ऋषियों के वन में
Episode 9 of 20 in रामायण: वाल्मीकि की कथा.
Narrated with an AI voice.
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नमस्कार। आइए, साथ बैठते हैं।
पिछली बार भरत राम को लौटाने चित्रकूट तक आए, और सिर पर राम की पादुकाएँ रखकर वापस गए। आज तीनों यात्री चित्रकूट को पीछे छोड़ते हैं।
*[ठहराव]*
राम ने वह सुंदर पहाड़ी क्यों छोड़ी? वाल्मीकि दो कारण बताते हैं। वहाँ की हर चीज़ उन्हें भरत की, माताओं की, और अयोध्या से आकर लौट गई भीड़ की याद दिलाती थी। और आसपास रहने वाले ऋषियों ने बताया कि वन अब सुरक्षित नहीं रहा, कई लोग वहाँ से जा रहे हैं। इसलिए राम ने और दक्षिण जाने का निश्चय किया।
पहला पड़ाव था महर्षि **अत्रि** का आश्रम। अत्रि बहुत वृद्ध थे, महान ऋषियों में से एक। उन्होंने राम को बेटे की तरह अपनाया। और अपनी पत्नी **अनसूया** को सीता से मिलने बुलाया।
अनसूया अपने पति से भी वृद्ध थीं। वाल्मीकि उन्हें उम्र से झुकी हुई, सफ़ेद बालों वाली, काँपते शरीर वाली बताते हैं, पर लंबी तपस्या के तेज से दमकती हुई। अत्रि ने राम को बताया कि एक बार भयंकर सूखा पड़ा था, दस बरस तक बारिश नहीं हुई, तब अनसूया के तप से ही फल-मूल उगे और गंगा की धारा आश्रम के पास बहने लगी।
सीता ने उन्हें प्रणाम किया। अनसूया ने सीता के हाथ थाम लिए और उनसे वैसे बात की जैसे कोई दादी नई बहू से करती है। उन्होंने पति के साथ वन आने के लिए सीता की सराहना की। दांपत्य में प्रेम और निष्ठा की बातें कीं।
फिर उन्होंने सीता को उपहार दिए। फूलों की माला, सुंदर वस्त्र, आभूषण, और सुगंधित अंगराग। कहा, ये कभी मुरझाएँगे नहीं, कभी मलिन नहीं होंगे, और तुम्हें सदा सुंदर रखेंगे।
और फिर अनसूया ने कुछ ऐसा किया जिससे पता चलता है कि वाल्मीकि के ये वृद्ध ऋषि कितने मानवीय हैं। उन्होंने कहा, "सुना है तुम्हारा विवाह एक प्रतियोगिता से हुआ था। वह कहानी मुझे अपने मुँह से सुनाओ।" और सीता उस वृद्धा के पास बैठकर सब सुनाने लगीं। कैसे राजा जनक ने उन्हें हल की रेखा में धरती से पाया, कैसे शिव के विशाल धनुष की शर्त रखी गई, और कैसे राम ने उसे उठाया। अनसूया किसी भी दादी की तरह प्रेम-कथा सुनकर प्रसन्न होती रहीं। जब सीता ने कथा पूरी की, तब तक रात हो चुकी थी। अनसूया ने कहा, जाओ, ये नए उपहार पहनो और राम के पास जाओ।
*[ठहराव]*
अगली सुबह वे विशाल **दंडक** वन में पहुँचे। वह वन आश्रमों से भरा था। ऋषि सादी कुटियों में रहते, यज्ञ की अग्नि जलती, कुश के आसन बिछे होते, और पेड़ों के बीच हिरण घूमते। राम को देखकर ऋषि इकट्ठे हो गए और बोले, "वन में भी आप ही हमारे राजा हैं। हमारी रक्षा कीजिए।" उन्होंने बताया कि उनकी पूजा-पाठ और शांति में बाधा डाली जा रही है। राम ने उनकी सहायता का वचन दिया।
