एक राजा की प्रार्थना और चार पुत्र
Episode 2 of 20 in रामायण: वाल्मीकि की कथा.
Narrated with an AI voice.
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नमस्कार। फिर से स्वागत है। पिछली बार हम तमसा के किनारे वाल्मीकि जी के साथ बैठे थे, जहाँ एक छोटे पक्षी के लिए उनकी करुणा पहला श्लोक बन गई थी। आज से असली कथा शुरू होती है, एक नगरी में।
एक साँस मेरे साथ। भीतर। और बाहर।
*[ठहराव]*
**सरयू** नदी के किनारे **कोसल** देश है, अन्न और गौओं से भरा-पूरा। उसी देश में बसी है **अयोध्या** नगरी। इस नाम का अर्थ है वह नगरी जिससे कोई युद्ध न कर सके। वाल्मीकि जी इस नगरी का वर्णन बड़े इत्मीनान से करते हैं, और मैं चाहता हूँ कि आप भी उसे वैसे ही देखें।
चौड़ी सड़कें, जिन पर पानी छिड़का जाता है ताकि धूल न उड़े। बाग-बगीचे, आम के कुंज, बाज़ार की गलियाँ, पास-पास बने घर, छतों पर लहराती पताकाएँ। गायक, नर्तक, कारीगर, दूर-दूर से आए व्यापारी। मज़बूत परकोटा, गहरी खाई। और लोग, वाल्मीकि जी कहते हैं, संतुष्ट हैं। कोई लोभी नहीं, कोई ओछा नहीं, कोई अनपढ़ नहीं, कोई भूखा नहीं। यह एक अच्छी नगरी का चित्र है, वैसी नगरी जैसी हर शासक को बनानी चाहिए।
इस नगरी के राजा हैं इक्ष्वाकु वंश के **दशरथ**। विद्वान, सावधान, उदार, और प्रजा के प्यारे। उनके आठ बुद्धिमान मंत्री हैं, जिनमें उनके सारथी और मित्र **सुमंत्र** भी हैं, और दो कुलगुरु, महर्षि **वसिष्ठ** और **वामदेव**।
*[ठहराव]*
पर इस सुखी नगरी के राजा के मन में एक चुपचाप-सा दुख है। उनकी तीन प्रमुख रानियाँ हैं, **कौसल्या**, **कैकेयी** और **सुमित्रा**, पर संतान कोई नहीं। राह देखते-देखते वे बूढ़े हो चले हैं। इतने महान राजाओं का वंश, कहीं उन्हीं पर आकर न थम जाए।
एक दिन यही सोचते हुए वे निश्चय करते हैं कि पुत्र की कामना से **अश्वमेध** यज्ञ करेंगे। मंत्रियों और गुरुओं को बुलाते हैं, और सब सहमत होते हैं।
तब उनके पुराने साथी सुमंत्र राजा को एक ओर ले जाकर कहते हैं, महाराज, मैंने ऋषियों से एक पुरानी बात सुनी थी। उन्होंने कहा था कि वन में पले-बढ़े, दुनिया से अनजान एक युवा ऋषि **ऋष्यशृंग** एक दिन राजा दशरथ को पुत्र दिलाने में सहायक होंगे।
सुमंत्र बताते हैं कि ऋष्यशृंग का विवाह अंग देश के राजा **रोमपाद** की पुत्री **शांता** से हुआ है, और रोमपाद दशरथ जी के घनिष्ठ मित्र हैं। तो दशरथ जी स्वयं अंग देश जाते हैं, वहाँ उनका प्रेम से स्वागत होता है, और वे बड़े सम्मान के साथ युवा ऋषि और उनकी पत्नी को अयोध्या ले आते हैं।
*[ठहराव]*
एक वर्ष बीतता है। वसंत लौटता है, तो सरयू के उत्तरी तट पर अश्वमेध यज्ञ होता है। बहुत बड़ा आयोजन। चारों दिशाओं से राजा आते हैं, दिन-रात अतिथियों को भोजन कराया जाता है, और ग्रंथ कहता है कि वहाँ किसी ने कभी ये शब्द नहीं सुने, "अब कुछ नहीं बचा" या "चले जाओ"। हर किसी को वह मिला जिसकी उसे ज़रूरत थी।
उसके बाद ऋष्यशृंग एक दूसरा यज्ञ शुरू करते हैं, जो विशेष रूप से पुत्र-प्राप्ति के लिए होता है। इसे **पुत्रकामेष्टि** कहते हैं।
अब वाल्मीकि जी हमारी नज़र अयोध्या से उठाकर देवलोक की ओर ले जाते हैं। देवता ब्रह्मा जी के पास इकट्ठा हैं, चिंता में। लंका का एक राजा है, **रावण**, जिसे यह वरदान मिला है कि कोई देवता, कोई गंधर्व, कोई दानव उसे पराजित नहीं कर सकता। अपने अभिमान में उसने मनुष्यों से रक्षा माँगने की ज़रूरत ही नहीं समझी। उसे लगा, मनुष्य इतने छोटे हैं कि उनकी क्या गिनती। अब वह सारे लोकों को सताता है, और कोई उसे रोक नहीं पाता।
उसी समय भगवान **विष्णु** वहाँ आते हैं, और देवता उनसे विनती करते हैं कि वे धरती पर मनुष्य रूप में, दशरथ के चार पुत्रों के रूप में जन्म लें। विष्णु स्वीकार कर लेते हैं।
मुझे यह बात बहुत सुंदर लगती है। सत्ता के घमंड का उत्तर एक मानव शिशु के रूप में आता है। रावण ने साधारण मनुष्य को तुच्छ समझा था, और सहायता ठीक उसी रूप में आती है।
