मुस्कराते हुए वन की ओर

Episode 6 of 20 in रामायण: वाल्मीकि की कथा.

Narrated with an AI voice.

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Narration
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नमस्कार। आइए, फिर से साथ बैठते हैं।

पिछली बार हम अयोध्या की एक लंबी और भारी रात में ठहरे थे। राजा दशरथ ने बहुत पहले रानी कैकेयी को दो वर दिए थे, और उस रात उन्होंने वे वर माँग लिए। पहला, भरत का राजतिलक हो। दूसरा, राम चौदह वर्ष वन में रहें। बूढ़े राजा सुबह तक कैकेयी के कक्ष में धरती पर पड़े रहे, कुछ बोल न सके।

आज सूरज एक ऐसी नगरी पर उगता है जो अब भी समझ रही है कि आज उत्सव का दिन है।

*[ठहराव]*

अयोध्या की गलियाँ धोई गई थीं, पानी का छिड़काव हुआ था। हर तरफ़ झंडियाँ लहरा रही थीं। लोग छतों पर खड़े थे कि राजकुमार की सवारी देख सकें। मंत्री **सुमंत्र** राम को बुलाने आए, और राम तुरंत चल दिए। उन्हें लगा, पिताजी तिलक से पहले आशीर्वाद देना चाहते होंगे।

वहाँ पहुँचे तो देखा, पिता कैकेयी के पास बैठे हैं, चेहरा पीला, होंठ चुप। दशरथ बस एक शब्द बोल पाए, "राम," और आगे कुछ न कह सके। तब कैकेयी ने बात कही। दोनों वरों की बात, और उनमें क्या माँगा गया है।

अब यहाँ वाल्मीकि जो कहते हैं, उसे ध्यान से सुनिए, क्योंकि पूरी कथा इसी बात पर टिकी है।

राम को क्रोध नहीं आया। उन्होंने बहस नहीं की। वाल्मीकि कहते हैं, उनके चेहरे का भाव ज़रा भी नहीं बदला, जैसे घटते हुए चंद्रमा की सुंदरता भी कम नहीं होती। राम ने कैकेयी से कहा, "ऐसा ही हो माँ। मैं वन जाऊँगा। दुख बस इतना है कि पिताजी ने यह बात मुझसे स्वयं नहीं कही। वे एक बार कहते, तो भरत के लिए मैं खुशी से चला जाता।"

उन्होंने पिता को प्रणाम किया, कैकेयी को प्रणाम किया, और महल से बाहर आ गए। बाहर आते समय उनके सिर पर राजछत्र लगाया गया। राम ने धीरे से कहा, इसे हटा दीजिए।

*[ठहराव]*

फिर वे अपनी माँ के पास गए।

माता **कौशल्या** पूरी रात बेटे के राजतिलक के लिए पूजा करती रही थीं। जब उन्होंने बेटे का चेहरा देखा और बात सुनी, तो वे ऐसे धरती पर गिर पड़ीं जैसे जड़ से कटा पेड़ गिरता है। राम ने उन्हें उठाया। माँ ने विनती की, मत जाओ। उन्होंने कहा, तुम्हारे बिना मैं जी नहीं पाऊँगी।

और फिर थे **लक्ष्मण**। वे वहीं खड़े थे, और क्रोध से भरे हुए थे। उन्होंने कहा, बुढ़ापे में महाराज की बुद्धि फिर गई है। उन्होंने कहा, मैं धनुष लेकर आपके साथ खड़ा हूँ, देखता हूँ कौन आपसे राज्य लेता है।

राम ने आवाज़ ऊँची नहीं की। उन्होंने भाई का हाथ पकड़ा और धीरे-धीरे समझाया। "लक्ष्मण, इसमें न माता कैकेयी का दोष है, न पिताजी का। हमारे जीवन को कोई बड़ी शक्ति चलाती है। आज अगर मैं पिता का वचन टाल दूँ, तो मेरे अपने वचन का क्या मोल रह जाएगा? जिस प्रजा का मुझे राजा बनना था, उसे मैं क्या सिखाऊँगा?" लक्ष्मण सुनते रहे। उनका क्रोध पूरी तरह गया नहीं, पर उन्होंने उसे नीचे रख दिया, जैसे कोई भारी बोझ उतार देता है।

