लव और कुश का गान
Episode 20 of 20 in रामायण: वाल्मीकि की कथा.
Narrated with an AI voice.
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नमस्कार। इस कथा-माला में यह हमारी अंतिम बैठक है, तो पहले एक धीमी साँस लेते हैं। भीतर। और बाहर।
पिछली बार राम जी घर लौटे। भरत जी ने पादुकाएँ फिर उनके चरणों में पहना दीं, और अयोध्या में सीता जी के साथ राम जी का राज्याभिषेक हुआ। बहुत से परिवारों के लिए रामायण यहीं आनंद के साथ समाप्त हो जाती है।
वाल्मीकि जी के काव्य में एक भाग और है, **उत्तरकांड**। उसे खोलने से पहले मैं दो बातें ईमानदारी से कहना चाहता हूँ। पहली, बहुत से विद्वान मानते हैं कि उत्तरकांड का बड़ा भाग बाद में, दूसरे हाथों से जोड़ा गया। दूसरी, कुछ सबसे प्रिय रामकथाएँ, जैसे गोस्वामी तुलसीदास जी का **रामचरितमानस**, वह भाग नहीं सुनातीं जो हम अभी सुनने वाले हैं। तो अगर आपके घर की रामायण राज्याभिषेक पर समाप्त होती है, तो आप बहुत अच्छी संगत में हैं।
हम इसे आज इसलिए सुना रहे हैं कि यह वाल्मीकि जी की परंपरा का हिस्सा है, और यह हमारी कथा को वहीं ले आता है जहाँ से वह शुरू हुई थी। हम इसे संक्षेप में, और सँभलकर सुनाएँगे।
*[ठहराव]*
राम जी के राज के वर्ष शांति से बीतते हैं। ऋषि **अगस्त्य** दरबार में आते हैं और बहुत सी पुरानी कथाएँ सुनाते हैं। उनमें से एक बच्चों को बहुत प्यारी है। अगस्त्य जी बताते हैं कि जब हनुमान जी बहुत छोटे थे, उन्होंने उगते सूरज को पका फल समझा और उसे तोड़ने आकाश में छलाँग लगा दी। देवता घबराए भी, हँसे भी, और उन्होंने बालक को बल का वरदान दिया, और साथ में यह भी कि वे अपनी शक्ति भूले रहेंगे, जब तक कोई उन्हें याद न दिलाए। इसीलिए बहुत पहले समुद्र के किनारे जाम्बवान जी को हनुमान जी को याद दिलाना पड़ा था कि वे कौन हैं।
*[ठहराव]*
अब वह भाग आता है जो सुनना कठिन है।
सीता जी माँ बनने वाली हैं। वे राम जी से कहती हैं कि उनका मन गंगा किनारे ऋषियों के आश्रम देखने का है। लगभग उसी समय राम जी को पता चलता है कि नगर में कुछ लोग सीता जी के बारे में संदेह की बातें कर रहे हैं, क्योंकि वे लंका में रही थीं।
राम जी जानते हैं कि सीता पवित्र हैं। उन्हें कभी संदेह नहीं हुआ। पर वे राजा हैं, और मानते हैं कि राजा को अपनी हर प्रजा का विश्वास बनाए रखना चाहिए। अपने कर्तव्य और अपने प्रेम के बीच फँसे हुए वे एक ऐसा निर्णय लेते हैं जो उनका अपना हृदय तोड़ देता है। वे **लक्ष्मण** जी से कहते हैं कि सीता को गंगा पार वाल्मीकि जी के आश्रम के पास वन में छोड़ आएँ।
लक्ष्मण जी रोते हुए यह करते हैं। उस पार पहुँचकर वे सीता जी को बताते हैं। सीता जी का दुख बहुत गहरा है। पर राम जी के लिए उनका संदेश, जैसा वाल्मीकि जी बताते हैं, परवाह से भरा है। प्रजा को वैसे ही सँभालना जैसे अपने भाइयों को सँभालते हो। अपने यश की रक्षा करना। मुझे तुम्हारी ही चिंता है।
*[ठहराव]*
रामायण का यही भाग बहुत लोगों को सबसे कठिन लगता है। सदियों से लोग पूछते आए हैं कि क्या राम जी ने ठीक किया। कवियों ने पूछा है, भक्तों ने पूछा है, शायद आपकी दादी ने भी पूछा हो। यह प्रश्न पूछना श्रद्धा की कमी नहीं है। अक्सर यह प्रेम ही होता है, सीता जी के लिए, और राम जी के लिए भी। आज हम आपके लिए इसका उत्तर नहीं देंगे। हम बस सीता जी के पास बने रहेंगे।
*[ठहराव]*
वाल्मीकि जी के शिष्य नदी किनारे एक युवा स्त्री को रोते देखते हैं और दौड़कर गुरु जी को बताते हैं। **वाल्मीकि** जी स्वयं आते हैं। वे जानते हैं कि यह कौन हैं। वे बड़े प्यार से कहते हैं, आपका स्वागत है, आप मेरी बेटी जैसी हैं, आश्रम की स्त्रियाँ आपकी देखभाल करेंगी। और इस तरह सीता जी वाल्मीकि जी के आश्रम में, पेड़ों और नदी की आवाज़ के बीच रहने लगती हैं।
वहीं उनके जुड़वाँ पुत्र जन्म लेते हैं। वाल्मीकि जी उनका नाम रखते हैं, **लव** और **कुश**। वे वन में बड़े होते हैं, बलवान और तेजस्वी, और उनके गुरु हैं स्वयं कवि वाल्मीकि।
