द्वार पर आए महर्षि

Episode 3 of 20 in रामायण: वाल्मीकि की कथा.

Narrated with an AI voice.

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नमस्कार। फिर से स्वागत है। पिछली बार अयोध्या में चार नन्हे बालक जन्मे थे, और हमने देखा कि राम पास न हों तो लक्ष्मण को नींद नहीं आती थी। अब बालक बड़े हो गए हैं। राम अभी सोलह बरस के भी नहीं हुए।

एक साँस साथ में। भीतर। और बाहर।

*[ठहराव]*

एक दिन राजा दशरथ अपने मंत्रियों के साथ बैठे यह विचार कर रहे हैं कि पुत्रों के विवाह कहाँ हों, तभी द्वारपाल दौड़ते हुए आते हैं। महर्षि **विश्वामित्र** द्वार पर खड़े हैं।

विश्वामित्र जी का बड़ा नाम है। वे कभी राजा थे, और लंबी, कठोर तपस्या से ब्रह्मर्षि बने। लोग उनका आदर भी करते हैं और उनके क्रोध से थोड़ा डरते भी हैं।

दशरथ जी पुरोहितों के साथ स्वयं द्वार तक जाते हैं, चरण छूते हैं, अर्घ्य और आसन देते हैं, और भरे मन से कहते हैं, आपका आना ऐसा है जैसे सूखी धरती पर वर्षा। बताइए, आप क्या चाहते हैं। जो भी हो, मैं करूँगा।

यह बहुत बड़ा वचन है। और विश्वामित्र जी उन्हें उसी वचन पर पकड़ लेते हैं।

वे कहते हैं, राजन, मैं एक यज्ञ कर रहा हूँ। जब-जब वह पूरा होने को होता है, दो बलवान राक्षस, **मारीच** और **सुबाहु**, आकर उसे भंग कर देते हैं। मैं उन्हें शाप नहीं दे सकता, क्योंकि क्रोध करने से मेरा व्रत टूट जाएगा। अपने बड़े पुत्र राम को दस दिन के लिए मुझे दे दीजिए। वे यज्ञ की रक्षा करेंगे। उन्हें बालक मत समझिए। मैं जानता हूँ वे कौन हैं। वसिष्ठ जी भी जानते हैं।

*[ठहराव]*

दशरथ जी का चेहरा पीला पड़ जाता है। कुछ पल वे बोल ही नहीं पाते। फिर एक पिता के मन की बात बह निकलती है।

वे कहते हैं, मेरा राम अभी सोलह का भी नहीं हुआ। उसने कभी युद्ध देखा नहीं। मेरी सेना ले जाइए। मुझे ले चलिए। मैं धनुष लेकर चलूँगा। मेरी आयु साठ हज़ार बरस की है, और यह पुत्र मुझे बड़े कष्ट से मिला है, उसे कैसे भेज दूँ? कृपा करके राम को मत ले जाइए।

विश्वामित्र जी की आँखें चमक उठती हैं। वे कहते हैं, आपने वचन दिया, और अब पीछे हट रहे हैं। यह रघुकुल को शोभा नहीं देता। अगर आप इसी में प्रसन्न हैं, तो मैं जैसे आया था, वैसे ही लौट जाता हूँ।

उनके क्रोध से मानो धरती काँप उठती है। तब धीरे से **वसिष्ठ** जी बोलते हैं। वे कुलगुरु हैं, और दोनों को अच्छी तरह जानते हैं।

वे राजा से कहते हैं, आप इक्ष्वाकु वंश में जन्मे हैं। आप अपने वचन के पक्के राजा के रूप में जाने जाते हैं। उसे अब मत तोड़िए। और सुनिए, विश्वामित्र जी के साथ राम पूरी तरह सुरक्षित रहेंगे, कहीं और से ज़्यादा सुरक्षित। ये महर्षि हर दिव्य अस्त्र जानते हैं। इन्हें अपने बल के लिए राम की ज़रूरत नहीं। ये राम के भले के लिए उन्हें माँग रहे हैं।

