भरत का त्याग
Episode 8 of 20 in रामायण: वाल्मीकि की कथा.
Narrated with an AI voice.
- Reading time
- 9 min
- Listening time
- 9 min
- By
- DharmikStudio Originals
- Narration
- AI voice
Read along
नमस्कार। फिर से स्वागत है।
पिछली बार राम, सीता और लक्ष्मण ने चित्रकूट पर्वत पर पत्तों की कुटिया में घर बसाया। और अयोध्या में राजा दशरथ बेटे का नाम पुकारते हुए संसार से विदा हो गए। दूत केकय देश की ओर दौड़े, भरत को बुलाने, इस आदेश के साथ कि उन्हें कारण न बताया जाए।
*[ठहराव]*
जिस रात दूत पहुँचे, उस रात भरत ने एक बुरा सपना देखा। उन्होंने देखा कि पिताजी मैले कपड़ों में एक पहाड़ से गिरकर अँधेरे पानी में जा रहे हैं। वे बेचैन होकर जागे। मित्रों ने गाना-बजाना करके, हँसी-मज़ाक करके उनका मन बहलाना चाहा, पर मन नहीं लगा।
फिर दूत आए। उन्होंने बस इतना कहा, "तुरंत घर चलिए।" भरत ने नाना और मामा से विदा ली, और भाई **शत्रुघ्न** के साथ सात दिन घोड़े दौड़ाते रहे।
अयोध्या पास आई तो भरत का मन बैठ गया। नगर चुप था। न संगीत, न घरों से पूजा-पाठ की आवाज़, न गलियों में भीड़। जिन लोगों ने उन्हें देखा, उन्होंने मुँह फेर लिया।
वे सबसे पहले पिता के कक्ष में गए। पिता वहाँ नहीं थे। फिर माँ के महल गए। **कैकेयी** उन्हें देखकर खुश थीं। उन्होंने बताया कि महाराज अब नहीं रहे। भरत दुख से धरती पर गिर पड़े। जब कुछ सँभले, तो पूछा, "भैया राम कहाँ हैं? मैं उनके चरण छूना चाहता हूँ। अब वही मेरे पिता हैं।"
और तब कैकेयी ने सब बता दिया। राम वन चले गए हैं। मैंने यह सब तुम्हारे लिए किया है। राज्य अब तुम्हारा है।
*[ठहराव]*
भरत का दुख गहरी पीड़ा में बदल गया। उन्होंने बड़े दर्द के साथ माँ से बात की। कहा, आपने पूरे परिवार पर दुख ढा दिया। पिताजी आपकी माँग के शोक में चले गए। और आपने मेरे लिए जो जीता है, उसे मैं कभी स्वीकार नहीं करूँगा। वाल्मीकि यहाँ भरत के शब्दों को नरम नहीं करते। वे भीतर तक हिल गए थे।
फिर वे **कौशल्या** के पास गए। पहले वे भरत से रूखे ढंग से मिलीं। उन्हें लगा कि यह सब भरत की योजना थी। बोलीं, "तुम्हें राज्य चाहिए था न, अब मिल गया।"
भरत उनके चरणों में गिर पड़े और एक के बाद एक शपथ लेने लगे। कहा, अगर राम को वन भेजने में मेरा ज़रा भी हाथ हो, तो संसार में जितने पाप कभी हुए हैं, सब मेरे नाम लिखे जाएँ। कौशल्या सुनती रहीं, और उन्होंने भरत का मन पहचान लिया। उन्होंने भरत का सिर अपनी गोद में रख लिया और उनके साथ रो पड़ीं। उस क्षण के बाद उन्होंने भरत पर कभी संदेह नहीं किया।
