सेतु और शरण
Episode 17 of 20 in रामायण: वाल्मीकि की कथा.
Narrated with an AI voice.
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नमस्कार। आइए, फिर साथ बैठते हैं।
पिछली बार हनुमान जी लौटे और बोले, "सीता को देख लिया।" राम जी ने उन्हें गले से लगा लिया। अब प्रतीक्षा का समय बीत चुका है। सुग्रीव, राम और लक्ष्मण के नेतृत्व में वानरों की सेना दक्षिण की ओर चल पड़ती है। वाल्मीकि जी कहते हैं कि सेना बड़े उत्साह से चली, दक्षिण के पहाड़ों और वनों के बीच से होती हुई, और महासागर के किनारे जाकर रुक गई। सामने जहाँ तक नज़र जाए, बस पानी ही पानी।
उस शाम, वाल्मीकि जी बताते हैं, राम जी लहरों के पास बैठकर लक्ष्मण जी से सीता जी की बातें करते हैं। हे पवन, जहाँ वे हैं वहाँ जाओ, उन्हें छूकर फिर मुझे छू जाओ। यही चाँद उन पर भी चमक रहा होगा। यह बड़ा शांत क्षण है। पीछे पूरी सेना खड़ी है, पर इस पल राम जी बस एक पति हैं, जिन्हें अपनी पत्नी की याद आ रही है।
*[ठहराव]*
अब ज़रा लंका चलते हैं, रावण की मंत्रणा-सभा में।
रावण देख चुका है कि एक अकेले वानर ने उसकी नगरी के साथ क्या किया। वह मंत्रियों को बुलाता है। ज़्यादातर मंत्री वही कहते हैं जो वह सुनना चाहता है। हम बलवान हैं, आने दीजिए उन्हें।
एक स्वर अलग है। वह है रावण के छोटे भाई **विभीषण** का। वाल्मीकि जी दिखाते हैं कि विभीषण एक से अधिक बार, पूरे आदर के साथ, वही बात कहते हैं। भैया, सीता जी को राम को लौटा दीजिए। नगर में अपशकुन हो रहे हैं। यह झगड़ा राम ने शुरू नहीं किया। अभी समय है, लंका के लिए और यहाँ के हर प्राणी के लिए संधि कर लीजिए।
आख़िर रावण का धैर्य टूट जाता है। वह कहता है, जो सगा होकर भी शत्रु का साथ दे, वह शत्रु से भी बुरा है। विभीषण चुपचाप यह सुनते हैं। फिर चार साथियों के साथ आकाश में उठते हैं और भाई से अंतिम बात कहते हैं। मैंने आपके भले की बात कही थी। आप सुनना नहीं चाहते। आप सुखी रहें। मैं जा रहा हूँ।
*[ठहराव]*
अब उत्तर के किनारे पर वानरों के शिविर को देखिए। अचानक आकाश में पाँच आकृतियाँ दिखाई देती हैं। विभीषण पुकारते हैं, मैं रावण का छोटा भाई हूँ। मैंने उससे सीता जी को लौटाने को कहा, पर उसने नहीं सुना। मैं अपना घर, अपना धन, सब छोड़ आया हूँ। मैं श्रीराम की शरण में आया हूँ।
सुग्रीव जी चौंक जाते हैं। वे राम जी से कहते हैं, यह तो शत्रु का सगा भाई है। जासूस हो सकता है। मौका पाकर वार कर सकता है।
राम जी यहाँ बड़ी समझदारी दिखाते हैं। वे अकेले निर्णय नहीं लेते। वे अपने हर मित्र से राय पूछते हैं। कोई कहता है, पहले परख लीजिए। कोई कहता है, कुछ दिन नज़र रखिए। फिर **हनुमान** जी बोलते हैं। वे जिस तरह खुलकर आए, जिस तरह बात की, उसमें कोई छल नहीं दिखता। और वे ठीक समय पर आए हैं, जब उन्हें दिख गया है कि धर्म किस ओर है। मेरी राय में इन्हें अपना लेना चाहिए।
राम जी सबकी बात सुनते हैं। फिर उत्तर देते हैं, और यह पूरी रामायण के सबसे प्यारे प्रसंगों में से है। पहले वे सीधी-सी बात कहते हैं, जो मित्र बनकर मेरे पास आए, उसे मैं नहीं ठुकरा सकता, भले उसमें दोष हों। फिर वे एक व्रत लेते हैं।
**सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते। अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥** (sakṛd eva prapannāya tavāsmīti ca yācate | abhayaṃ sarvabhūtebhyo dadāmy etad vrataṃ mama ||)
सीधे शब्दों में: "जो एक बार भी मेरी शरण में आकर कहे, 'मैं आपका हूँ', उसे मैं सब प्राणियों से अभय देता हूँ। यह मेरा व्रत है।"
*[ठहराव]*
राम जी इससे भी आगे कहते हैं। उन्हें यहाँ ले आओ। अगर स्वयं रावण भी शरण माँगने आता, तो मैं उसे भी शरण देता।
सोचिए, यह बात लोगों के लिए क्या मायने रखती है। यह नहीं कि "अगर तुम काफ़ी अच्छे हो", यह नहीं कि "अगर तुम बार-बार आओ"। एक बार काफ़ी है। **शरणागति** की परंपराओं में यह श्लोक बहुत प्रिय है। बहुत से भक्त, जब उन्हें लगता है कि उनके पास चढ़ाने को कुछ नहीं, तो यही धीरे से दोहराते हैं।
