रथ यात्रा और रथों पर विराजे तीनों देव
Episode 2 of 5 in जगन्नाथ: पुरी के जगत के नाथ.
Narrated with an AI voice.
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- DharmikStudio Originals
- Temple or tirtha
- Jagannath Temple, Puri
- Narration
- AI voice
In this episode
- रथ यात्रा में प्रभु अपने घर से बाहर सड़क पर आते हैं।
- दइतापति परिवार बीमार देवों की सेवा करते हैं।
- राजा भगवान के रथों को झाड़ू लगाते हैं।
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नमस्कार। फिर से स्वागत है। एक साँस लीजिए, और दिन के शोर को थम जाने दीजिए। भीतर। और बाहर।
पिछली बैठक में हमने सुना कि जगन्नाथ समुद्र से पवित्र लकड़ी बनकर पुरी आए, और रानी गुंडिचा ने दरवाज़े समय से पहले खुलवा दिए। आज हम मंदिर से बाहर सड़क पर आते हैं। हम बड़ दांड पर चलेंगे, पुरी की बड़ी सड़क पर, और रथ यात्रा की बात करेंगे।
रथ यात्रा हर वर्ष आषाढ़ महीने में आती है, शुक्ल पक्ष की शुरुआत में, जब समुद्र-तट पर मानसून आ रहा होता है। सही दिन चंद्र पंचांग के साथ हर साल बदलता है, इसलिए अपने शहर के लिए सही तिथि पंचांग में ज़रूर देख लीजिए।
इस उत्सव के मूल में एक अनोखी बात है। ज़्यादातर मंदिरों में हम प्रभु के पास जाते हैं। जूते उतारते हैं, कतार में लगते हैं, गर्भगृह के द्वार तक पहुँचते हैं। रथ यात्रा में प्रभु हमारे पास आते हैं। जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा रत्नवेदी छोड़कर खुली सड़क पर निकल आते हैं, जहाँ कोई भी उनके दर्शन कर सकता है।
कथा उत्सव से कई हफ़्ते पहले शुरू होती है।
रथ यात्रा से पहले एक पूर्णिमा को स्नान पूर्णिमा आती है। तीनों देवों को मंदिर की दीवार के पास एक ऊँचे मंच पर लाया जाता है, और मंदिर परिसर के एक कुएँ के जल से, बहुत से घड़ों से स्नान कराया जाता है। परंपरा घड़ों की संख्या एक सौ आठ बताती है।
परंपरा कहती है कि इस बड़े स्नान के बाद देव बीमार पड़ जाते हैं, जैसे ठंडे पानी में ज़्यादा नहाने के बाद हम में से कोई भी पड़ सकता है। लगभग दो हफ़्ते वे आँखों से ओझल होकर विश्राम करते हैं। इस समय को अनसर कहते हैं। मुख्य द्वार भक्तों के लिए बंद रहते हैं, और भक्त कपड़े पर बने ओड़िया पटचित्र की पूजा करते हैं।
इन दिनों में दइतापति, जिनसे हम पिछली बार मिले थे, प्रभु की ख़ास सेवा करते हैं। वे वैसे ही सेवा करते हैं जैसे घर में किसी बीमार सदस्य की की जाती है, सादे भोग, जड़ी-बूटियों से बनी चीज़ों और शांति के साथ। मुझे यह बहुत मानवीय लगता है। जगत के नाथ की देखभाल घर के किसी अपने की तरह होती है।
विश्राम के बाद देव फिर दिखाई देते हैं, ताज़ा और नए। लोग इसे नवयौवन दर्शन कहते हैं। और जल्द ही आता है रथों का दिन।
अब रथों की बात।