इन्हीं दिनों एक और छोटा-सा प्रसंग आता है। शत्रुघ्न ने महल में **मंथरा** को देखा, वही दासी जिसकी बातों से यह सब शुरू हुआ था। शत्रुघ्न का क्रोध भड़क उठा और वे उसे कठोर दंड देने को आगे बढ़े। पर भरत ने उन्हें रोक दिया। कहा, स्त्री पर हाथ उठाना हमारे धर्म में नहीं है, और अगर राम सुनेंगे तो हम दोनों से कभी बात नहीं करेंगे। शत्रुघ्न रुक गए, और मंथरा को छोड़ दिया गया। अपने सबसे बड़े दुख में भी भरत ने न्याय की मर्यादा नहीं छोड़ी।
*[ठहराव]*
वसिष्ठ के मार्गदर्शन में भरत ने सरयू के तट पर पिता का अंतिम संस्कार किया। शोक के दिन बीते, तो मंत्री और बड़े-बूढ़े राजसभा में जमा हुए। बोले, "महाराज नहीं रहे। राम और लक्ष्मण वन में हैं। यहाँ आप ही बड़े हैं। कृपया सिंहासन स्वीकार कीजिए।"
सबके सामने भरत ने मना कर दिया।
उन्होंने कहा, "हमारे कुल में बड़ा बेटा राजा बनता है। राम मेरे बड़े भाई हैं। मैं वन जाऊँगा और उन्हें लौटा लाऊँगा। और अगर वे नहीं आए, तो उनकी जगह मैं वन में रहूँगा।"
पूरी सभा खुशी से रो पड़ी। कारीगर आगे-आगे जंगल में रास्ता साफ़ और समतल करने निकल पड़े। और एक बड़ा कारवाँ चला, तीनों रानियाँ, मंत्री, पुरोहित, सेना, और इतने नगरवासी कि लगता था जैसे एक पूरा नगर चल रहा हो।
*[ठहराव]*
जब यह भीड़ गंगा किनारे पहुँची, तो उस पार से **गुह** ने देखा और चिंतित हो गए। भरत सेना लेकर वन में क्यों आए हैं, कहीं राम का अहित तो नहीं करना चाहते? उन्होंने अपने लोग जमा किए और रोकने की तैयारी कर ली।
पर जब वे भरत से मिले, उनका चेहरा देखा, राम के बारे में उनकी बातें सुनीं, तो सारी चिंता पिघल गई। उन्होंने भरत को वह पेड़ दिखाया जिसके नीचे राम सोए थे, और घास का वह बिछौना भी, जो अब तक दबा हुआ था। भरत उस बिछौने के पास बैठ गए और आँसू नहीं रुके। फिर गुह ने उन्हें नदी पार करने के लिए नावें दीं।
ऋषि **भरद्वाज** ने भी पहले भरत को परखा, पूछा कि क्यों आए हो। फिर अपने तप के बल से पूरे कारवाँ का ऐसा सत्कार किया जैसे स्वर्ग का भोज हो। और उन्हें चित्रकूट का रास्ता बताया।
*[ठहराव]*
चित्रकूट पर लक्ष्मण ने सेना के आने का शोर सुना और अयोध्या का ध्वज देखा। वे पेड़ पर चढ़कर देखने लगे। उन्हें पक्का लगा कि भरत हम पर चढ़ाई करने आए हैं, और उन्होंने धनुष तैयार कर लिया।
राम ने उन्हें रोका। बोले, "भरत ने कभी मेरा बुरा नहीं चाहा। वह प्रेम से ही आया होगा।" राम अपने भाई को जानते थे।
और हुआ भी वही। भरत सबसे आगे दौड़ते हुए पहाड़ी पर चढ़े। जब उन्होंने राम को वल्कल वस्त्र में, जटा बाँधे, कुटिया के पास बैठे देखा, तो "भैया!" कहकर उनके चरणों में गिर पड़े, और आगे कुछ न बोल पाए। राम ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया।
फिर राम ने पिता के बारे में पूछा। और भरत को बताना पड़ा। राम धरती पर बैठ गए, सँभल न सके। वे मंदाकिनी पर गए और पिता की स्मृति में जल अर्पित किया, वन के उन्हीं फलों के साथ जिन पर वे स्वयं जी रहे थे।
*[ठहराव]*