आख़िर कौशल्या ने भी आशीर्वाद दिया। बेटे की कलाई पर रक्षासूत्र बाँधा और प्रार्थना की कि हर दिशा उसकी रक्षा करे।

*[ठहराव]*

अब राम उनके पास गए जिन्हें अभी तक कुछ नहीं बताया था। **सीता**।

उन्होंने सीता को समझाने की कोशिश की। कहा, वन का जीवन कठिन है। काँटे हैं, ठंडी रातें हैं, जंगली जानवर हैं। सोने को धरती के सिवा कुछ नहीं। तुम अयोध्या में रहो, माता-पिता की सेवा करो, भरत से स्नेह रखना।

सीता ने सब सुना, फिर बोलीं। और वाल्मीकि ने उन्हें अयोध्या काण्ड के सबसे मार्मिक वचन दिए हैं। सीता ने कहा, "पिता, माता, पुत्र, सखा, सब अपने-अपने भाग्य का फल भोगते हैं। पर पत्नी अपने पति के भाग्य में सहभागी होती है। अगर आप आज वन जा रहे हैं, तो मैं आपके आगे-आगे चलूँगी और रास्ते के काँटे हटाती जाऊँगी।" उन्होंने कहा, आपके साथ वन मुझे आपके बिना महल से ज़्यादा प्यारा होगा। मैं आप पर बोझ नहीं बनूँगी। और जब राम फिर भी झिझके, तो सीता ने उन्हें लगभग डाँटते हुए कड़े शब्द कहे, और फिर रो पड़ीं।

राम ने उन्हें सँभाला और कहा, "मैं तुम्हारा मन पूरा नहीं जानता था। चलो, हम साथ चलेंगे।"

और लक्ष्मण तो पीछे रहने वाले थे ही नहीं।

*[ठहराव]*

जाने से पहले राम ने अपना सब कुछ दान कर दिया। यहाँ वाल्मीकि एक छोटी-सी कथा सुनाते हैं जो मुझे बहुत प्यारी लगती है। **त्रिजट** नाम के एक बूढ़े, ग़रीब ब्राह्मण सहायता माँगने आए। राम मुस्कराए और बोले, "अपना डंडा जितनी दूर फेंक सकें, फेंकिए। जहाँ तक वह गिरेगा, वहाँ तक की सारी गायें आपकी।" बूढ़े ब्राह्मण ने धोती कसी, डंडा घुमाया और पूरी ताक़त से फेंका। डंडा सरयू के पार जाकर हज़ारों गायों के बीच गिरा। राम हँसे, उन्हें गले लगाया और बोले, "बुरा मत मानिए, मैं तो बस आपका बल देखना चाहता था।"

सोचिए, जीवन के सबसे दुख भरे दिन भी राम के पास एक बूढ़े आदमी के साथ हँसने का समय था।

फिर वल्कल वस्त्र आए, पेड़ की छाल के कपड़े जो वनवासी पहनते हैं। राम और लक्ष्मण ने पहन लिए। सीता हाथ में वल्कल लिए खड़ी रहीं, समझ न पाईं कि कैसे पहनें। यह देखकर सभा दुखी हो गई। कुलगुरु **वसिष्ठ** ने दृढ़ स्वर में कहा, सीता को वनवास नहीं मिला है, उन्हें तपस्विनी के कपड़े पहनाने की कोई ज़रूरत नहीं। और दशरथ ने आदेश दिया कि सीता को चौदह वर्षों के लिए अच्छे वस्त्र और आभूषण दिए जाएँ।

*[ठहराव]*

लक्ष्मण अपनी माँ **सुमित्रा** से विदा लेने गए। और सुमित्रा ने उनसे वे शब्द कहे जो भारत के घरों में सदियों से दोहराए जाते हैं।

**रामं दशरथं विद्धि मां विद्धि जनकात्मजाम्। अयोध्यामटवीं विद्धि गच्छ तात यथासुखम्॥** *rāmaṃ daśarathaṃ viddhi māṃ viddhi janakātmajām | ayodhyām aṭavīṃ viddhi gaccha tāta yathāsukham ||*

