राजा इंद्रद्युम्न और पवित्र दारु
Episode 1 of 5 in जगन्नाथ: पुरी के जगत के नाथ.
Narrated with an AI voice.
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- DharmikStudio Originals
- Temple or tirtha
- Jagannath Temple, Puri
- Narration
- AI voice
In this episode
- राजा इंद्रद्युम्न ने नील माधव की खोज की और पवित्र दारु प्राप्त की।
- ओड़िया कथा में विद्यापति और सबर समुदाय की भूमिका महत्वपूर्ण है।
- देवों की मूर्तियाँ बिना हाथ-पैर के बनीं, जिसे कोई कमी नहीं माना गया।
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नमस्कार। एक साँस के लिए शांत बैठ जाइए। भीतर। और बाहर।
आज हम जगन्नाथ पर एक कथा-माला शुरू कर रहे हैं, जगत के नाथ, जिनका विशाल मंदिर ओडिशा के समुद्र-तट पर पुरी में है। पुरी के कई पुराने नाम हैं। इसे पुरुषोत्तम क्षेत्र कहते हैं, यानी परम पुरुष का क्षेत्र। इसे शंख क्षेत्र कहते हैं, क्योंकि परंपरा कहती है कि यह पवित्र क्षेत्र शंख के आकार का है। और ओडिशा के ज़्यादातर लोगों के लिए यह बस श्रीक्षेत्र है।
पाँच बैठकों में हम इस स्थान को धीरे-धीरे देखेंगे। आज, जगन्नाथ पुरी कैसे आए। फिर रथ और बड़ दांड। फिर लकड़ी के विग्रहों का नवीकरण। फिर मंदिर की रसोई और वह भोजन जो सब मिलकर बाँटते हैं। और अंत में वे कवि, संत, गायक और नर्तक, जिन्होंने इन प्रभु से प्रेम किया।
इस पहली बैठक में हम सुनेंगे कि जगन्नाथ पुरी कैसे आए। यह कथा एक से अधिक तरह से कही जाती है। स्कन्द पुराण में पुरी पर एक लंबा भाग है, और ओडिशा के लोगों की अपनी बहुत प्रिय कथा है, जिसे मंदिर के सेवायत और ओड़िया साहित्य सँजोए हुए हैं, जैसे कवि सारला दास का ओड़िया महाभारत। हम दोनों को साथ-साथ सुनेंगे।
पहले वह, जो दोनों कथाओं में एक जैसा है।
बहुत पहले इंद्रद्युम्न नाम के एक राजा थे। स्कन्द पुराण कहता है कि वे अवंती से राज करते थे, और विष्णु के गहरे भक्त थे। उन्हें पता चला कि पूर्वी समुद्र के पास के वनों में कहीं विष्णु एक गुप्त रूप में पूजे जाते हैं, जिसे नील माधव कहते हैं। उनका मन इसी रूप को खोजने और एक ऐसा मंदिर बनाने में लग गया जहाँ सब पूजा कर सकें।
नाम पर एक पल ठहरिए। नील यानी नीला, गहरे आकाश या गहरे समुद्र का रंग। माधव विष्णु का एक नाम है। तो राजा वन के उस नीले प्रभु को खोज रहे थे, जिनकी पूजा किसी महल से दूर, चुपचाप होती थी।
स्कन्द पुराण में राजा अकेले नहीं चलते। देवर्षि नारद उनके साथ जाते हैं, और राजा अपने लोगों के साथ पूरब आकर समुद्र-तट की इस भूमि पर पूजा के बड़े अनुष्ठानों की तैयारी करते हैं। पुराण इस तट की पवित्रता, इसके जल और इसके तीर्थों का लंबा वर्णन करता है।
ओड़िया कथा में राजा खोज के लिए विद्यापति नाम के एक युवा ब्राह्मण को भेजते हैं। विद्यापति वन में पहुँचते हैं और सबर समुदाय के मुखिया विश्वावसु के घर ठहरते हैं। विश्वावसु नील माधव के भक्त हैं और एक गुफा में छिपकर उनकी पूजा करते हैं।
