जहाँ वैर समाप्त होता है
Episode 18 of 20 in रामायण: वाल्मीकि की कथा.
Narrated with an AI voice.
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नमस्कार। आइए, साथ बैठते हैं।
पिछली बार सेतु समुद्र के पार पहुँचा, विभीषण को शरण मिली, और राम जी ने अंगद को शांति का अंतिम प्रस्ताव लेकर रावण के पास भेजा। रावण ने मना कर दिया। और इस तरह लंका का संघर्ष शुरू होता है।
वाल्मीकि जी ने युद्ध को बहुत से सर्ग दिए हैं। वे अपने युग के कवि थे, और उन्होंने सब कुछ विस्तार से लिखा। हम यहाँ ऐसा नहीं करेंगे। आज हम यह कथा वैसे सुनाएँगे जैसे घर के बड़े रात को बच्चों को सुनाते हैं। कौन कहाँ खड़ा था, किसने क्या चुना, और उससे हमें क्या सीखना है। लड़ाई के हिस्से से हम जल्दी गुज़र जाएँगे। अगर आज आपके साथ बच्चे भी सुन रहे हैं, तो उन्हें बैठे रहने दीजिए। इस कथा में उन्हें डराने वाला कुछ नहीं है।
*[ठहराव]*
दिन-प्रतिदिन लंका की दीवारों के बाहर दोनों पक्ष आमने-सामने होते हैं। दोनों ओर के बड़े-बड़े योद्धा गिरते हैं।
संघर्ष के शुरू में ही वाल्मीकि जी उस दिन का वर्णन करते हैं जब राम और रावण पहली बार आमने-सामने होते हैं। उस दिन रावण हार रहा है। उसका धनुष टूट चुका है, मुकुट सिर से गिर गया है, और वह बिना अस्त्र के, थका-हारा खड़ा है। राम जी चाहते तो उसी क्षण सब कुछ समाप्त कर सकते थे। पर वे ऐसा नहीं करते। वे कहते हैं, आज तुम बहुत लड़े हो और थक गए हो। लंका लौट जाओ और विश्राम करो। जब ताज़ा हो जाओ तब फिर आना, तब मेरा बल देखना।
रावण अपने महल लौट जाता है, बल से नहीं, शिष्टता से झुका हुआ। लंबे युद्ध में यह छोटा-सा प्रसंग है, पर यह बता देता है कि राम कौन हैं। जिसके हाथ खाली हों, उस पर वे वार नहीं करते। राम जी के लिए युद्ध का भी अपना धर्म है।
*[ठहराव]*
रावण अपने सबसे शक्तिशाली सेनापतियों को एक-एक करके खोते देखता है, और तय करता है कि अपने भाई **कुंभकर्ण** को जगाया जाए।
एक विचित्र वरदान के कारण कुंभकर्ण महीनों तक सोते हैं। उन्हें जगाने में बड़ा शोर और बड़ी मेहनत लगती है। जब वे जागते हैं और सारी बात सुनते हैं, तो कुछ अनोखा करते हैं। वे रावण से साफ़ कहते हैं, तुमने ग़लत किया। तुम्हें विभीषण की बात माननी चाहिए थी। बिना सोचे काम किया, और अब संकट आ गया है। और भाई के मुँह पर सच कहने के बाद भी वे उसका साथ देने निकल पड़ते हैं। कुंभकर्ण सीधे-सादे पात्र नहीं हैं। वे सच देखते हैं, और फिर भी निष्ठा निभाते हैं। वे राम जी के बाणों से गिरते हैं, और लंका उनके लिए शोक करती है।
*[ठहराव]*
फिर आता है वह क्षण, जो रामायण सुनने वाले हर बच्चे को याद रहता है।
**लक्ष्मण** जी रणभूमि में अचेत होकर गिर पड़ते हैं। राम जी उनके पास बैठ जाते हैं, और जैसे उनकी सारी शक्ति चली जाती है। वाल्मीकि जी यहाँ राम जी को टूटे हुए हृदय के शब्द देते हैं। भाई ही न उठे, तो सीता का क्या, विजय का क्या।
वानरों के वैद्य **सुषेण** कहते हैं, अभी आशा है। हिमालय के एक पर्वत पर ऐसी जड़ी-बूटियाँ उगती हैं जो समय पर आ जाएँ तो लक्ष्मण जी को फिर से जगा सकती हैं। **हनुमान** जी उत्तर की ओर छलाँग लगाते हैं। पर्वत मिल जाता है, पर जड़ी-बूटियाँ पहचान में नहीं आतीं। ढूँढ़ने का समय नहीं है। तो वे पूरा शिखर ही उठाकर आकाश मार्ग से ले आते हैं।
सुषेण औषधि तैयार करते हैं। लक्ष्मण जी उसकी सुगंध लेते हैं, आँखें खोलते हैं, और ऐसे उठ बैठते हैं जैसे नींद से जागे हों। राम जी उन्हें गले से लगा लेते हैं।
इसीलिए इतने घरों में पर्वत उठाए हनुमान जी का चित्र रहता है। जब कोई अपना बीमार होता है, तो हमें याद आता है कि मदद बहुत दूर से भी, बहुत जल्दी आ सकती है।
*[ठहराव]*
रावण का पुत्र **इंद्रजीत**, लंका का सबसे कुशल योद्धा, हर तरह की माया और छिपे अस्त्रों से लड़ता है। अंत में उसका सामना लक्ष्मण जी से होता है, और लंका उसे भी खो देती है। रावण का शोक क्रोध में बदल जाता है, और अब वह स्वयं रणभूमि में आता है।
