वह सुबह जो बदल गई

Episode 5 of 20 in रामायण: वाल्मीकि की कथा.

Narrated with an AI voice.

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DharmikStudio Originals
Narration
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नमस्कार। फिर से स्वागत है। पिछली बार राम ने मिथिला में शिव का धनुष तोड़ा, और चारों भाई चार वधुओं के साथ अयोध्या लौटे। फिर भरत और शत्रुघ्न अपने ननिहाल केकय देश चले गए। आज हम ग्रंथ का दूसरा कांड खोलते हैं, **अयोध्याकांड**। और मैं अभी से कह दूँ, यह कांड बहुत कोमल भी है और बहुत कठिन भी।

मेरे साथ साँस लीजिए। भीतर। और बाहर।

*[ठहराव]*

बरस बीत गए हैं। **दशरथ** जी बूढ़े हो चले हैं। शरीर में थकान महसूस होती है, और सपनों में कुछ अशुभ संकेत भी दिखे हैं। वे सोचते हैं, जब तक मैं हूँ, अपने राम को **युवराज** के रूप में देख लूँ, वह राजकुमार जो राज-काज में हाथ बँटाए और एक दिन पूरा भार सँभाले।

यह निर्णय वे अकेले नहीं लेते। वे एक सभा बुलाते हैं। पड़ोसी राज्यों के राजा, नगर के बड़े-बुज़ुर्ग, व्यापारी, मंत्री, सब बड़े सभागार में इकट्ठा होते हैं। और दशरथ जी सीधी बात कहते हैं। मैंने बहुत समय तक आप पर राज किया है, और अब मैं थक गया हूँ। मैं राम को युवराज बनाना चाहता हूँ। पर आप बताइए, आप क्या सोचते हैं। अगर आपके पास इससे अच्छी सलाह हो, तो कहिए।

सभा एक स्वर में उत्तर देती है। हाँ। राम ही हों।

और फिर लोग राम का वर्णन करते हैं, और यह ग्रंथ के सबसे प्यारे अंशों में से एक है। वे कहते हैं, राम सत्यवादी हैं, कोमल हैं। किसी से मिलते हैं तो पहले स्वयं बोलते हैं, और मीठा बोलते हैं। कोई उनका एक छोटा-सा उपकार करे तो वे उसे हमेशा याद रखते हैं, और कोई सौ बार बुरा करे तो भूल जाते हैं। किसी नागरिक पर विपत्ति आए तो राम ऐसे दुखी होते हैं जैसे अपने ही परिवार पर आई हो। किसी के घर उत्सव हो, तो वे पिता की तरह प्रसन्न होते हैं।

सोचिए, जिन लोगों की आप सेवा करने वाले हैं, वे आपके बारे में ऐसा कहें।

*[ठहराव]*

दशरथ जी बहुत प्रसन्न होते हैं। वे वसिष्ठ जी से सारी तैयारी करने को कहते हैं, क्योंकि कल चंद्रमा **पुष्य** नक्षत्र में होगा, जो शुभ कार्यों के लिए अच्छा माना जाता है। वे राम को बुलाकर स्वयं यह बात बताते हैं। और धीरे से जोड़ते हैं, बेटा, यह काम जल्दी हो जाए। अच्छे लोगों का मन भी बदल सकता है। भरत बाहर है, वह बहुत अच्छा और प्रेम करने वाला भाई है, पर यह काम सही समय रहते हो जाए।

राम पिता के चरण छूते हैं और अपनी माता **कौसल्या** जी के पास जाते हैं, जो पूजा-घर में प्रार्थना कर रही हैं। लक्ष्मण और सीता जी भी वहीं हैं। कौसल्या जी की आँखों से खुशी के आँसू बहते हैं। उस रात वसिष्ठ जी की सलाह पर राम और सीता जी व्रत रखते हैं, और विष्णु भगवान के पूजा-कक्ष में कुश की शय्या पर सोते हैं, अगले दिन के लिए मन को तैयार करते हुए।

बाहर नगरी सोती नहीं। लोग सड़कें धोते हैं, पताकाएँ और मालाएँ टाँगते हैं, दीपक जलाते हैं। हर कोई कल की ही बात कर रहा है।

*[ठहराव]*

अब रानी कैकेयी के महल में एक पुरानी दासी रहती है, **मंथरा**। वह बहुत पहले कैकेयी जी के साथ उनके मायके से आई थी, और जीवन भर उनकी देखभाल करती आई है। उस शाम मंथरा छत पर चढ़ती है और दीपक, पताकाएँ देखती है। वह एक धाय से पूछती है, यह सब क्या हो रहा है? और उसे पता चलता है, कल राम युवराज बनेंगे।

मंथरा सीधे कैकेयी जी के पास जाती है, जो आराम कर रही हैं। कहती है, उठो, तुम पर बड़ा संकट आने वाला है।

और यहाँ मैं चाहता हूँ कि आप एक बात पर ध्यान दें। कैकेयी जी की पहली प्रतिक्रिया खुशी है। सच्ची खुशी। वे अपना एक सुंदर आभूषण उतारकर मंथरा को इस शुभ समाचार के लिए उपहार में दे देती हैं। कहती हैं, मेरे लिए राम और भरत में कोई अंतर नहीं। राम तो अपनी माँ से भी ज़्यादा मेरा आदर करते हैं।

वाल्मीकि जी चाहते हैं कि हम देखें, कैकेयी जी कठोर स्वभाव की नहीं थीं। वे राम से प्रेम करती थीं।

*[ठहराव]*

पर मंथरा वह आभूषण नीचे फेंक देती है। और बोलना शुरू करती है। भविष्य की बातें। वह कहती है, राम राजा बनेंगे तो कौसल्या राजमाता होंगी, और तुम उनके सामने दासी की तरह हाथ जोड़े खड़ी रहोगी। और भरत का क्या? वह कहाँ होगा? अगर नया राजा उसे अपना प्रतिद्वंद्वी समझे तो? क्या तुम्हारा बेटा सुरक्षित रहेगा?

