अयोध्या की ओर घर वापसी

Episode 19 of 20 in रामायण: वाल्मीकि की कथा.

Narrated with an AI voice.

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नमस्कार। आइए, पास बैठिए।

पिछली बार लंबा संघर्ष समाप्त हुआ, और राम जी ने कहा कि रावण को राजा का सम्मान दिया जाए। आज कथा घर की ओर मुड़ती है। यह मिलन का एपिसोड है। पर इसमें रामायण का एक बहुत कठिन क्षण भी है, और हम उसके साथ ईमानदारी से, कोमलता से बैठेंगे।

*[ठहराव]*

राम जी सबसे पहले अपना वचन निभाते हैं। वे लक्ष्मण जी से कहते हैं कि समुद्र के जल से **विभीषण** का लंका के राजा के रूप में अभिषेक करें, जैसा उन्होंने उस पार वचन दिया था।

फिर राम जी **हनुमान** जी को अशोक वाटिका भेजते हैं। जाओ, सीता को सब कुछ बताओ। हनुमान जी सीता जी को प्रणाम करके कहते हैं, राम जी कुशल हैं, लक्ष्मण जी कुशल हैं, सब समाप्त हो गया। सीता जी देर तक कुछ बोल नहीं पातीं। हनुमान जी पूछते हैं कि आप चुप क्यों हैं, तो वे कहती हैं, इस समाचार के बदले देने लायक मेरे पास कुछ नहीं। सोना, रत्न, राज्य भी कम पड़ेगा।

फिर हनुमान जी उन पहरेदार स्त्रियों की ओर देखते हैं जिन्होंने इतने समय तक सीता जी को घेरे रखा, दिन-रात डराया। वे उन्हें दंड देने की बात कहते हैं।

सीता जी मना कर देती हैं। वे तो अपने राजा की सेवा कर रही थीं, वे कहती हैं। जो आदेश मिला, वही किया। फिर वे एक पुरानी बात सुनाती हैं। किसी ने भला किया हो या बुरा, सज्जन को दया ही करनी चाहिए, क्योंकि ऐसा कोई नहीं जो कभी भूल न करे।

एक पल इस पर रुकिए। जिसने सबसे ज़्यादा सहा, वही सबसे पहले क्षमा करती है।

*[ठहराव]*

अब विभीषण सीता जी को, स्नान और शृंगार के बाद, पूरे शिविर के सामने राम जी के पास लाते हैं।

आगे जो होता है, वह सुनना कठिन है, और वाल्मीकि जी उसे नरम नहीं करते। राम जी सबके सामने सीता जी से बात करते हैं। वे कहते हैं कि उन्होंने अपने कर्तव्य और कुल के सम्मान के लिए संघर्ष किया, और सीता इतने समय पराए घर में रहीं। वे कहते हैं कि सीता जहाँ चाहें, जा सकती हैं।

सीता जी स्तब्ध रह जाती हैं। आँसू बहने लगते हैं। और फिर वे उत्तर देती हैं, और उनका उत्तर गरिमा से भरा है। आप मुझसे ऐसे क्यों बोल रहे हैं, जैसे कोई साधारण पुरुष साधारण स्त्री से बोलता है? जो मेरे वश में था, मेरा मन, वह सदा आपका रहा। जो मेरे वश में नहीं था, मेरा हरण, उसमें मेरा क्या दोष? अगर आपको मुझसे मुँह ही मोड़ना था, तो हनुमान के हाथ संदेश भेज देते, मैं सबको इस युद्ध से बचा लेती।

फिर वे लक्ष्मण जी से कहती हैं कि अग्नि तैयार करें। लक्ष्मण जी राम जी की ओर देखते हैं, राम जी मौन हैं। सीता जी हाथ जोड़कर **अग्नि** देव से प्रार्थना करती हैं। जैसे मेरा मन कभी राम से नहीं हटा, वैसे ही, हे सब लोकों के साक्षी, मेरी रक्षा करो। और वे अग्नि में प्रवेश करती हैं।

*[ठहराव]*

अग्निदेव लपटों से प्रकट होते हैं, सीता जी को अपनी गोद में उठाए, बिल्कुल सुरक्षित, और उन्हें राम जी के सामने रख देते हैं। वे घोषणा करते हैं, सीता पवित्र हैं। न वचन से, न मन से, न दृष्टि से, वे कभी डिगीं नहीं।

