चित्रकूट और एक पिता का दुख

Episode 7 of 20 in रामायण: वाल्मीकि की कथा.

Narrated with an AI voice.

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नमस्कार। आइए, फिर साथ बैठते हैं।

पिछली बार राम ने सुना कि उन्हें अयोध्या छोड़नी है, और वे बिना एक शिकायत के चल पड़े। सीता और लक्ष्मण उनके साथ चले। निषादराज गुह ने उन्हें आसरा दिया, और तीनों ने गंगा पार की। अब पहली बार वे सचमुच अकेले हैं।

*[ठहराव]*

गंगा के उस पार से जंगल शुरू होता था। लक्ष्मण आगे चलते, सीता बीच में, और राम पीछे, ताकि सीता दोनों तरफ़ से सुरक्षित रहें। पहली रात वे एक बड़े पेड़ के नीचे सोए। राम, जो कभी महल के बाहर नहीं सोए थे, देर रात तक भाई से बातें करते रहे। पिता की चिंता, माँ की चिंता। उन्होंने कहा, "लक्ष्मण, कल तुम लौट जाओ। वहाँ किसी को उनका ध्यान रखना होगा।" लक्ष्मण बोले, "आपके बिना तो मुझे स्वर्ग में भी सुख नहीं मिलेगा।" राम ने फिर दोबारा नहीं कहा।

अगले दिन वे उस जगह की ओर चले जहाँ गंगा और **यमुना** मिलती हैं। उसे हम आज **प्रयाग** कहते हैं। दूर से उन्हें यज्ञ की अग्नि का धुआँ उठता दिखा, और राम ने कहा, "लगता है वहाँ कोई ऋषि रहते हैं।"

वह महर्षि **भरद्वाज** का आश्रम था। उन्होंने तीनों का जल, फल और कंद-मूल से स्वागत किया, विश्राम की जगह दी। वे जानते थे राम कौन हैं और क्यों आए हैं। बोले, "यहीं मेरे पास रहो। यह पवित्र स्थान है, यहाँ तुम सुरक्षित रहोगे।"

राम ने आभार जताया, पर कहा, "यह स्थान अयोध्या के बहुत पास है, मुनिवर। लोग हमें ढूँढते हुए आ जाएँगे, और मैं शांति से अपना व्रत नहीं निभा पाऊँगा। हमें कोई दूर का शांत स्थान बताइए।"

तब भरद्वाज ने उन्हें **चित्रकूट** के बारे में बताया। ऐसे बताया जैसे कोई अपनी प्यारी जगह के बारे में बताता है। पेड़ों से ढकी पहाड़ी, शहद और फलों से भरी। मोरों की पुकार। ढलानों से बहते झरने। बहुत से ऋषि वहाँ रह चुके थे। उन्होंने कहा, उसके शिखरों को जो देखता है, उसका मन अपने आप अच्छी बातों की ओर मुड़ जाता है।

*[ठहराव]*

चित्रकूट पहुँचने के लिए यमुना पार करनी थी। यहाँ न गुह थे, न नाव। तो दोनों भाइयों ने बाँस और सूखी लकड़ी इकट्ठी की और बेलों से बाँधकर बेड़ा बनाया। लक्ष्मण ने पत्तों और टहनियों से सीता के लिए उस पर नरम आसन बनाया। नदी के बीच में सीता ने, जैसे गंगा पर किया था, हाथ जोड़कर यमुना से सकुशल लौटने की प्रार्थना की।

उस पार उन्हें वह बड़ा बरगद मिला जिसके बारे में भरद्वाज ने बताया था। सीता ने उसे भी प्रणाम किया। आगे चलते हुए सीता किसी अनजाने फूल या बेल की ओर इशारा करतीं, और राम उसे तोड़कर उन्हें दे देते। वाल्मीकि यहाँ कथा को धीमा कर देते हैं। वे हमें एक पति-पत्नी दिखाते हैं जिन्होंने सब कुछ खो दिया है, और फिर भी वसंत के जंगल में छोटी-छोटी चीज़ों पर खुश हो रहे हैं।

*[ठहराव]*

चित्रकूट में वे **मंदाकिनी** नदी के किनारे पहुँचे। साफ़ पानी, रेतीले तट। वहीं राम ने एक जगह चुनी। लक्ष्मण ने लकड़ी काटी और डालियों-पत्तों से एक कुटिया बनाई, **पर्णशाला**, जो हवा और बारिश रोक सके। उसमें रहने से पहले राम ने नए घर के लिए एक सरल पूजा की, जैसे आज भी परिवार नए घर में जाने से पहले करते हैं।

और कुछ समय वे सचमुच सुखी रहे। सुबह की धूप में राम सीता को पहाड़ की चोटियाँ दिखाते। वे मंदाकिनी में स्नान करते। राम ने एक बार सीता से कहा, तुम्हारे और भाई के साथ यहाँ रहते हुए मुझे राज्य की ज़रा भी याद नहीं आती।

ज़रा उस दृश्य की कल्पना कीजिए। सुबह-सुबह मंदाकिनी के घाट पर ऋषि स्नान कर रहे हैं, सूर्य को जल चढ़ा रहे हैं। थोड़ी दूर हिरण पानी पी रहे हैं और मनुष्यों से डरते नहीं। किनारे पर फूलों से लदे पेड़ झुके हुए हैं। राम सीता से कहते हैं, देखो, यह नदी कितनी शांत बहती है, जैसे इसे कहीं पहुँचने की जल्दी नहीं। जिस व्यक्ति से कल उसका पूरा राज्य छिन गया था, वह आज एक नदी की चाल देखकर संतोष पा रहा है। यही राम का स्वभाव है। वे जो सामने है, उसी में रहना जानते हैं।