वे महर्षि **शरभंग** से मिले, फिर महर्षि **सुतीक्ष्ण** से, जिन्होंने बड़े प्रेम से स्वागत किया और कहा, जब मन हो, लौट आना।
*[ठहराव]*
आगे चलते हुए अरण्य काण्ड का वह प्रसंग आता है जो मुझे सबसे प्रिय है। पति-पत्नी के बीच एक बातचीत।
सीता उस वचन के बारे में सोच रही थीं जो राम ने ऋषियों को दिया था। उन्होंने बहुत कोमलता से कहा, "आप धर्मात्मा हैं। पर तीन दोष ऐसे हैं जो किसी में भी आ सकते हैं। झूठ बोलना। पराई स्त्री की कामना। और जिसने कोई हानि न की हो, उसे हानि पहुँचाना। पहले दो तो आपमें कभी नहीं आएँगे। पर तीसरे की मुझे चिंता है। आपने ऋषियों की रक्षा का वचन दिया है। मेरी बस इतनी विनती है, जिसने आपका कुछ न बिगाड़ा हो, उस पर प्रहार मत कीजिए।"
फिर उन्होंने एक छोटी-सी कथा सुनाई। एक तपस्वी थे जो शांति से तप करते थे। इंद्र उनका तप भंग करना चाहते थे। तो इंद्र वेश बदलकर आए और एक तलवार उनके पास धरोहर के रूप में छोड़ गए, कहा, इसे सँभालकर रखना। तपस्वी ने ईमानदारी से उसे सँभाला। कहीं खो न जाए, इसलिए हर जगह साथ लेकर जाते। धीरे-धीरे, रोज़ तलवार साथ रखते-रखते, उनका मन बदलने लगा। उन्हें उसकी आदत पड़ गई। स्वभाव कठोर हो गया। और अंत में वे वह शांति खो बैठे जिसके लिए वन आए थे। सीता ने कहा, "शस्त्र आग की तरह हैं। पास रखो तो आदमी बदल जाता है।"
अंत में बोलीं, "यह मैं प्रेम से कह रही हूँ, सिखाने के लिए नहीं। धर्म तो आप मुझसे अधिक जानते हैं।"
राम का मन भर आया। बोले, "जो सचमुच मेरा हित चाहे, वही ऐसे बोल सकता है। तुम्हारी बात तुम्हारे योग्य है, सीते। पर मैंने ऋषियों को वचन दिया है, उसे वापस नहीं ले सकता।"
मुझे अच्छा लगता है कि वाल्मीकि सीता को यह स्वर देते हैं। वे केवल पति के पीछे नहीं चल रहीं। वे उनके साथ-साथ सोच रही हैं।
*[ठहराव]*
फिर वाल्मीकि कुछ चौंकाने वाला करते हैं। बस कुछ पंक्तियों में बता देते हैं कि दस वर्ष बीत गए। पूरे दस वर्ष। राम, सीता और लक्ष्मण एक आश्रम से दूसरे आश्रम जाते रहे, कहीं कुछ महीने, कहीं एक साल, ऋषियों के बीच सादगी से रहते हुए। वाल्मीकि कहते हैं, वे सुखी थे।
उन दस वर्षों के बाद वे फिर सुतीक्ष्ण के पास लौटे, और सुतीक्ष्ण ने कहा, महर्षि **अगस्त्य** के दर्शन करो।
अगस्त्य ऋषियों में एक विराट व्यक्तित्व हैं। उनकी बहुत कथाएँ हैं, कैसे उन्होंने विंध्य पर्वत को झुका दिया, कैसे ज्ञान को दक्षिण तक ले गए। जब राम उनके आश्रम पहुँचे, अगस्त्य ने बड़े स्नेह से स्वागत किया और उन्हें दिव्य अस्त्र दिए, एक विशाल धनुष, कभी खाली न होने वाले तरकश, और एक तलवार। और रहने की जगह के बारे में सलाह दी। "**गोदावरी** के तट पर **पंचवटी** जाओ," उन्होंने कहा। "बहुत सुंदर जगह है, फल और जल भरपूर। सीता वहाँ प्रसन्न रहेंगी।"