राम जी कहते हैं कि उन्हें स्वयं सीता पर कभी संदेह नहीं था। उन्होंने यह इसलिए किया कि संसार में कोई कभी सीता के विरुद्ध एक शब्द न कह सके। और वे सीता जी का हाथ थाम लेते हैं।

वाल्मीकि जी कहते हैं कि उस क्षण आकाश में देवता एकत्र हुए, और उनके साथ दिव्य रूप में राम जी के पिता **दशरथ** भी आए। वे राम जी को गले लगाते हैं और कहते हैं कि उन्हें अपने पुत्र पर गर्व है। फिर बड़े स्नेह से सीता जी से कहते हैं कि इस दिन के लिए राम से मन में रोष न रखना। और जब **इंद्र** राम जी से वर माँगने को कहते हैं, तो राम जी केवल एक चीज़ माँगते हैं। जिन वानरों ने उनके लिए प्राण दिए, वे सब फिर से जी उठें, स्वस्थ और प्रसन्न, और जहाँ भी जाएँ उन्हें फल और जल मिले।

आगे बढ़ने से पहले एक ईमानदार बात। अग्नि-परीक्षा रामायण के सबसे अधिक विवादित प्रसंगों में से एक है। यह युद्धकांड में है, जैसा यह काव्य हम तक पहुँचा है, पर बहुत से विद्वान और भक्त यह प्रश्न उठाते रहे हैं कि क्या यह वाल्मीकि की सबसे पुरानी कथा का हिस्सा थी, जैसे बहुत से लोग उत्तरकांड को बाद की परत मानते हैं, और बाद की परंपराएँ इसे अलग-अलग तरह से कहती हैं। इसलिए इसे परंपरा का एक विवादित अंश मानकर सुनिए, सीता जी के बारे में कोई तय निर्णय मानकर नहीं।

बहुत से भक्तों को यह प्रसंग पीड़ा देता है। यह ठीक है। इसे महसूस करना ही चाहिए। अलग-अलग परंपराओं ने इसे अलग-अलग तरह से सँभाला है। जैसे **अध्यात्म रामायण** कहती है कि जिनका हरण हुआ वे छाया सीता थीं, असली सीता तो पूरे समय अग्निदेव की रक्षा में थीं, और यह क्षण उनकी वापसी का है। हम इनमें से किसी कथा को दूसरी से ऊपर नहीं रखते। सबमें जो एक-सा है, वह हैं स्वयं सीता जी। सच्ची, निडर, और हर तरह से राम जी के बराबर।

*[ठहराव]*

अब कथा सचमुच ऊपर उठती है। विभीषण **पुष्पक** विमान लाते हैं। सुग्रीव, हनुमान, विभीषण और बहुत से मित्र राम, सीता और लक्ष्मण के साथ बैठते हैं, और विमान आकाश में उठता है।

उत्तर की ओर उड़ते हुए राम जी नीचे की हर जगह सीता जी को दिखाते जाते हैं। वह रही लंका। वह रहा नल का बनाया सेतु। यह किष्किंधा है, जहाँ सुग्रीव से मेरी मित्रता हुई। सीता जी की इच्छा से विमान यहाँ रुकता है, ताकि तारा और किष्किंधा की दूसरी स्त्रियाँ भी अयोध्या चल सकें। फिर आगे। वह रहा पंपा, जहाँ शबरी प्रतीक्षा करती थीं। वह पंचवटी, जहाँ हम रहे। वह चित्रकूट, जहाँ भरत हमें ढूँढ़ते हुए आए थे।

सोचिए, कितना सुंदर दृश्य है। इतना सब होने के बाद एक पति अपनी पत्नी को ऊपर से वह पूरा रास्ता दिखा रहा है, जिस पर वे दोनों साथ चले।

*[ठहराव]*

चौदह वर्ष पूरे होने के दिन वे **भरद्वाज** ऋषि के आश्रम में रुकते हैं। और यहाँ राम जी बड़ी संवेदनशील बात करते हैं। वे हनुमान जी को आगे भेजते हैं, पहले गुह के पास, फिर भरत के पास। भरत को बताना कि हम आ रहे हैं, और सुनते समय उसका चेहरा देखना। अगर इतने बरसों बाद अब वह राजा बनना चाहे, तो उसे ही राज करने देना।