दशरथ जी सुनते हैं। मन शांत होता है। वे राम को बुलाते हैं, साथ में लक्ष्मण को भी। माताएँ आशीर्वाद देती हैं, वसिष्ठ जी मंगल-पाठ करते हैं, और दोनों भाई महर्षि के पीछे-पीछे चल पड़ते हैं।

मुझे लगता है, हर माता-पिता इस पल को जानते हैं। मन करता है बच्चे को सीने से लगाए रखें। पर कभी कोई समझदार आवाज़ कहती है, इसे इस गुरु के साथ जाने दो, इसी में इसका भला है।

*[ठहराव]*

वे सरयू के दक्षिणी तट पर बहुत दूर तक चलते हैं। राम महर्षि के पास-पास, लक्ष्मण धनुष लिए पीछे। ग्रंथ कहता है कि वे ऐसे लग रहे थे जैसे ब्रह्मा जी के पीछे दो तेजस्वी कुमार चल रहे हों।

दिन भर चलने के बाद विश्वामित्र जी नदी किनारे रुकते हैं और राम से कहते हैं, वत्स, आचमन कर लो। मैं तुम्हें दो विद्याएँ देना चाहता हूँ, **बला** और **अतिबला**। इनसे तुम्हें थकान नहीं होगी, भूख-प्यास नहीं सताएगी, और सोते हुए भी कोई तुम्हें असावधान नहीं पाएगा। राम जल का आचमन करते हैं, हाथ जोड़कर सुनते हैं, और विद्या ग्रहण करते हैं। उस रात महलों के कोमल बिस्तरों पर सोने वाले दोनों राजकुमार नदी किनारे घास पर सोते हैं, और संतोष से सोते हैं।

यहीं से उनकी असली शिक्षा शुरू होती है। कई दिनों तक महर्षि उनके साथ चलते हैं और रास्ते के हर स्थान की कथा सुनाते हैं। यह वह आश्रम है जहाँ कभी शिव जी ने तप किया था। यह वन कभी एक भरा-पूरा देश था। इस नदी का यह नाम ऐसे पड़ा। पूरी धरती एक ग्रंथ बन जाती है, और हर पहाड़ उसका एक पन्ना।

*[ठहराव]*

जब वे विश्वामित्र जी के आश्रम के पास के वन में पहुँचते हैं, तो उनका सामना उन संकटों में से पहले से होता है जिनकी बात महर्षि ने की थी। **ताटका** नाम की एक भयंकर राक्षसी, जिसने एक पूरे प्रदेश को उजाड़ दिया है। ग्रंथ कहता है कि राम पहले किसी स्त्री पर धनुष उठाना नहीं चाहते थे, और तभी आगे बढ़े जब विश्वामित्र जी ने समझाया कि प्रजा की रक्षा राजकुमार का पहला धर्म है। इससे ज़्यादा हम नहीं कहेंगे।

बालकों से प्रसन्न होकर विश्वामित्र जी राम को अनेक दिव्य अस्त्र देते हैं, और उन्हें लौटाने की विधि भी सिखाते हैं।

आश्रम में, जिसका नाम **सिद्धाश्रम** है, यज्ञ शुरू होता है। छह दिन और छह रात राम और लक्ष्मण बिना सोए पहरा देते हैं। आख़िरी दिन, जैसा महर्षि ने कहा था, मारीच और सुबाहु आते हैं। राम उन्हें लौटा देते हैं, और मारीच समुद्र के पार बहुत दूर जा गिरता है। मारीच को याद रखिएगा। वह हमारी कथा में फिर लौटेगा। यज्ञ शांति से पूरा होता है।

*[ठहराव]*

अब विश्वामित्र जी कहते हैं, **मिथिला** के राजा **जनक** एक बड़ा यज्ञ कर रहे हैं, और उनके पास एक अद्भुत धनुष है। चलो, वहाँ चलें।

रास्ते में, मिथिला के पास, उन्हें एक पुराना आश्रम मिलता है, शांत और सूना, पर अब भी सुंदर। राम पूछते हैं, यह किसका आश्रम था?