अगले कुछ दिन सबने राम से लौटने की विनती की। भरत, माताएँ, वसिष्ठ, मंत्री, प्रजा। भरत ने बार-बार हाथ जोड़े। अब तो कैकेयी भी चाहती थीं कि राम लौट आएँ।
राम ने सबकी बात प्रेम से सुनी। और हर बार एक ही उत्तर दिया। "पिताजी ने एक वचन दिया था। मैंने उसे निभाने का वचन दिया। अगर आज मैं उसे तोड़ दूँ, तो संसार को यही सिखाऊँगा कि वचन का कोई मोल नहीं। इन चौदह वर्षों तुम अयोध्या सँभालो, मैं वन में रहूँगा। इस तरह हम दोनों पिता का मान रखेंगे।"
यहाँ वाल्मीकि एक पूरा सर्ग देते हैं जिसमें राम, वन में बैठे-बैठे, भरत से बड़े स्नेह से राज-काज के बारे में पूछते हैं। किसान सुखी तो हैं? सैनिकों को वेतन समय पर मिलता है? बूढ़ों और ग़रीबों की देखभाल होती है? क्या तुम ज्ञानी लोगों से सलाह लेते हो, और योजना को सही समय तक गुप्त रखते हो? यह अच्छे शासन की एक छोटी-सी पुस्तिका जैसा है, एक ऐसे बड़े भाई की ओर से जिसके पास ख़ुद कोई सिंहासन नहीं।
*[ठहराव]*
आख़िर भरत समझ गए कि राम अपना निश्चय नहीं बदलेंगे। तब उन्होंने सोने से सजी एक जोड़ी खड़ाऊँ आगे रखी और राम से उन पर पाँव रखने को कहा। राम ने पाँव रखे। भरत ने वे खड़ाऊँ, वे **पादुकाएँ**, उठाकर अपने सिर पर रख लीं।
उन्होंने कहा, "चौदह वर्ष ये पादुकाएँ अयोध्या पर राज करेंगी। मैं तो बस इनकी ओर से राज्य की देखरेख करूँगा। आपकी तरह वल्कल पहनूँगा, जटा रखूँगा, जो आप खाएँगे वही खाऊँगा, और नगर के बाहर रहूँगा। और चौदह वर्ष पूरे होने के अगले दिन आप न लौटे, तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगा।"
राम ने उन्हें गले लगाया और कहा, "ऐसा ही होगा।"
भरत सिर पर पादुकाएँ रखे लौटे। वे महल में नहीं गए। अयोध्या के पास **नंदिग्राम** में बस गए। वहाँ उन्होंने राम की पादुकाएँ सिंहासन पर रखीं, उन पर राजछत्र लगाया, और राज्य का हर काम पहले उनके सामने निवेदन किया। चौदह वर्ष वे एक रखवाले की तरह राज करते रहे, और एक मुनि की तरह रहे।
आज भी भारत में जब किसी भाई के प्रेम की सबसे बड़ी तारीफ़ करनी हो, तो कहते हैं, "भरत जैसा भाई।"
*[ठहराव]*
**आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए।** भरत को वह सब कुछ मिल गया जो कोई चाह सकता था, और उन्होंने लौटा दिया, क्योंकि वह न्याय से उनका नहीं था। क्या आपके जीवन में भी कोई छोटी चीज़ है, कोई श्रेय, कोई हिस्सा, कोई जगह, जो असल में किसी और की है? सोचिए, उसे कैसे लौटाया जा सकता है।
अगले एपिसोड में राम चित्रकूट छोड़कर और गहरे वन में जाते हैं, बड़े-बड़े ऋषियों के संसार में।
*[घंटी। 2 सेकंड मौन।]*
**श्रेय (पढ़कर सुनाएँ):** वाल्मीकि रामायण, अयोध्या काण्ड के आधार पर DharmikStudio टीम द्वारा लिखित। AI स्वर में वाचन। कोई भूल हो तो इस एपिसोड पर "गलती बताएँ" का उपयोग करें।