*[ठहराव]*
उधर अयोध्या में यज्ञ की अग्नि के पास एक अद्भुत बात होती है। लपटों में से एक विशाल, तेजस्वी पुरुष प्रकट होता है, लाल वस्त्र पहने, साँवला और दीप्तिमान, हाथ में चाँदी के ढक्कन वाला सोने का पात्र लिए। वह राजा से कहता है, मुझे प्रजापति ने भेजा है। यह **पायस** लो, देवताओं की बनाई यह खीर। इसे अपनी रानियों को दो, उन्हें पुत्र प्राप्त होंगे।
दशरथ जी उस पात्र को ऐसे थामते हैं जैसे किसी निर्धन को ख़ज़ाना मिल गया हो। वे प्रणाम करते हैं, और वह पुरुष अग्नि में अंतर्धान हो जाता है।
राजा प्रसन्नता से भरे अंतःपुर में जाते हैं। आधी खीर कौसल्या जी को देते हैं। बची हुई का आधा सुमित्रा जी को। जो बचा उसका आधा कैकेयी जी को, और फिर कुछ सोचकर आख़िरी भाग फिर से सुमित्रा जी को दे देते हैं। इसे याद रखिए। सुमित्रा जी को दो भाग मिले।
*[ठहराव]*
समय बीतता है, और बारहवें महीने में, **चैत्र** मास की शुक्ल नवमी को, **पुनर्वसु** नक्षत्र में, कौसल्या जी एक पुत्र को जन्म देती हैं। ग्रंथ कहता है कि बालक में महानता के सब लक्षण हैं, और उसके साथ माता ऐसे शोभित हैं जैसे इंद्र के साथ अदिति। यही हैं **राम**। इसी दिन को आज भी पूरे भारत में परिवार **रामनवमी** के रूप में मनाते हैं।
उनके बाद कैकेयी जी से **भरत** का जन्म होता है। और सुमित्रा जी, जिन्हें दो भाग मिले थे, जुड़वाँ पुत्रों को जन्म देती हैं, **लक्ष्मण** और **शत्रुघ्न**।
अयोध्या खुशी से झूम उठती है। गलियों में लोग गाते-नाचते हैं, दान दिए जाते हैं, पूरी नगरी संगीत से भर जाती है। ग्यारहवें दिन वसिष्ठ जी नामकरण संस्कार करते हैं और चारों बालकों को उनके नाम देते हैं।
*[ठहराव]*
फिर वाल्मीकि जी इन बच्चों के बारे में एक छोटी-सी, बहुत मानवीय बात बताते हैं, और आगे की पूरी कथा के लिए यह बात बहुत मायने रखती है।
चारों भाई विद्वान, वीर और दयालु होते हैं, पर राम सबकी आँखों के तारे हैं, ख़ासकर पिता के। और लक्ष्मण, बचपन से ही, राम के बिना रह ही नहीं पाते। ग्रंथ कहता है कि लक्ष्मण पास न हों तो राम को नींद नहीं आती थी, और लक्ष्मण न खाएँ तो राम भोजन नहीं करते थे। राम घोड़े पर निकलते, तो लक्ष्मण धनुष लिए पीछे-पीछे चलते, उनकी रक्षा करते। लक्ष्मण मानो राम के ही दूसरे प्राण थे, जो शरीर से बाहर साँस ले रहे हों।
इसी तरह शत्रुघ्न भरत से जुड़े हैं। तो चारों भाई दो जोड़ियों में बड़े होते हैं, हर भाई को कोई दूसरा भाई सीने से लगाए हुए।
आगे जब आप सुनेंगे कि लक्ष्मण सब कुछ छोड़कर राम के साथ वन चल पड़ते हैं, या शत्रुघ्न हर पल भरत के साथ रहते हैं, तो इन दो नन्हे बच्चों को याद कीजिएगा, जो एक-दूसरे के बिना सोते नहीं थे।
*[ठहराव]*
तो आज हमने क्या सुना।
सरयू किनारे की अयोध्या सुखी और सुव्यवस्थित नगरी थी, पर राजा दशरथ निःसंतान थे और पुत्र के लिए तरसते थे। ऋषि ऋष्यशृंग ने यज्ञ कराया, और अग्नि से एक तेजस्वी पुरुष खीर का पात्र लेकर निकला, जिसे राजा ने अपनी तीनों रानियों में बाँटा। कौसल्या जी से राम, कैकेयी जी से भरत, और सुमित्रा जी से लक्ष्मण और शत्रुघ्न जन्मे, और चारों भाई दो प्यारी जोड़ियों में बड़े हुए।
**आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए।** दशरथ जी ने वह प्रसाद किसी एक रानी के लिए नहीं रखा। उन्होंने बाँटा, फिर सोचा, और फिर बाँटा, ताकि कोई छूट न जाए। अगली बार जब आपके घर कुछ अच्छा आए, कोई मिठाई, कोई ख़ुशख़बरी, थोड़ा-सा ख़ाली समय, तो उसे रोज़ से एक कदम आगे तक बाँटिए। देखिए, वह और किस तक पहुँच सकता है।
अगली बैठक में एक महान ऋषि राजमहल के द्वार पर आते हैं, और राजा से वही माँग लेते हैं जो देना राजा के लिए सबसे कठिन है।
*[घंटी। 2 सेकंड मौन।]*
**श्रेय (पढ़कर सुनाएँ):** वाल्मीकि रामायण, बालकांड के संस्कृत पाठ के आधार पर DharmikStudio टीम द्वारा लिखित। AI स्वर में वाचन। कोई भूल हो तो इस एपिसोड पर "गलती बताएँ" का उपयोग करें।