विश्वामित्र जी बताते हैं। यह महर्षि **गौतम** और उनकी पत्नी **अहल्या** का आश्रम था। बहुत पहले इंद्र गौतम का रूप धरकर यहाँ आए, और अहल्या एक भूल में खिंच गईं। गौतम ने क्रोध में कहा कि वे हज़ारों वर्षों तक यहीं रहेंगी, किसी को दिखाई नहीं देंगी, केवल वायु पर रहकर तप करेंगी, जब तक राम नहीं आते। राम के आने पर वे मुक्त होंगी।

तो राम और लक्ष्मण आश्रम में प्रवेश करते हैं। और वहाँ अहल्या जी प्रकट होती हैं, लंबे तप से दमकती हुई, जैसे धुएँ में छिपी लौ, जैसे बादलों के पीछे का चाँद। दोनों राजकुमार प्रणाम करते हैं, उनके चरण छूते हैं। अहल्या जी को गौतम जी की बात याद आती है, और वे पूरे आदर के साथ उन्हें अतिथि मानकर अर्घ्य, जल और फल देती हैं। आकाश से फूल बरसते हैं। और गौतम जी स्वयं लौटकर अपनी पत्नी को फिर से अपना लेते हैं।

यहाँ मैं एक कोमल बात की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूँ। वाल्मीकि में राम अहल्या जी को प्रणाम करते हैं। वे उनका न्याय नहीं करते। वे उनके चरण छूते हैं और उनका आतिथ्य स्वीकार करते हैं। आप में से बहुतों ने सुना होगा कि अहल्या पत्थर बन गई थीं, और राम के चरण छूते ही जी उठीं। यह सुंदर चित्र बाद की रामकथाओं से आता है, जैसे **अध्यात्म रामायण** और तुलसीदास जी का **रामचरितमानस**, और बहुत से परिवारों को यह बहुत प्रिय है। वाल्मीकि के अपने शब्दों में वे पत्थर नहीं थीं। वे एक स्त्री थीं जो अकेले तप में, संसार से ओझल होकर, प्रतीक्षा कर रही थीं, और राम आए और उनका सम्मान किया।

*[ठहराव]*

तो आज हमने क्या सुना।

विश्वामित्र जी ने यज्ञ की रक्षा के लिए दशरथ जी से राम को माँगा, और वसिष्ठ जी ने चिंतित पिता को हाँ कहने में सहायता की। सरयू के तट पर विश्वामित्र जी ने राम और लक्ष्मण को बला और अतिबला सिखाईं और रास्ते के हर स्थान की कथा सुनाई। गौतम ऋषि के आश्रम में राम ने अहल्या जी का सम्मान किया, जो बरसों से सबसे ओझल होकर रह रही थीं, और वे अपने पति से फिर मिल गईं।

**आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए।** अहल्या जी से मिलते ही राम ने सबसे पहले प्रणाम किया। उन्होंने यह नहीं पूछा कि क्या हुआ था। पहले आदर दिया। इस सप्ताह अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति से मिलें जिसके बारे में लोग बातें बनाते हैं, या जिससे लोग दूर रहते हैं, तो कुछ भी सोचने से पहले उन्हें आदर से नमस्कार कीजिए। आदर को पहले आने दीजिए।

अगली बैठक में हम मिथिला पहुँचेंगे, जहाँ एक राजा के पास ऐसा धनुष है जिसे कोई उठा नहीं पाता, और एक ऐसी पुत्री जो धरती की एक कूँड़ में मिली थी।

*[घंटी। 2 सेकंड मौन।]*

**श्रेय (पढ़कर सुनाएँ):** वाल्मीकि रामायण, बालकांड के संस्कृत पाठ के आधार पर DharmikStudio टीम द्वारा लिखित। AI स्वर में वाचन। कोई भूल हो तो इस एपिसोड पर "गलती बताएँ" का उपयोग करें।

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