उन्हें वहीं, उसी शांति में छोड़कर, चलिए लौटते हैं अयोध्या।

*[ठहराव]*

सुमंत्र नदी किनारे तब तक रुके रहे जब तक राम आँखों से ओझल नहीं हो गए। फिर वे खाली रथ लेकर लौटे। नगर में घुसते ही लोग रथ के चारों ओर जमा हो गए, भीतर झाँकने लगे, और जब देखा कि रथ खाली है, तो रोते हुए मुँह फेर लिया।

सुमंत्र राजा के पास गए। दशरथ ने एक-एक बात पूछी। राम ने क्या कहा? सीता ने क्या कहा? वे कहाँ सोए? लक्ष्मण ने कोई संदेश भेजा? और हर उत्तर के साथ बूढ़े राजा और कमज़ोर होते गए।

कौशल्या भी दुख से टूट गई थीं, और उस पीड़ा में उन्होंने पति से कड़े शब्द कह दिए। कहा, आपने अपने ही बेटे को निकाल दिया। दशरथ ने पलटकर कुछ नहीं कहा। उन्होंने कौशल्या के आगे हाथ जोड़ दिए और क्षमा माँगी। अपने राजा को हाथ जोड़े देखकर कौशल्या को अपने शब्दों पर लज्जा आई। उन्होंने पति के हाथ थाम लिए और उनके साथ रो पड़ीं।

*[ठहराव]*

उस रात, अँधेरे में, दशरथ ने कौशल्या को वह बात बताई जो बरसों से उनके मन में दबी थी।

जब मैं युवा राजकुमार था, उन्होंने कहा, मुझे अपनी एक विद्या पर बड़ा गर्व था। मैं आवाज़ सुनकर बाण चला सकता था, लक्ष्य देखे बिना। एक रात, बरसात के दिनों में, मैं **सरयू** के किनारे गया। अँधेरे में मुझे एक आवाज़ सुनाई दी, जैसे कोई हाथी पानी पी रहा हो। मैंने उस ओर बाण छोड़ दिया।

वह हाथी नहीं था। वह एक युवा तपस्वी था, जो अपने बूढ़े, नेत्रहीन माता-पिता के लिए घड़े में पानी भर रहा था। बाण उसे लगा, और वह युवक बच न सका।

जाने से पहले उसने राजकुमार से बस एक बात माँगी: "यह पानी मेरे माता-पिता तक पहुँचा देना। वे प्यासे हैं, राह देख रहे हैं।"

दशरथ घड़ा लेकर जंगल में उन बूढ़े दंपति के पास गए। जब उन्होंने सारी बात सुनी, तो पिता के दुख भरे शब्द शाप बन गए। उन्होंने कहा, "तुम भी अपने बेटे के वियोग में ही यह संसार छोड़ोगे।"

वाल्मीकि उस युवक का नाम नहीं बताते। बाद की परंपरा में उसे **श्रवण कुमार** के नाम से याद किया जाता है, वह बेटा जो माता-पिता को काँवर में बिठाकर तीर्थ घुमाता था। हममें से बहुतों ने बचपन में यही कथा सुनी है। दोनों रूपों का मर्म एक ही है: एक बेटे की सेवा, और एक बूढ़े पिता का दुख।

*[ठहराव]*

दशरथ ने कौशल्या से कहा, "अब समझ आया। जो मैंने जवानी में किया, वह लौटकर मेरे पास आया है। मनुष्य को अपने कर्म का फल मिलता ही है, अच्छा हो या बुरा।"

उन्होंने राम को पुकारा। कहा, अब मुझे दिखाई नहीं देता। कहा, "राम एक बार मुझे छू ले, तो मैं जी उठूँ।" और उसी रात के बीच, अयोध्या के राजा ने बेटे का नाम होंठों पर लिए यह संसार छोड़ दिया। वाल्मीकि कहते हैं, राम के जाने के बाद यह छठी रात थी।

सुबह जो गायक और सेवक राजा को जगाने आए, उन्होंने पाया कि राजा अब नहीं जागेंगे। पूरा महल रुदन से भर गया।

ज्ञानी **वसिष्ठ** और मंत्री इकट्ठे हुए। अयोध्या में कोई राजा नहीं था, और जिन दो राजकुमारों का तिलक हो सकता था, वे दोनों दूर थे। राम वन में थे। भरत और शत्रुघ्न अपने नाना के घर, **केकय** देश में थे। तो वसिष्ठ ने तेज़ दूत केकय भेजे। उनसे कहा, जो हुआ है वह कुछ मत बताना। बस इतना कहना: "तुरंत घर लौटिए, एक ज़रूरी काम है।"

*[ठहराव]*

**आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए।** दशरथ ने अपनी एक पुरानी भूल लगभग पूरी उम्र चुपचाप ढोई। क्या आपके मन में भी कुछ ऐसा है? आज उसे ठीक करना ज़रूरी नहीं। बस एक बार उसे कह दीजिए, किसी भरोसे के व्यक्ति से, या प्रार्थना में भगवान से।

अगले एपिसोड में भरत घर लौटते हैं। और हम मिलेंगे एक ऐसे छोटे भाई से जिसका राम के प्रति प्रेम भारत में एक मिसाल बन गया है।

*[घंटी। 2 सेकंड मौन।]*

**श्रेय (पढ़कर सुनाएँ):** वाल्मीकि रामायण, अयोध्या काण्ड के आधार पर, और श्रवण कुमार की लोक परंपरा के उल्लेख के साथ, DharmikStudio टीम द्वारा लिखित। AI स्वर में वाचन। कोई भूल हो तो इस एपिसोड पर "गलती बताएँ" का उपयोग करें।

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