अशोक वाटिका में

Episode 15 of 20 in रामायण: वाल्मीकि की कथा.

Narrated with an AI voice.

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नमस्कार। पिछली बार हनुमान जी ने समुद्र पार किया, चाँदनी में पूरी लंका छान मारी, और उनका मन लगभग हार गया। फिर उन्होंने आशा को चुना, और अशोक के उस बड़े उपवन की ओर मुड़े जिसे अब तक नहीं खोजा था।

आज, आख़िरकार, वे सीता को पा लेते हैं।

*[ठहराव]*

उपवन के बीच में **शिंशपा** का एक ऊँचा, घनी पत्तियों वाला पेड़ है। हनुमान उस पर चढ़कर डालियों में छिप जाते हैं। नीचे धाराएँ हैं, कमल के तालाब हैं, पक्षी हैं, फूलों से लदे पेड़ हैं। ऐसा सुंदर बगीचा उन्होंने शायद ही कभी देखा हो।

और तभी उन्हें ज़मीन पर बैठी एक स्त्री दिखाई देती है।

उपवास से वे दुबली हो गई हैं। वस्त्र पुराने और फीके पड़ चुके हैं। बाल एक ही चोटी में बँधे हैं। चारों ओर पहरेदार हैं, और वाल्मीकि कहते हैं कि वे धुएँ में ढकी लौ जैसी हैं, बादलों में छिपे चाँद जैसी। वे आहें भर रही हैं, आँखें आँसुओं से भरी हैं।

हनुमान उन्हें ध्यान से देखते हैं। उन्हें वे गहने याद आते हैं जो सुग्रीव ने राम को दिखाए थे, और वे देखते हैं कि इनके शरीर पर बचे थोड़े-से गहने ठीक वैसे ही हैं। उन्हें याद आता है कि राम ने उनका कैसा वर्णन किया था। और उनका मन भर आता है। ये सीता ही हैं।

वाल्मीकि यहाँ एक पल हनुमान को दोनों के बारे में सोचने देते हैं। राम इनके योग्य हैं, वे सोचते हैं, और ये राम के योग्य हैं। यहाँ इस उपवन में भी इनका मन केवल राम में लगा है।

*[ठहराव]*

इससे पहले कि वे कुछ कर पाएँ, शोर होता है, रोशनी दिखती है। भोर होने को है, और स्वयं **रावण** अपने सेवकों के साथ, दीपक लिए, उपवन में आ रहा है।

हनुमान बिल्कुल स्थिर हो जाते हैं।

रावण सीता से बात करता है। उनकी प्रशंसा करता है, और उनसे स्वयं को स्वीकार करने को कहता है। अपना राज्य, अपना धन, अपने महल देने की बात करता है। उन्हें अपनी पटरानी बनाने का वचन देता है।

सीता उसकी ओर देखती तक नहीं। और यहाँ वाल्मीकि हमें एक ऐसा भाव देते हैं जो हज़ारों बरसों से भारतीय घरों में याद किया जाता है।

**तृणमन्तरतः कृत्वा** (tṛṇam antarataḥ kṛtvā)

"बीच में एक तिनका रखकर।" सीता एक तिनका उठाती हैं, उसे अपने और रावण के बीच रख देती हैं, और तिनके से बात करती हैं, रावण से नहीं।

*[ठहराव]*

लोग इस भाव को अलग-अलग तरह से समझते हैं। कोई कहता है, इसका अर्थ है, मेरे लिए तुम इस तिनके से अधिक कुछ नहीं। कोई कहता है, यह उस कुलीन स्त्री की मर्यादा है जो पराए पुरुष से सीधे बात नहीं करती। कोई कहता है, वे बस एक रेखा खींच रही हैं जिसे पार नहीं किया जा सकता। शायद इसमें तीनों बातें हैं।

और वे जो कहती हैं, वह शांत भी है और दृढ़ भी। मैं किसी और की पत्नी हूँ। अपनी रानियों के पास लौट जाओ। अगर अपना भला चाहते हो, तो मुझे राम को लौटा दो और उनसे क्षमा माँग लो। जो भी उनकी शरण में जाता है, वे उस पर दया करते हैं।

