अर्थ
Episode 1 of 1 in आरती और उनका अर्थ.
Narrated with an AI voice.
- Reading time
- 4 min
- Listening time
- 4 min
- By
- DharmikStudio Originals
- Narration
- AI voice
Read along
नमस्ते। "आरती और उनका अर्थ" में आपका स्वागत है। आज हम उस आरती से शुरू करते हैं जो इतने परिवारों को ज़ुबानी याद है: **ॐ जय जगदीश हरे**।
**
याद कीजिए, आपने इसे पिछली बार कब सुना था। शायद पूजा अभी-अभी पूरी हुई थी। किसी ने थाली में दीया जलाया, सब खड़े हुए, और जब लौ मूर्ति के सामने धीरे-धीरे घूमने लगी, तो पूरा कमरा एक साथ गाने लगा। कोई बच्चा घंटी थोड़ी ज़ोर से बजा रहा था। फिर दीया सबके पास आया, सबने लौ पर हथेलियाँ रखकर आँखों से लगाईं, और प्रसाद बँटा।
यह ऐसे ही गाई जाती है, घरों में, मंदिरों में, सत्यनारायण कथा के समापन पर, त्योहार की शामों को, और भारत से बहुत दूर बसे परिवारों की सभाओं में भी। यह इतनी परिचित है कि हममें से बहुतों ने कभी पूछा ही नहीं कि इसे लिखा किसने।
**
यह आरती आमतौर पर **पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी** की रचना मानी जाती है। वे पंजाब के एक छोटे क़स्बे **फिल्लौर** के थे, और उन्नीसवीं सदी में रहे। वे विद्वान और वक्ता थे, शास्त्रों पर प्रवचन देने दूर-दूर जाते थे, और हिन्दी व पंजाबी दोनों में लिखते थे। उन्हें हिन्दी के शुरुआती उपन्यासों में से एक के लिए भी याद किया जाता है।
कहा जाता है कि उन्होंने यह आरती अठारह सौ सत्तर के दशक में रची, और अठारह सौ इक्यासी में उनका देहांत हुआ। इसलिए यह आरती, जिस रूप में उन्होंने लिखी, अब सबकी साझी विरासत है। यह वेदों जितनी पुरानी नहीं है। यह लगभग डेढ़ सौ साल पुरानी है। और इतने समय में यह इतने घरों तक पहुँची, जितनी इसके रचयिता ने शायद कभी सोची भी न हो।
**
तो यह कहती क्या है? हम यहाँ इसके शब्द नहीं पढ़ेंगे। आइए, अंतरा-दर-अंतरा, इसके भाव को सरल शब्दों में देखें।
टेक स्तुति है। यह पूरे जगत के स्वामी को पुकारती है, और उनकी बात करती है जो अपनी ओर मुड़ने वालों के कष्ट जल्दी दूर करते हैं। यही वह पंक्ति है जिस पर सब लौटते हैं, जहाँ कमरे की हर आवाज़ मिल जाती है।
फिर अंतरे शुरू होते हैं, और वे धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं, जैसे कोई पास आता जा रहा हो।
पहले, गाने वाला भगवान के स्मरण की बात करता है, और यह कि स्मरण से मन हल्का होता है। फिर एक मोड़ आता है: तुम ही मेरी माता हो, तुम ही पिता, तो मैं और किसके पास जाऊँ? यह उस बच्चे की आवाज़ है जिसके पास खटखटाने को एक ही दरवाज़ा है।
इसके बाद आरती का फैलाव बढ़ता है। भगवान को पूर्ण कहा गया है, हर हृदय की बात जानने वाले, सबके स्वामी। फिर करुणा के सागर, सबका पालन करने वाले। और फिर एक सुंदर स्वीकार: तुम एक हो, फिर भी मैं तुम्हें देख नहीं पाता। मैं, जो इतना कम समझता हूँ, तुम्हारे पास कैसे आऊँ?
फिर गाने वाला ऊपर उठाए जाने की विनती करता है। भगवान दीनों के बंधु हैं, दुख हरने वाले। गाने वाला माँगता है कि उसके दोष दूर हों, श्रद्धा और भक्ति बढ़े, और संतों की सेवा का अवसर मिले।
और आख़िरी अंतरा एक अर्पण है। तन, मन, धन: मेरे पास जो कुछ है, वह पहले से तुम्हारा है। तुम्हें ऐसा क्या दूँ जो पहले से तुम्हारा न हो? इसलिए जो तुम्हारा है, वही तुम्हें लौटाता हूँ।
**
यही इसका स्वरूप है। स्तुति, शरण, विस्मय, बेहतर बनने की विनती, और अंत में, बस लौटा देना। अब इसे गाते हुए सुनते हैं।
**
**
**
अगली बार जब आप इसे गाएँ, तो शायद आख़िरी अंतरे पर ध्यान दीजिए। पूरी आरती उसी क्षण की ओर चलती आती है।
**
यह कथन AI आवाज़ में है। व्याख्या DharmikStudio टीम ने लिखी है, और आरती एक व्यक्ति ने गाई है।