच-समझकर चलते हैं। अगर मैं इसी रूप में गया तो तुरंत पहचान लिया जाऊँगा। इसलिए वे अँधेरा होने तक रुकते हैं, फिर बहुत छोटे, लगभग बिल्ली जितने, बनकर नगर में चुपके से प्रवेश करते हैं।
वाल्मीकि बताते हैं कि द्वार पर उन्हें स्वयं नगर की रक्षक देवी, लंकिनी, रोकती हैं। हनुमान हल्के-से प्रहार से उन्हें परास्त कर देते हैं, और वे रास्ता छोड़ देती हैं। उन्हें एक पुरानी भविष्यवाणी याद आती है, कि जब कोई वानर मुझे पार कर जाए, तो समझना रावण के राज का अंत पास है।
*[ठहराव]*
अब खोज शुरू होती है, और यहाँ वाल्मीकि सब कुछ धीमा कर देते हैं।
लंका पर चाँद उगता है। हनुमान घर-घर, छत-छत घूमते हैं। संगीत सुनाई देता है। लोग हँसते-गाते दिखते हैं, कहीं वेद-पाठ हो रहा है। विद्वान भी दिखते हैं और सैनिक भी, बगीचे भी और ख़ज़ाने भी। वे रावण के अपने महल में जाते हैं, विशाल उड़ने वाला विमान **पुष्पक** देखते हैं, उन कक्षों से गुज़रते हैं जहाँ रावण की रानियाँ सो रही हैं।
वहाँ वे एक रानी को देखते हैं जो बाकी सबसे अधिक सुंदर और गरिमामयी है, एक सुंदर पलंग पर सोई हुई, और एक पल को उनका मन ख़ुशी से उछल पड़ता है, यही सीता होंगी। वे लगभग नाच उठते हैं। फिर रुक जाते हैं। नहीं, वे सोचते हैं। राम से बिछड़ी सीता किसी महल में चैन से नहीं सो सकतीं। वे गहने नहीं पहनेंगी। वे यहाँ नहीं होंगी। यह कोई और हैं। ये रावण की पटरानी **मंदोदरी** हैं।
छोटा-सा प्रसंग है, पर हनुमान के बारे में बहुत कुछ कह जाता है। वे सीता से मिलने से पहले ही उनका हृदय जानते हैं।
*[ठहराव]*
उनके मन में एक संकोच भी आता है। वे सोती हुई स्त्रियों के बीच से गुज़रे, जो उन जैसे व्यक्ति के लिए उचित नहीं। पर वे अपने मन को टटोलते हैं और उसे शांत और निर्मल पाते हैं। वे ख़ुद से कहते हैं, मैं यहाँ सिर्फ़ सीता को ढूँढने आया हूँ, और किसी स्त्री को स्त्रियों के बीच नहीं ढूँढूँगा तो और कहाँ? मेरा मन विचलित नहीं हुआ।
वे हर जगह खोजते हैं। हर कक्ष, हर तहख़ाना, हर बगीचा। पर सीता नहीं मिलतीं।
अब हनुमान निराशा में डूब जाते हैं। वाल्मीकि हमें उनके मन की बातें सुनाते हैं। अगर मैं बिना ख़बर लौटा, तो राम की आशा टूट जाएगी। लक्ष्मण की भी। सुग्रीव की, अंगद की, सबकी। शायद मुझे लौटना ही नहीं चाहिए।
फिर वे ख़ुद को रोकते हैं। वे कहते हैं, निराशा ही असफलता की जड़ है। जो हिम्मत नहीं हारता, उसे रास्ता मिल ही जाता है।
वे प्रणाम करते हैं। राम और लक्ष्मण को, सीता को, सुग्रीव को, देवताओं को। और ऊपर देखते हैं, तो महल के पार अशोक के पेड़ों का एक बड़ा उपवन दिखता है, जिसे उन्होंने अब तक नहीं खोजा।
*[ठहराव]*
तो आइए, आज की बातें समेट लें।
हनुमान ने महेन्द्र पर्वत से छलाँग लगाई, और रास्ते में मैनाक के विश्राम के निमंत्रण को विनम्रता से मना किया और सुरसा की परीक्षा ताक़त से नहीं, बुद्धि से पार की। वे रात में बहुत छोटा रूप धरकर लंका में गए, और चाँदनी में महल-बगीचे खोजे, पर एक पल को भी अपना लक्ष्य नहीं भूले। और जब सीता नहीं मिलीं, तो वे लगभग हार मान बैठे, फिर उन्होंने आशा को चुना, राम और सीता को प्रणाम किया, और उस एक जगह की ओर बढ़े जो अब तक नहीं खोजी थी।
**आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए।** जब हनुमान जी का मन हार मानने लगा, तो उन्होंने उस भाव के जाने का इंतज़ार नहीं किया। एक छोटी-सी प्रार्थना की और एक क़दम और बढ़ाया। अगली बार जब आप कहीं अटक जाएँ, तो बस यही कीजिए: मन ही मन प्रणाम कीजिए, और एक छोटा क़दम और बढ़ाइए।
अगले एपिसोड में हनुमान एक अशोक के पेड़ पर चढ़ेंगे, और नीचे उपवन में उन्हें सीता दिखाई देंगी।
*[रात की हवा, पत्तों की सरसराहट। 2 सेकंड मौन।]*
**श्रेय (पढ़कर सुनाएँ):** वाल्मीकि रामायण के सुन्दर काण्ड के आधार पर DharmikStudio टीम द्वारा लिखित। AI स्वर में वाचन। कोई भूल हो तो इस एपिसोड पर "गलती बताएँ" का उपयोग करें।