रावण क्रोध से भर जाता है। कठोर शब्दों के साथ वह सीता को मन बदलने के लिए दो महीने का समय देता है, और चला जाता है। पहरेदारों से कहता है कि इन पर दबाव बनाए रखो।

*[ठहराव]*

सुबह भर पहरेदारिनें अपनी बातों से सीता को डराती रहती हैं। आख़िर थककर वे एक पेड़ के नीचे अकेली बैठ जाती हैं और सोचती हैं, शायद मेरे दुख कभी ख़त्म नहीं होंगे।

पर पहरेदारिनों में एक बड़ी उम्र की स्त्री, **त्रिजटा**, अभी-अभी एक सपने से जागी हैं। वे बाकियों को रोकती हैं। कहती हैं, मैंने सपने में देखा कि राम और लक्ष्मण सफ़ेद वस्त्रों में, सफ़ेद हाथी पर आ रहे हैं, सीता उनके साथ हैं, और लंका समुद्र में डूब रही है। इस स्त्री को परेशान मत करो। हो सकता है एक दिन हमें इन्हीं की दया की ज़रूरत पड़े।

मुझे यह बहुत सुंदर लगता है कि रावण की अपनी पहरेदारिनों के बीच भी वाल्मीकि एक ऐसी स्त्री को रखते हैं जो साफ़ देखती है और दया से बोलती है।

*[ठहराव]*

अब हनुमान के सामने एक उलझन है। पहरेदारों से घिरी एक डरी हुई स्त्री से कोई वानर अचानक बात करे, तो वे चीख़ न पड़ें, ऐसा कैसे हो?

तो वे बड़ी समझदारी दिखाते हैं। नीचे नहीं कूदते। डालियों में ही रहते हैं, और धीमे, मानवीय स्वर में एक कथा सुनाने लगते हैं। अयोध्या में दशरथ नाम के एक राजा थे। उनके एक पुत्र थे, राम, सत्यवादी और दयालु। राम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वन गए। सीता का हरण हुआ। राम उन्हें खोजते रहे। उन्होंने सुग्रीव से मित्रता की। और सुग्रीव की ओर से मैं उन्हें खोजने आया हूँ।

सीता चकित होकर ऊपर देखती हैं, और पत्तों के बीच एक छोटा-सा वानर दिखता है।

*[ठहराव]*

पहले तो वे डर जाती हैं। कहीं यह कोई छल तो नहीं? रावण पहले भी भेस बदल चुका है। हनुमान नीचे उतरते हैं, प्रणाम करते हैं, और बताते हैं कि वे कौन हैं। सीता के हर प्रश्न का उत्तर देते हैं। राम और लक्ष्मण का ऐसा प्रेम भरा और सटीक वर्णन करते हैं कि सीता को विश्वास होने लगता है।

फिर वे प्रमाण देते हैं। सीता की हथेली पर राम की अँगूठी रख देते हैं, जिस पर राम का नाम अंकित है।

सीता अँगूठी को थामती हैं, और वाल्मीकि कहते हैं, मानो वे स्वयं राम को थामे हुए हों। उनका चेहरा ख़ुशी से ऐसे खिल उठता है जैसे ग्रहण से छूटकर चाँद निकल आया हो।

फिर उनके मन से प्रश्न उमड़ पड़ते हैं, जैसे किसी से भी उमड़ेंगे जो महीनों से अकेला और डरा हुआ हो। राम कुशल से हैं? कुछ खाते हैं? लक्ष्मण उनके साथ हैं? क्या वे अब भी मुझे याद करते हैं? अब तक आए क्यों नहीं?