राम और रावण का अंतिम संग्राम बहुत लंबा चलता है। एक समय थके हुए राम जी सोच में खड़े हैं। तब देवताओं के साथ आए ऋषि **अगस्त्य** उनके पास आते हैं। वाल्मीकि जी बताते हैं कि अगस्त्य जी राम जी को सूर्य की एक स्तुति सिखाते हैं, **आदित्य हृदय**, यानी सूर्य का हृदय। इसका पाठ करो, वे कहते हैं, तुम्हारा बल और स्पष्टता लौट आएगी। राम जी सूर्य की ओर मुख करके तीन बार पाठ करते हैं और नई ऊर्जा से भर जाते हैं। आज भी बहुत लोग रोज़ सुबह इसका पाठ करते हैं। कुछ विद्वान मानते हैं कि यह ग्रंथ में बाद में जुड़ा, और ईमानदारी के लिए हम यह बात यहाँ कह देते हैं।
देवराज इंद्र अपने सारथी **मातलि** को रथ के साथ राम जी के पास भेजते हैं, ताकि दोनों राजा बराबरी से आमने-सामने हों।
*[ठहराव]*
और फिर अंत आता है। राम जी ब्रह्मा जी के वरदान वाला वह अस्त्र उठाते हैं, जो बरसों पहले वन में अगस्त्य जी ने उन्हें दिया था, और लंका के राजा रावण गिर पड़ते हैं।
हम इतना ही कहेंगे, और एक पल मौन रहेंगे।
*[ठहराव]*
रावण एक महान व्यक्ति थे जो ग़लत राह पर चले गए। वे वेदों के ज्ञाता थे। शिव जी के भक्त थे, और परंपरा **शिव तांडव स्तोत्र** को उन्हीं की रचना मानती है। उन्होंने ऐसा तप किया था कि देवता भी चकित रह गए। वाल्मीकि जी इनमें से कुछ भी नहीं छिपाते। एक बाद की परंपरा भी है, जो बहुत घरों में प्रिय है, कि राम जी ने लक्ष्मण जी को अंतिम साँसें ले रहे रावण के पास राजधर्म सीखने भेजा। यह वाल्मीकि जी में नहीं है, पर इससे पता चलता है कि हमारे बड़े हमें रावण को कैसे देखना सिखाना चाहते थे। ऐसा व्यक्ति, जिसके ज्ञान का अंत में भी सम्मान हो सकता है।
रावण की रानी **मंदोदरी** रणभूमि में आकर अपने पति के लिए विलाप करती हैं। वाल्मीकि जी में उनका विलाप प्रेम और पीड़ा से भरा है। वे कहती हैं कि उन्होंने पहले ही समझाया था। वे उनकी महानता को याद करती हैं। यह पूरी कथा के सबसे दुखभरे प्रसंगों में से है, और यह हमें दूसरे पक्ष के लोगों का दुख भी महसूस करना सिखाता है।
*[ठहराव]*
अब राम जी विभीषण से कहते हैं कि वे अपने भाई का अंतिम संस्कार करें।
विभीषण हिचकते हैं। वे क्रूर थे, विभीषण कहते हैं। उन्होंने अधर्म किया। पराई स्त्री का हरण किया। मैं उनका सम्मान कैसे करूँ?
और राम जी उत्तर देते हैं:
**मरणान्तानि वैराणि निर्वृत्तं नः प्रयोजनम्। क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव॥** (maraṇāntāni vairāṇi nirvṛttaṃ naḥ prayojanam | kriyatām asya saṃskāro mamāpy eṣa yathā tava ||)
"वैर मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है। हमारा प्रयोजन पूरा हुआ। इनका संस्कार करो। अब ये जितने तुम्हारे हैं, उतने ही मेरे भी।"
राम जी रावण के बारे में यह भी कहते हैं कि वे वीर थे, बलवान थे, और उन्होंने साहस से अंत का सामना किया। उन्हें वह सम्मान दो जो एक राजा को मिलना चाहिए।
तो विभीषण पूरे आदर से अंतिम संस्कार करते हैं, चंदन और सुगंधित लकड़ियों के साथ, वेद मंत्रों के साथ, जैसा लंका के राजा के योग्य था।
*[ठहराव]*
तो आज की कथा को समेटते हैं। कुंभकर्ण ने भाई से सच कहा और फिर भी उसका साथ दिया। हनुमान जी पूरा औषधि पर्वत ले आए ताकि लक्ष्मण जी उठ सकें। थके हुए राम जी को अगस्त्य जी ने आदित्य हृदय दिया। रावण गिरे, और राम जी ने विभीषण से कहा कि वैर मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है, और रावण को राजा का सम्मान दिया जाए।
**आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए।** क्या आपके जीवन में कोई पुराना झगड़ा है जो बाहर से तो ख़त्म हो चुका है, पर मन में अब भी बैठा है? आज रात उस व्यक्ति को एक बार बिना क्रोध के याद कीजिए, जैसे अंत में राम जी ने रावण को याद किया। किसी से कुछ कहने की ज़रूरत नहीं। बस उस झगड़े को अपने भीतर समाप्त हो जाने दीजिए।
अगले एपिसोड में सीता जी राम जी के सामने आएँगी, और अयोध्या की ओर घर वापसी शुरू होगी।
**श्रेय (पढ़कर सुनाएँ):** वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड के आधार पर, संक्षेप में, बाद की परंपराओं पर टिप्पणी के साथ, DharmikStudio टीम द्वारा लिखित। AI स्वर में वाचन। कोई भूल हो तो इस एपिसोड पर "गलती बताएँ" का उपयोग करें।