"राम को अपने पिता दशरथ समझना। जनक की बेटी को मुझ जैसी माँ समझना। और वन को अयोध्या समझना। जाओ बेटा, सुख से जाओ।"

*[ठहराव]*

रथ चल पड़ा, लगाम सुमंत्र के हाथ में थी। अयोध्या के लोग पीछे-पीछे दौड़े। दशरथ नंगे पैर महल से बाहर आए और तब तक चलते रहे जब तक धूल ने रथ को आँखों से ओझल नहीं कर दिया।

बहुत से नगरवासी लौटे ही नहीं। वे राम के साथ **तमसा** नदी तक चले आए और उस रात उसके किनारे सो गए। राम उनसे प्रेम करते थे, पर जानते थे कि ये लोग वन में नहीं रह सकते। इसलिए भोर होने से पहले, जब सब सो रहे थे, उन्होंने सुमंत्र से धीरे से कहा कि रथ आगे बढ़ाओ, और इस तरह घुमाओ कि लोग दिशा न पहचान सकें। लोग जागे तो समझ न पाए कि राम किधर गए, और रोते हुए घर लौट गए।

रथ कई नदियाँ और गाँव पार करता हुआ गंगा किनारे **शृंगवेरपुर** पहुँचा। यहाँ **निषादराज गुह** रहते थे, नदी और वन के लोगों के राजा। गुह राम के मित्र थे। वे भोजन और भेंट लेकर आए और बोले, "यह राज्य आपका है, यहीं रहिए।" राम ने उन्हें गले लगाया और कहा, मैंने वनवासी की तरह रहने का व्रत लिया है, इसलिए घोड़ों के लिए थोड़ा पानी और घास के सिवा कुछ नहीं ले सकता।

उस रात राम और सीता एक पेड़ के नीचे घास के बिछौने पर सोए। गुह और लक्ष्मण जागते रहे, आग के पास बैठकर पहरा देते रहे और धीमे-धीमे अयोध्या की बातें करते रहे। लक्ष्मण ने कहा, "जब मेरे भैया धरती पर सो रहे हैं, तो मैं कैसे सो जाऊँ?"

सुबह राम ने सुमंत्र को अयोध्या लौटा दिया, पिता और माताओं के लिए प्रेम भरे संदेश देकर। फिर गुह नाव ले आए, और तीनों ने **गंगा** पार की। नदी के बीच में सीता ने हाथ जोड़कर गंगा माँ से प्रार्थना की कि चौदह वर्ष बाद हमें सकुशल घर लौटा देना।

बाद की एक बहुत प्यारी कथा, गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस में, केवट राम के पाँव धोए बिना उन्हें नाव में चढ़ने नहीं देता। यह प्रसंग वाल्मीकि में नहीं है, पर बहुत से परिवार इसी तरह इस गंगा-पार को याद करते हैं, और यह मीठी कथा सहेजने लायक है।

*[ठहराव]*

**आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए।** राम ने एक सुबह में राज्य खो दिया, फिर भी एक बूढ़े ब्राह्मण के साथ हँसने और माँ को ढाढ़स बँधाने का समय निकाला। अगली बार जब आपसे कुछ छिन जाए, तो देखिए आपके पास कौन खड़ा है, और सबसे पहले उनसे प्रेम से बात कीजिए।

अगले एपिसोड में हम ऋषि भरद्वाज के आश्रम और चित्रकूट पर्वत तक चलेंगे। और लौटेंगे अयोध्या, जहाँ एक पिता का हृदय अब और नहीं सँभल पाता।

*[घंटी। 2 सेकंड मौन।]*

**श्रेय (पढ़कर सुनाएँ):** वाल्मीकि रामायण, अयोध्या काण्ड के आधार पर, और तुलसीदास के रामचरितमानस के एक उल्लेख के साथ, DharmikStudio टीम द्वारा लिखित। AI स्वर में वाचन। कोई भूल हो तो इस एपिसोड पर "गलती बताएँ" का उपयोग करें।

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