*[ठहराव]*
पंचवटी जाते हुए उन्हें एक पेड़ पर बैठा विशाल पक्षी मिला। बहुत बड़ा और बहुत बूढ़ा। राम और लक्ष्मण सावधान हो गए। पर पक्षी ने प्रेम से बात की। कहा, "मैं **जटायु** हूँ। तुम्हारे पिता राजा दशरथ का मित्र।" राम ने उन्हें बड़े आदर से प्रणाम किया। जटायु ने कहा, जब तुम दोनों वन में जाओगे, मैं सीता का ध्यान रखूँगा। उस दिन से वे उस परिवार के एक बुज़ुर्ग जैसे हो गए।
पंचवटी में लक्ष्मण ने फिर एक कुटिया बनाई, इस बार बड़ी और सुंदर। मिट्टी की दीवारें, बाँस के खंभे, सरकंडों और पत्तों की छत। राम भाई के काम से इतने प्रसन्न हुए कि उन्हें गले लगाकर बोले, "तुम साथ हो, तो लगता है पिताजी अब भी जीवित हैं।"
पंचवटी के दिन सादे थे। सुबह गोदावरी में स्नान, फिर संध्या-वंदन। लक्ष्मण लकड़ी और फल लाते, सीता कुटिया के आँगन में फूलों के पौधे सँभालतीं। शाम को तीनों आग के पास बैठकर बातें करते, कभी अयोध्या की, कभी वन के पशु-पक्षियों की। जटायु पास के पेड़ पर बैठे रहते, जैसे घर के बड़े बरामदे में बैठते हैं। ऐसे ही दिन वे होते हैं जिन्हें हम तब नहीं पहचानते, और बाद में बहुत याद करते हैं।
*[ठहराव]*
पंचवटी में जाड़ा आया। वाल्मीकि उसका सुंदर चित्र खींचते हैं। सुबह गोदावरी पर धुंध। सूरज दूर और मद्धम। एक भोर, नदी की ओर जाते हुए, लक्ष्मण को भरत की याद आई। बोले, "इस ठंडी सुबह, भरत भी अभी वल्कल पहने सरयू में स्नान करने उतर रहे होंगे, हमारी ही तरह।" और फिर लक्ष्मण ने कैकेयी के बारे में कुछ कड़वा कह दिया।
राम ने उन्हें तुरंत रोका। "माता कैकेयी की निंदा कभी मत करना," उन्होंने कहा। "मुझसे बस भरत की बात करो। मैं तो उसके प्रेम के बारे में सोचता हूँ।"
इतने बरसों बाद भी राम ने अपने घर में क्रोध को जगह नहीं दी।
*[ठहराव]*
**आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए।** सीता ने प्रेम के कारण राम से सच्ची बात कही, और राम ने प्रेम के कारण उसे सुना। इस सप्ताह अगर किसी अपने से कोई सच्ची बात कहनी हो, तो कोमलता से कहिए। और अगर कोई आपसे कुछ सच्चा कहे, तो उत्तर देने से पहले पूरी बात सुनिए।
अगले एपिसोड में पंचवटी की शांति टूटती है। कुटिया के पास एक सोने का हिरण दिखाई देता है, और उसके बाद कुछ भी पहले जैसा नहीं रहता।
*[घंटी। 2 सेकंड मौन।]*
**श्रेय (पढ़कर सुनाएँ):** वाल्मीकि रामायण, अयोध्या और अरण्य काण्ड के आधार पर DharmikStudio टीम द्वारा लिखित। AI स्वर में वाचन। कोई भूल हो तो इस एपिसोड पर "गलती बताएँ" का उपयोग करें।