रथ तीन हैं, और हर साल नए बनते हैं। काम उत्सव से कई हफ़्ते पहले, बड़ दांड पर मंदिर के कार्यालय के सामने शुरू होता है, और परंपरा कहती है कि इसकी शुरुआत अक्षय तृतीया के दिन होती है। पीढ़ियों से यह काम करने वाले बढ़ई और शिल्पी परिवार इन्हें बनाते हैं। लकड़ी आती है, और दिन-ब-दिन सड़क पर तीन विशाल रथ खड़े होते जाते हैं, जिनके पहिए आदमी से भी ऊँचे होते हैं।
जगन्नाथ के रथ का नाम नंदिघोष है। यह सबसे ऊँचा है, इसमें सोलह पहिए हैं, और यह लाल और पीले कपड़े से ढका होता है।
बलभद्र के रथ का नाम तालध्वज है, यानी ताड़ के वृक्ष वाले ध्वज का रथ। इसमें चौदह पहिए हैं, और इसका कपड़ा लाल और हरा होता है।
सुभद्रा के रथ का नाम दर्पदलन है, यानी अहंकार को तोड़ने वाला। इसमें बारह पहिए हैं, और इसका कपड़ा लाल और काला होता है। सुदर्शन, जो विष्णु के चक्र का प्रतीक स्तंभ है, सुभद्रा के साथ चलते हैं।
उत्सव के बाद रथ खोल दिए जाते हैं, और परंपरा कहती है कि उनकी बहुत-सी लकड़ी मंदिर की रसोई में ईंधन बनती है। कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता। अगले साल काम फिर से शुरू होता है।
उन हफ़्तों में बड़ दांड की कल्पना कीजिए। यह बहुत चौड़ी सड़क है, और लोग कहते हैं कि यह इसी दिन के लिए इतनी चौड़ी बनी। दुकानें, तीर्थयात्री, गायें, रिक्शे, सब इसी पर हैं। और इस रोज़ के जीवन के बीच धीरे-धीरे रथ आकार लेते हैं, छेनी-हथौड़े की आवाज़ पास के समुद्र की आवाज़ से मिलती रहती है।
रथ यात्रा की सुबह देवों को एक जुलूस में मंदिर से बाहर लाया जाता है, जिसे पहंडी कहते हैं।
दइतापति लकड़ी के विशाल विग्रहों को उठाकर, क़दम-क़दम पर धीरे-धीरे झुलाते हुए लाते हैं। घंटे, शंख, झाँझ और ढोल एक साथ बजते हैं। पहंडी पुरी का बहुत भावुक कर देने वाला दृश्य है, क्योंकि लगता है जैसे देव अपनी झूमती चाल से अपने लोगों की ओर चल रहे हों। पहले बलभद्र आते हैं, फिर सुभद्रा, और अंत में जगन्नाथ।
फिर एक छोटी-सी रस्म होती है, जिसका अर्थ बहुत बड़ा है। पुरी के गजपति राजा रथों पर आते हैं। वे सोने की मूठ वाली झाड़ू से हर रथ का फ़र्श बुहारते हैं, और जल और चंदन छिड़कते हैं। इसे छेरा पहंरा कहते हैं।
इस दृश्य पर एक पल ठहरिए। पुराने राज्य के सबसे बड़े व्यक्ति, राजा, प्रभु के सामने झाड़ू लगाते हैं। परंपरा कहती है कि जगन्नाथ के सामने राजा भी सेवक है, और कोई काम छोटा नहीं।
और फिर रस्सियाँ उठती हैं।
भारत के हर कोने से और बाहर से आए हज़ारों लोग लंबी, मोटी रस्सियाँ पकड़कर खींचते हैं। पहले बलभद्र का रथ चलता है, फिर सुभद्रा का, फिर जगन्नाथ का। रथ बहुत बड़े और भारी हैं, और बड़ दांड पर धीरे-धीरे चलते हैं। कभी-कभी रथ रुक जाते हैं और देर तक नहीं हिलते, तो लोग कहते हैं कि प्रभु विश्राम कर रहे हैं, या किसी की राह देख रहे हैं। कोई उन्हें जल्दी नहीं कराता।