विद्यापति को विश्वावसु की बेटी ललिता से प्रेम हो जाता है और वे उनसे विवाह करते हैं। कुछ समय बाद वे अपने ससुर से उनके आराध्य के दर्शन कराने का आग्रह करते हैं। विश्वावसु मान जाते हैं, पर आँखों पर पट्टी बाँधकर ले जाते हैं। कथा कहती है कि विद्यापति अपने साथ सरसों के दाने रखते हैं और रास्ते भर गिराते जाते हैं। जब वर्षा आती है, तो दाने उग आते हैं और रास्ता दिखा देते हैं।
मैं यहाँ थोड़ा रुकना चाहता हूँ। परंपरा का यह हिस्सा ओडिशा के लोगों को बहुत प्यारा है। यह जगन्नाथ की कथा की शुरुआत में ही वन में रहने वाले एक समुदाय को स्थान देता है। प्रभु से सबसे पहले वन में प्रेम किया गया, उन लोगों ने किया जो बदले में कुछ नहीं माँगते थे।
आज भी मंदिर के सेवायतों का एक समूह, जिन्हें दइतापति कहते हैं और जिन्हें विश्वावसु के वंश का माना जाता है, जगन्नाथ की पूजा में विशेष दायित्व निभाता है। सबसे निकट के समय में प्रभु की देखभाल यही परिवार करता है। तीसरी बैठक में, जब हम नई देह की बात करेंगे, हम इनसे फिर मिलेंगे।
जब राजा अंततः उस स्थान पर पहुँचते हैं, तो दोनों कथाएँ मानती हैं कि नील माधव अब वहाँ दिखाई नहीं देते। राजा का हृदय टूट जाता है। वे इतनी दूर आए, और जिनके लिए आए, वही छिप गए।
तब स्कन्द पुराण बताता है कि उनकी भक्ति के उत्तर में राजा को संदेश मिलता है कि प्रभु दारु, यानी पवित्र लकड़ी के रूप में, समुद्र पर तैरते हुए आएँगे। और ऐसा ही होता है। तट पर लकड़ी का एक विशाल लट्ठा दिखाई देता है।
ज़रा यह दृश्य सोचिए। जंगल-जंगल खोज चुके राजा समुद्र-तट पर खड़े हैं, और उनके पास कोई रत्न या सोने की मूर्ति नहीं आती। लहरों पर बहकर एक लकड़ी आती है। प्रभु सबसे साधारण रूप चुनते हैं, और सबसे साधारण रास्ता, वही समुद्र जिसे पुरी का हर मछुआरा जानता है।
उस लकड़ी को देव-रूपों में कौन गढ़ता है? यहाँ फिर कथाएँ अलग होती हैं, और दोनों प्यारी हैं।
स्कन्द पुराण में दिव्य शिल्पी विश्वकर्मा मूर्तियाँ गढ़ते हैं।
ओड़िया कथा में एक बूढ़े बढ़ई दरबार में आते हैं और काम करने का प्रस्ताव रखते हैं। उनकी एक शर्त है। वे इक्कीस दिन बंद दरवाज़ों के पीछे काम करेंगे, और जब तक काम पूरा न हो, कोई दरवाज़े नहीं खोलेगा। दिन बीतते हैं। छेनी की आवाज़ बंद हो जाती है।
रानी गुंडिचा को चिंता होती है कि कहीं बूढ़े बढ़ई को कुछ हो तो नहीं गया, और वे समय पूरा होने से पहले दरवाज़े खुलवा देती हैं। दरवाज़े खुलते हैं, तो बढ़ई वहाँ नहीं होते। मूर्तियाँ हैं, पर हाथ और पैर पूरे नहीं गढ़े गए।
ओड़िया परंपरा कहती है कि इसीलिए जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा आज उसी रूप में पूजे जाते हैं, बड़ी गोल आँखों वाले, बिना पूरे गढ़े हाथ-पैर के। पुरी के लोग इसे कोई कमी नहीं मानते।
लोग अक्सर एक बात कहते हैं: उनके हाथ नहीं, फिर भी वे सारा जगत थामे हैं; उनके पैर नहीं, फिर भी वे हर भक्त तक पहुँचते हैं। यह रूप स्वयं सिखाता है कि प्रभु किसी देह में बँधे नहीं हैं।