और अब आपको हमारा पहला एपिसोड याद आएगा। तमसा नदी के किनारे दुखी कवि, वे दो पक्षी, पहला श्लोक, और ब्रह्मा जी का आशीर्वाद कि राम की कथा कहो। वाल्मीकि जी ने अपना काव्य पूरा किया। और सबसे पहले जिन्हें उन्होंने यह सिखाया, वे यही दो बालक थे। लव और कुश श्लोक-श्लोक करके पूरी रामायण कंठस्थ करते हैं, वीणा के साथ गाने के लिए, बिना जाने कि यह उनके अपने माता-पिता की कथा है।
*[ठहराव]*
अयोध्या में राम जी **अश्वमेध** यज्ञ करते हैं। ऐसे अनुष्ठान में राजा के साथ रानी का होना आवश्यक माना जाता था। राम जी दूसरा विवाह नहीं करते। वे सीता जी की सोने की प्रतिमा बनवाते हैं और उसे अपने पास रखते हैं। उत्तरकांड की सारी बातों में बहुत से भक्त इसी को सबसे ज़्यादा सँभालकर रखते हैं। राम जी जीवन भर सीता जी के प्रति निष्ठावान रहे।
वाल्मीकि जी अपने दोनों शिष्यों के साथ यज्ञ में आते हैं। वे उनसे कहते हैं कि जहाँ भी लोग इकट्ठा हों, वहाँ रामायण गाओ। तो बालक गाते हैं, पहले गलियों में, फिर स्वयं राम जी की सभा में। सब मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। राम जी आदेश देते हैं कि बालकों को सोना दिया जाए। वे विनम्रता से मना कर देते हैं। हम तो वन में फल-मूल खाकर रहते हैं, सोने का क्या करेंगे? राम जी पूछते हैं, यह काव्य किसने रचा? वे कहते हैं, हमारे गुरु, महर्षि वाल्मीकि ने। राम जी दिन-प्रतिदिन सुनते हैं, और धीरे-धीरे समझ जाते हैं कि ये बालक कौन हैं।
*[ठहराव]*
राम जी वाल्मीकि जी को संदेश भेजते हैं। अगर सीता पवित्र हैं, तो यहाँ आकर सबके सामने यह कहें।
वाल्मीकि जी सीता जी को सभा में लाते हैं। स्वयं कवि उनके लिए बोलते हैं। मैंने जीवन में कभी असत्य नहीं कहा, और मैं कहता हूँ कि सीता निर्दोष हैं। राम जी उत्तर देते हैं कि वे यह जानते हैं। वे कहते हैं कि ये दोनों बालक उनके पुत्र हैं।
तब सीता जी हाथ जोड़कर, धरती की ओर देखते हुए खड़ी होती हैं। वे धीरे से कहती हैं, अगर मैंने राम के सिवा कभी किसी का विचार नहीं किया, तो मेरी माता धरती मुझे अपने में स्थान दें। आपको याद होगा, मिथिला में वे बचपन में धरती की एक हल-रेखा में मिली थीं। वे घर लौट रही हैं।
धरती धीरे से खुलती है। धरती माता **भूदेवी** एक सुंदर सिंहासन पर प्रकट होती हैं, सीता जी को अपनी बाँहों में लेकर अपने पास बिठा लेती हैं। और सीता जी उसी धरती में लौट जाती हैं जिससे वे आई थीं, और आकाश से फूल बरसते हैं।
राम जी का शोक बहुत बड़ा है। वाल्मीकि जी उसे छिपाते नहीं।
*[ठहराव]*
राम जी अपने पुत्रों के साथ बरसों और राज करते हैं। और जब धरती पर उनका समय पूरा होता है, वाल्मीकि जी बताते हैं, राम जी अयोध्या के उन लोगों के साथ जो उनके साथ जाना चाहते थे, **सरयू** के जल में प्रवेश करते हैं, और अपने धाम लौट जाते हैं।
*[ठहराव]*
तो आज की कथा ही नहीं, पूरी बीस बैठकों को समेटते हैं। एक कवि ने नदी किनारे दो पक्षियों को देखा और उसे एक श्लोक मिला। एक राजकुमार मुस्कुराते हुए पिता की नगरी से निकल गया। एक भाई ने सिंहासन पर पादुकाएँ रखकर राज चलाया। एक मित्र समुद्र लाँघ गया। जो एक बार भी शरण माँगे, उसे अभय का वचन मिला। एक राजा को अंत में उसी ने सम्मान दिया जिसने उसे हराया था। और एक माँ ने, बिना जाने, अपने बेटों को उनकी ही कथा सिखा दी, जिसे उन्होंने संसार को गाकर सुनाया।
**आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए।** लव और कुश ने यह कथा कंठस्थ की और दूसरों के लिए गाई। इन एपिसोड में रामायण का जो भी छोटा-सा हिस्सा आपके मन में रह गया हो, इस सप्ताह उसे अपने से छोटे किसी को सुनाइए। यह कथा इतने समय से ऐसे ही जीवित है।
बीसों एपिसोड हमारे साथ बैठने के लिए धन्यवाद। राम और सीता की कथा आपके और आपके परिवार के साथ बनी रहे।
**श्रेय (पढ़कर सुनाएँ):** वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड और बालकांड के आधार पर, संक्षेप में, विद्वानों के मत और रामचरितमानस पर टिप्पणी के साथ, DharmikStudio टीम द्वारा लिखित। AI स्वर में वाचन। कोई भूल हो तो इस एपिसोड पर "गलती बताएँ" का उपयोग करें।