राम जी को भाई पर संदेह नहीं था। वे बस किसी से कुछ छीनना नहीं चाहते थे।

हनुमान जी भरत जी को **नंदीग्राम** में पाते हैं। उपवास से दुबले, वल्कल पहने, सिंहासन पर पादुकाएँ रखकर राम जी के नाम से राज चलाते हुए। समाचार सुनकर भरत जी भाव-विह्वल हो जाते हैं। वे हनुमान जी को गले लगा लेते हैं और प्रश्न पर प्रश्न पूछते जाते हैं।

*[ठहराव]*

अगले दिन पूरी अयोध्या नंदीग्राम उमड़ पड़ती है। माताएँ आती हैं, मंत्री आते हैं, रास्ते सजाए जाते हैं। पुष्पक उतरता है और राम जी नीचे आते हैं।

भरत जी राम जी के चरणों में गिर पड़ते हैं। फिर वे **पादुकाएँ** उठाते हैं, जो चौदह वर्ष सिंहासन पर रहीं, और अपने हाथों से राम जी के चरणों में पहना देते हैं। आपका राज्य मैंने धरोहर की तरह सँभाला, वे कहते हैं। आज आपको लौटाता हूँ।

राम जी माताओं के पास जाते हैं, कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा, और हर एक को प्रणाम करते हैं, कैकेयी को भी। इसके आगे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं।

बहुत से परिवार इसी घर वापसी की याद में **दीपावली** पर दीये जलाते हैं। वाल्मीकि जी दीयों का वर्णन नहीं करते। यह परंपरा बाद में लोगों की खुशी से पनपी, और बड़ी सुंदर परंपरा है।

*[ठहराव]*

फिर **वसिष्ठ** जी राम जी का राज्याभिषेक करते हैं, सीता जी उनके साथ बैठी हैं। राम जी सीता जी को मोतियों का हार देते हैं। और सीता जी, उन सबकी ओर देखकर जिन्होंने साथ दिया, वह हार उतारकर हनुमान जी को दे देती हैं।

वाल्मीकि जी उसके बाद के राज का वर्णन करते हैं। राम जी के राज में कोई भय में नहीं जीता था। वर्षा समय पर होती थी। माता-पिता को संतान का शोक नहीं सहना पड़ता था। लोग संतुष्ट थे और अपना काम अच्छी तरह करते थे। न्याय और ममता वाले इसी शासन को हम **रामराज्य** कहते हैं।

*[ठहराव]*

तो आज की कथा को समेटते हैं। सीता जी ने उन पहरेदार स्त्रियों को क्षमा किया, यह कहकर कि कोई भी भूल से मुक्त नहीं। उन्होंने राम जी को गरिमा से उत्तर दिया, और अग्निदेव ने उन्हें अग्नि से निकालकर पवित्र घोषित किया। राम जी ने भरत का चेहरा देखने हनुमान जी को आगे भेजा, और भरत जी ने पादुकाएँ फिर राम जी के चरणों में पहना दीं। और अयोध्या में राम जी का राज्याभिषेक हुआ।

**आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए।** सीता जी ने सबसे ज़्यादा सहा, फिर भी सबसे पहले क्षमा किया। इस सप्ताह अगर किसी ने आपको दुख दिया हो, पर वह केवल किसी और के कहने पर चल रहा था, तो उसे मन से जाने देने की कोशिश कीजिए।

अगले और अंतिम एपिसोड में हम घूमकर फिर वहीं पहुँचेंगे, वाल्मीकि जी के आश्रम में, जहाँ दो छोटे बालक यही कथा गाना सीखते हैं।

**श्रेय (पढ़कर सुनाएँ):** वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड के आधार पर, अध्यात्म रामायण पर एक टिप्पणी के साथ, DharmikStudio टीम द्वारा लिखित। AI स्वर में वाचन। कोई भूल हो तो इस एपिसोड पर "गलती बताएँ" का उपयोग करें।

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