हनुमान हर प्रश्न का उत्तर बड़े कोमल मन से देते हैं। राम ठीक से सोते नहीं, माता, और जब सोते हैं तो आपका नाम लेकर जाग उठते हैं। खाना भी बहुत कम खाते हैं। कोई सुंदर फूल देखते हैं तो आह भरकर आपको याद करते हैं। वे अब तक सिर्फ़ इसलिए नहीं आए कि उन्हें पता नहीं था आप कहाँ हैं। पता चलते ही उन्हें कोई नहीं रोक पाएगा।

सीता सुनती हैं, और बहुत दिनों बाद पहली बार मुस्कुराती हैं, और रो भी पड़ती हैं। दोनों एक साथ।

*[ठहराव]*

प्रेम से भरे हनुमान एक प्रस्ताव रखते हैं। माता, मेरी पीठ पर बैठ जाइए। मैं आज ही आपको समुद्र पार राम के पास ले चलता हूँ।

सीता उन्हें धन्यवाद देती हैं, और मना कर देती हैं। तुम तो इतने छोटे हो, वे कहती हैं, मुझे कैसे ले जाओगे? हनुमान अपना रूप बड़ा करके दिखाते हैं कि वे ले जा सकते हैं। फिर भी सीता विनम्रता से मना करती हैं, और इसके पीछे गहरे कारण हैं। हो सकता है मैं समुद्र में गिर पड़ूँ, वे कहती हैं, और मैं अपनी इच्छा से किसी पराए पुरुष का स्पर्श नहीं करना चाहती। और सबसे बड़ी बात, आना राम को चाहिए। इस अन्याय को ठीक करना उनका सम्मान है, उनका अधिकार है।

फिर वे राम के लिए अपनी पहचान देती हैं। एक निजी स्मृति सुनाती हैं: चित्रकूट का एक दिन, जब एक कौए ने उन्हें परेशान किया था, और राम ने क्रोध में उसके पीछे एक तिनके को ही अस्त्र बनाकर छोड़ दिया था, और जब वह कौआ लौटकर उनकी शरण में आया, तो उसे छोड़ दिया था। यह बात केवल राम जानते हैं। और वे अपने वस्त्र के छोर में बँधी **चूड़ामणि** खोलती हैं, वह रत्न जिसे उन्होंने छिपाकर रखा था, और हनुमान को दे देती हैं।

राम से कहना, वे कहती हैं, मैं प्रतीक्षा करूँगी। पर सदा के लिए नहीं। उनसे कहना, जल्दी आएँ।

*[ठहराव]*

तो आइए, आज की बातें समेट लें।

सीता ने अपने और रावण के बीच एक तिनका रखकर उत्तर दिया, उससे सीधे बात करने से इनकार किया, और कहा कि मुझे राम को लौटा दो। पेड़ में छिपे हनुमान ने धीरे-धीरे राम की कथा सुनाई ताकि सीता डरें नहीं, और प्रमाण के रूप में उन्हें राम की अँगूठी दी। और सीता ने हनुमान के साथ चलने का प्रस्ताव विनम्रता से मना किया, इस भरोसे से कि राम स्वयं आएँ, और अपनी चूड़ामणि और एक निजी स्मृति पहचान के रूप में भेजी।

**आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए।** हनुमान जी दौड़कर नीचे नहीं कूदे। पहले सोचा कि उनकी बात सुनने वाले के मन पर कैसी लगेगी। इस सप्ताह जब किसी को कोई बड़ी बात बतानी हो, तो एक पल रुककर सोचिए: इसे ऐसे कैसे कहूँ कि इससे उसे सहारा मिले, डर नहीं।

अगले एपिसोड में हनुमान तय करते हैं कि जाने से पहले लंका को पता चल जाना चाहिए कि राम आ रहे हैं।

*[चिड़ियों की आवाज़ धीमी होती है। 2 सेकंड मौन।]*

**श्रेय (पढ़कर सुनाएँ):** वाल्मीकि रामायण के सुन्दर काण्ड के आधार पर DharmikStudio टीम द्वारा लिखित। AI स्वर में वाचन। कोई भूल हो तो इस एपिसोड पर "गलती बताएँ" का उपयोग करें।

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