तो विभीषण नीचे आते हैं और राम जी के चरणों में प्रणाम करते हैं। और राम जी, वहीं किनारे पर, लक्ष्मण जी से समुद्र का जल मँगवाते हैं और विभीषण का लंका के भावी राजा के रूप में अभिषेक कर देते हैं। समुद्र पार करने से पहले ही, पूरा भरोसा।
*[ठहराव]*
पर समुद्र तो अब भी सामने है।
विभीषण सुझाव देते हैं कि राम जी स्वयं सागर से रास्ता माँगें। तो राम जी किनारे पर **कुश** बिछाकर, समुद्र की ओर मुख करके लेट जाते हैं और तीन रातें प्रार्थना में प्रतीक्षा करते हैं। कुछ नहीं होता। सागर नहीं आता।
चौथे दिन राम जी का धैर्य क्रोध में बदल जाता है। वे धनुष उठाकर कहते हैं कि अगर विनम्रता को कमज़ोरी समझा जाए, तो मैं इस सागर को सुखा दूँगा। पानी उथल-पुथल हो उठता है। और तब लहरों के बीच से हाथ जोड़े **समुद्र** देवता प्रकट होते हैं।
समुद्र कहते हैं, गहरा और दुर्गम होना मेरा स्वभाव है, उसे मैं बदल नहीं सकता। पर एक उपाय है। आपकी सेना में **नल** हैं, देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा के पुत्र। वे सेतु बनाएँ, मैं उसे थामे रहूँगा।
*[ठहराव]*
तो निर्माण शुरू होता है। वानर वनों में जाकर पेड़, चट्टानें और बड़े-बड़े पत्थर लाते हैं। किनारे तक ढोकर लाते हैं, और नल उन्हें नाप-जोखकर जोड़ते जाते हैं। वाल्मीकि जी दिन-दिन का काम गिनाते हैं। वे कहते हैं, पाँच दिन में **सेतु** समुद्र के पार लंका तक पहुँच गया।
यहाँ भारत भर के परिवार अपनी छोटी-छोटी कहानियाँ जोड़ते हैं। आप में से बहुत लोग उस नन्ही गिलहरी की कहानी जानते होंगे, जो रेत में लोटकर सेतु पर रेत झाड़ती थी, और राम जी ने प्यार से उसकी पीठ सहलाई तो तीन धारियाँ बन गईं। बहुत से लोग कहते हैं कि पत्थर इसलिए तैरे क्योंकि उन पर राम नाम लिखा था। ये बातें वाल्मीकि जी की कथा में नहीं हैं। ये बाद की रामकथाओं से और आम लोगों के प्रेम से आई हैं, और हम इन्हें उसी प्रेम से सँभालते हैं। ये सिखाती हैं कि कोई भी मदद छोटी नहीं होती।
*[ठहराव]*
सेना पार उतरकर लंका के किनारे डेरा डालती है। रावण के दो गुप्तचर, **शुक** और **सारण**, वानरों का वेश बनाकर घुस आते हैं। वे पकड़े जाते हैं और राम जी के सामने लाए जाते हैं। वानर गुस्से में हैं। पर राम जी मुस्कुराकर उन्हें छोड़ देते हैं। सब कुछ देख लो, गिनना हो तो गिन लो, और जाकर अपने राजा को बता दो।
और अब शांति का एक और प्रयास। एक भी बाण चलने से पहले राम जी वाली के पुत्र **अंगद** को रावण की सभा में भेजते हैं। संदेश छोटा है। सीता जी को लौटा दो और क्षमा माँग लो, तो युद्ध की ज़रूरत नहीं। मना करोगे, तो आगे जो होगा वह तुम्हारा चुनाव होगा।
अंगद निडर होकर संदेश सुनाते हैं। रावण के पहरेदार उन्हें पकड़ना चाहते हैं, पर वे आकाश में उठकर राम जी के पास लौट आते हैं। प्रस्ताव ठुकरा दिया गया है। आप में से बहुत लोग बाद की रामकथाओं से यह प्रसंग और रंग के साथ जानते हैं, जहाँ अंगद सभा में पाँव जमा देते हैं और कोई उसे हिला नहीं पाता। वाल्मीकि जी में यह क्षण छोटा है, पर संदेश वही है। शांति का दरवाज़ा आख़िरी पल तक खुला रखा गया।
*[ठहराव]*
तो आज की कथा को समेटते हैं। विभीषण ने अपने भाई के बजाय धर्म को चुना और राम जी की शरण में आए। राम जी ने हर मित्र की बात सुनी, फिर व्रत लिया कि जो एक बार भी आकर कहे "मैं आपका हूँ", उसे अभय मिलेगा। सागर ने रास्ता दिया और नल ने पाँच दिन में सेतु बनाया। और राम जी ने अंगद को शांति का एक और प्रस्ताव लेकर भेजा।
**आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए।** राम जी ने निर्णय से पहले सबकी राय ली, और फिर भरोसा चुना। इस सप्ताह अगर कोई नई शुरुआत की आशा लेकर आपके पास आए, तो अपने आसपास के लोगों की बात सुनिए, और फिर उसे एक सच्चा मौका दीजिए।
अगले एपिसोड में लंका का लंबा संघर्ष। हम उसे संक्षेप में सुनाएँगे, और देखेंगे कि अंत में राम जी ने रावण का भी कैसे सम्मान किया।
**श्रेय (पढ़कर सुनाएँ):** वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड के आधार पर, बाद की रामकथाओं पर एक टिप्पणी के साथ, DharmikStudio टीम द्वारा लिखित। AI स्वर में वाचन। कोई भूल हो तो इस एपिसोड पर "गलती बताएँ" का उपयोग करें।