पुरी में लोग कहते हैं कि एक पल के लिए भी रस्सी छू लेना आशीर्वाद है। जो पुरी नहीं आ पाते, वे अक्सर अपने शहर की रथ यात्रा में शामिल होते हैं, क्योंकि अब बहुत-से शहरों में यह होती है। हर जगह के अपने रिवाज़ हैं, और सब पुरी की ओर देखते हैं।
इस समय तक अक्सर बारिश होने लगती है। सड़क गीली होती है, भीड़ घनी होती है, लोग गा रहे होते हैं, प्रभु का नाम पुकार रहे होते हैं। अगर आप कभी जाएँ, तो धीरज से जाइए। पुलिस और मंदिर के स्वयंसेवकों की बात मानिए, बुज़ुर्गों और बच्चों को पास रखिए, पानी पीते रहिए, और रस्सियों की ओर धक्का मत दीजिए।
रथ बड़ दांड से होकर लगभग तीन किलोमीटर दूर गुंडिचा मंदिर तक जाते हैं। नाम याद है न? यह मंदिर हमारी पहली कथा की रानी को याद करता है। इसीलिए इस उत्सव को गुंडिचा यात्रा भी कहते हैं।
देव लगभग एक सप्ताह गुंडिचा मंदिर में रहते हैं। इन दिनों की एक प्यारी स्थानीय परंपरा है। जगन्नाथ की पत्नी लक्ष्मी मुख्य मंदिर में ही छूट गई हैं। पाँचवें दिन वे यह देखने गुंडिचा मंदिर आती हैं कि प्रभु लौटे क्यों नहीं, और उनकी नाराज़गी में जगन्नाथ के रथ का एक छोटा-सा हिस्सा तोड़ दिया जाता है। इसे हेरा पंचमी कहते हैं। यह कथा मुस्कुराते हुए, स्नेह से सुनाई जाती है।
फिर वापसी की यात्रा, जिसे बाहुड़ा यात्रा कहते हैं।
लौटते समय रथ प्रभु की मौसी, मौसी माँ के एक छोटे-से मंदिर पर रुकते हैं। परंपरा कहती है कि वहाँ जगन्नाथ को पोड़ पीठा चढ़ाया जाता है, चावल, दाल और गुड़ से बना एक सिका हुआ पकवान, जो उन्हें बहुत प्रिय माना जाता है।
मुख्य मंदिर लौटकर देव तुरंत भीतर नहीं जाते। मंदिर के सामने, रथों पर ही, उन्हें सोने के आभूषण पहनाए जाते हैं। इसे सुना बेश कहते हैं, यानी सोने का शृंगार, और इसे देखने बहुत बड़ी भीड़ आती है।
अंत में आता है नीलाद्रि बिजे, प्रभु का मंदिर में लौटना। लोक-परंपरा कहती है कि लक्ष्मी, जो अब भी रूठी हैं, दरवाज़ा बंद करवा देती हैं। जगन्नाथ उन्हें मिठाई भेंट करते हैं, आजकल बहुत-से घरों में वह मिठाई रसगुल्ला मानी जाती है, और दरवाज़ा खुल जाता है। परिवार फिर से साथ है।
आइए, आज की बात समेटें।
रथ यात्रा से पहले देवों को स्नान कराया जाता है, और वे कुछ समय ओझल होकर विश्राम करते हैं, दइतापतियों की सेवा में। तीन रथ, नंदिघोष, तालध्वज और दर्पदलन, हर साल नए बनते हैं। पहंडी में देव झूमते हुए निकलते हैं, राजा रथ बुहारते हैं, और लोग रथों को बड़ दांड पर गुंडिचा मंदिर तक खींचते हैं। एक सप्ताह बाद वे लौटते हैं, सोने से सजते हैं, और घर जाते हैं।
आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए। रथ यात्रा में प्रभु अपना घर छोड़कर सड़क पर आते हैं, और राजा झाड़ू उठाते हैं। इस हफ़्ते अपने घर या मोहल्ले का कोई एक छोटा काम चुनिए, जो आप आमतौर पर किसी और पर छोड़ देते हैं, और उसे चुपचाप ख़ुद कर दीजिए।
अगली बैठक में हम नबकलेबर की बात करेंगे, प्रभु की नई देह की, और उन दइतापति परिवारों की जो उनकी सेवा करते हैं।