वह देर तक बोलती रहती है, और धीरे-धीरे कैकेयी जी के मन में डर बैठ जाता है। अपने लिए डर, और अपने बेटे के लिए डर। और डर, यह तो हम सब जानते हैं, एक प्रेम करने वाले इंसान से भी वह करवा सकता है जो वह वैसे कभी न करे।

बाद की कथाएँ, जैसे तुलसीदास जी का रामचरितमानस, बताती हैं कि देवताओं ने देवी **सरस्वती** को भेजा था ताकि मंथरा की मति फिर जाए और धरती पर राम का उद्देश्य पूरा हो सके। बहुत से परिवार यही सुनते आए हैं, और इससे दोनों स्त्रियों पर दोष कुछ हल्का हो जाता है। वाल्मीकि में यह बदलाव डर से और मंथरा की बातों से आता है।

*[ठहराव]*

फिर मंथरा उन्हें एक बात याद दिलाती है। बहुत पहले, वह कहती है, जब दशरथ जी असुर **शंबर** के विरुद्ध देवताओं की सहायता करने गए थे, तुम उनके साथ गई थीं। युद्ध में वे घायल हुए, और तुम उन्हें रणभूमि से दूर ले गईं और उनके प्राण बचाए। वे इतने कृतज्ञ हुए कि उन्होंने तुम्हें दो वर दिए। तुमने कहा था, बाद में माँगूँगी। अब माँग लो।

माँगो कि भरत का राज्याभिषेक हो। और माँगो कि राम चौदह वर्ष के लिए वन जाएँ। चौदह वर्षों में भरत की जगह पक्की हो जाएगी।

कैकेयी जी सुनती हैं। वे अपने आभूषण उतार देती हैं, बाल खोल देती हैं, एक पुराना वस्त्र पहन लेती हैं, और **कोप-भवन** के नंगे फ़र्श पर लेट जाती हैं, वह कक्ष जहाँ रानी रूठने पर जाती है।

*[ठहराव]*

उस शाम दशरथ जी खुशी से भरे, यह समाचार बाँटने कैकेयी जी के महल आते हैं। वे उन्हें उनके कक्ष में नहीं पाते। उन्हें बताया जाता है कि रानी कहाँ हैं। भीतर जाकर वे उन्हें धरती पर पड़ा देखते हैं, और घबरा जाते हैं। पास बैठकर उनके बालों पर हाथ फेरते हैं और कहते हैं, किसने तुम्हें दुख दिया? बताओ, तुम्हें क्या चाहिए। मैं राम की शपथ खाता हूँ, जिन्हें मैं अपने प्राणों से भी ज़्यादा चाहता हूँ, मैं वह करूँगा।

और कैकेयी जी कहती हैं, तो उन दो वरों को याद कीजिए। राम के लिए जो तैयारी हुई है, उसी से भरत का राज्याभिषेक कीजिए। और राम को चौदह वर्ष के लिए **दंडक** वन भेजिए, तपस्वी की तरह, वल्कल और मृगछाला पहनकर।

दशरथ जी को विश्वास नहीं होता। वे धरती पर गिर पड़ते हैं। पूरी रात वे विनती करते रहते हैं। उन्हें राम के प्रति उनका प्रेम याद दिलाते हैं। गिड़गिड़ाते हैं। ग्रंथ कहता है कि उन्होंने कैकेयी जी के पैर तक पकड़ लिए। पर कैकेयी जी अपनी माँग से नहीं हटतीं। जो रात उनके जीवन की सबसे सुखद रात होनी थी, वह सबसे लंबी रात बन जाती है।

*[ठहराव]*

और फिर सुबह होती है। वसिष्ठ जी राज्याभिषेक की सारी सामग्री लेकर आते हैं। सुमंत्र राजा को जगाने भीतर जाते हैं। और मौन पड़े राजा की ओर से कैकेयी जी सुमंत्र से कहती हैं, जाओ, राम को यहाँ ले आओ।

तो आज हमने क्या सुना।

वृद्ध होते दशरथ जी ने अपनी सभा और प्रजा से पूछा कि क्या राम को युवराज बनाया जाए, और सब आनंद से सहमत हुए। कैकेयी जी की पुरानी दासी मंथरा ने उनकी पहली खुशी को अपने और भरत के भविष्य के डर में बदल दिया। और कैकेयी जी ने वे दो वर माँगे जो दशरथ जी ने कभी उन्हें दिए थे: भरत का राज्याभिषेक, और राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास।

**आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए।** कैकेयी जी का पहला भाव राम के लिए खुशी था। उन्हें किसी दूसरी आवाज़ से मिले डर ने बदल दिया। इस सप्ताह जब आपको लगे कि डर आपको किसी कठोर निर्णय की ओर धकेल रहा है, तो एक रात रुक जाइए। सोइए, किसी ऐसे व्यक्ति से बात कीजिए जो सब से प्रेम करता हो, और फिर निर्णय लीजिए।

अगली बैठक में राम को पिता के कक्ष में बुलाया जाता है, और हम देखेंगे कि कोई व्यक्ति अपने जीवन की सबसे कठिन ख़बर का सामना कैसे करता है।

*[घंटी। 2 सेकंड मौन।]*

**श्रेय (पढ़कर सुनाएँ):** वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकांड के संस्कृत पाठ के आधार पर DharmikStudio टीम द्वारा लिखित। AI स्वर में वाचन। कोई भूल हो तो इस एपिसोड पर "गलती बताएँ" का उपयोग करें।

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