और रानी वाले हिस्से में एक कोमलता है। उन्होंने लोभ या अहंकार से दरवाज़े नहीं खुलवाए। उन्हें अकेले काम कर रहे एक बूढ़े आदमी की चिंता थी। कथा जैसे कहती है कि उनकी यही चिंता इस बात का हिस्सा बनी कि प्रभु हम सबको कैसे दिखे।
हम यह तय करने नहीं बैठेंगे कि कौन-सी कथा सच्ची है। पुराण और ओडिशा के लोग, दोनों सदियों से यह स्मृति सँजोए हुए हैं। परंपराएँ अलग-अलग हैं, और हर एक प्रेम से निभाई जाती है। हमारा काम सुनना है।
अब आते हैं मंदिर पर, जैसा वह आज है।
पुरी का श्री जगन्नाथ मंदिर बारहवीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव के समय बना। इसका ऊँचा शिखर पूरे नगर के ऊपर दिखता है, और लोग कहते हैं कि समुद्र में मछुआरे इसी को देखकर घर का रास्ता पाते रहे हैं। रत्नवेदी, यानी रत्नों के चबूतरे पर चार देव एक साथ पूजे जाते हैं: जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा, और सुदर्शन, एक स्तंभ जो विष्णु के चक्र का प्रतीक है।
क्योंकि देव-विग्रह लकड़ी के हैं, इसलिए समय-समय पर उनका नवीकरण होता है। इस अनुष्ठान को नबकलेबर कहते हैं, यानी नई देह। यह उन विशेष वर्षों में होता है जब पंचांग में आषाढ़ का एक अधिक मास आता है। परंपरा में बताए चिह्नों से नए वृक्ष चुने जाते हैं, और सबसे पवित्र काम दइतापति करते हैं। पिछला नबकलेबर 2015 में हुआ था।
और हर वर्ष आषाढ़ में आती है रथ यात्रा, जब तीनों देव मंदिर से निकलकर विशाल लकड़ी के रथों पर बड़ दांड, यानी बड़ी सड़क से, गुंडिचा मंदिर जाते हैं। उस मंदिर का नाम हमारी कथा की रानी को याद करता है। प्रभु अपना मंदिर छोड़कर सड़क पर लोगों के बीच आते हैं, और वहाँ कोई भी उनके दर्शन कर सकता है।
एक और छोटी बात मुझे बहुत प्यारी लगती है। मुख्य सिंहद्वार पर पतितपावन का एक विग्रह है, जो ऐसे स्थित है कि सड़क से गुज़रने वाला कोई भी भीतर गए बिना जगन्नाथ के दर्शन कर सके।
तो आइए, आज की बात समेट लें।
पुरी राजा इंद्रद्युम्न को याद करता है, जो विष्णु के गुप्त रूप नील माधव को खोजने के लिए व्याकुल थे। ओड़िया कथा विद्यापति, वन के मुखिया विश्वावसु और उनकी बेटी ललिता को जोड़ती है, और सबर समुदाय को जगन्नाथ की कथा की शुरुआत में स्थान देती है।
प्रभु समुद्र से पवित्र लकड़ी बनकर आते हैं। स्कन्द पुराण में विश्वकर्मा उसे गढ़ते हैं; ओड़िया कथा में एक बूढ़े बढ़ई बंद दरवाज़ों के पीछे काम करते हैं, जब तक रानी गुंडिचा दरवाज़े समय से पहले नहीं खुलवा देतीं। मंदिर बारहवीं शताब्दी में बना, और प्रभु हर वर्ष रथ यात्रा में अपने लोगों के बीच आते हैं।
आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए। पुरी की कथा उस रूप को, जिसके हाथ-पैर पूरे नहीं गढ़े गए, कोई दोष नहीं मानती। अपने घर या काम में कोई एक ऐसी चीज़ सोचिए जिसे शुरू करने से पहले आप उसके पूरी तरह ठीक होने का इंतज़ार कर रहे हैं। कल उसे, जैसी है वैसी ही, शुरू कर दीजिए।
अगली बैठक में हम बड़ दांड पर चलेंगे और रथ यात्रा और तीन रथों की कथा सुनेंगे।