नबकलेबर, प्रभु की नई देह

Episode 3 of 5 in जगन्नाथ: पुरी के जगत के नाथ.

Narrated with an AI voice.

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12 min
By
DharmikStudio Originals
Temple or tirtha
Jagannath Temple, Puri
Narration
AI voice

In this episode

  • प्रभु पुरानी देह से नई देह में आते हैं।
  • दइतापति वन की यात्रा करके विशेष नीम के वृक्ष खोजते हैं।
  • रात में पवित्र तत्व का परिवर्तन होता है।

Read along

नमस्कार। आइए, साथ मिलकर एक शांत साँस से शुरुआत करें। भीतर। और बाहर।

पहली बैठक में हमने सुना कि जगन्नाथ दारु, यानी पवित्र लकड़ी बनकर समुद्र से पुरी आए। दूसरी में हम बड़ दांड पर रथों के साथ चले। आज हम एक ऐसी बात पर आते हैं जो बहुत कम होती है, और जिसे पुरी में गहरे आदर से देखा जाता है। इसे नबकलेबर कहते हैं। नब यानी नया, और कलेबर यानी देह। नई देह।

जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन के विग्रह लकड़ी के हैं, इसलिए वे हमेशा एक-से नहीं रहते। समय-समय पर उन्हें नए वृक्षों से फिर बनाया जाता है, और माना जाता है कि प्रभु पुरानी देह से नई देह में आते हैं।

शुरू में ही एक बात कह दूँ। इस अनुष्ठान का बहुत-सा हिस्सा लोगों की आँखों से दूर होता है। कुछ बातें केवल उन परिवारों को पता हैं जो इसे करते हैं, और उनका विस्तार से वर्णन करना उचित नहीं माना जाता। हम केवल उतनी बात करेंगे जितनी मंदिर और परंपरा खुलकर बताते हैं, और बाक़ी को उसकी चुप्पी में रहने देंगे।

नबकलेबर कब होता है?

यह चंद्र पंचांग से जुड़ा है। कुछ वर्षों में हिंदू पंचांग में एक अधिक मास जोड़ा जाता है, ताकि चंद्र और सौर वर्ष साथ चलते रहें। जब यह अधिक मास आषाढ़ का हो, यानी वर्ष में दो आषाढ़ हों, तो वह नबकलेबर का समय माना जाता है। ऐसा वर्ष जल्दी नहीं आता, कई बार बहुत वर्षों के अंतर पर आता है। पिछला नबकलेबर 2015 में हुआ था, और उससे पहले 1996 में।

इसीलिए ओडिशा के बहुत-से लोगों के लिए नबकलेबर जीवन में एक-दो बार देखी जाने वाली बात है। दादा-दादी बच्चों को पिछली बार की बातें सुनाते हैं। परिवार उसी के हिसाब से तीर्थ की योजना बनाते हैं।

अनुष्ठान एक खोज से शुरू होता है। इसे बनजाग यात्रा कहते हैं, यानी वन की यात्रा।

मंदिर से एक दल निकलता है। इसके केंद्र में दइतापति होते हैं, जिनसे हम हर बैठक में मिलते आए हैं। याद होगा, उन्हें सबर मुखिया विश्वावसु का वंशज माना जाता है, जिन्होंने सबसे पहले वन में नील माधव की पूजा की थी। उनके साथ दूसरे सेवायत भी जाते हैं, हर एक का अपना पुराना, तय दायित्व होता है।

परंपरा कहती है कि दल सबसे पहले काकटपुर में देवी मंगला के मंदिर जाता है। वहाँ प्रार्थना होती है, और परंपरा मानती है कि देवी वरिष्ठ सेवकों को, अक्सर सपने में, उन स्थानों की ओर राह दिखाती हैं जहाँ सही वृक्ष खड़े हैं।

पहली बैठक की कथा फिर याद कीजिए। विद्यापति ने प्रभु को खोजने के लिए वन में एक राह पकड़ी थी। यहाँ, सदियों बाद, दइतापति फिर गाँवों और वनों में निकलते हैं, प्रभु को एक वृक्ष के रूप में खोजने। कथा केवल याद नहीं की जाती, उस पर फिर से चला जाता है।

इसके लिए नीम का वृक्ष लिया जाता है, और कोई भी नीम नहीं। परंपरा कुछ चिह्न बताती है, जिनसे सही वृक्ष पहचाना जाता है। अलग-अलग कथनों में ये सूचियाँ थोड़ी अलग हैं, इसलिए मैं वही बताऊँगा जो आमतौर पर कहे जाते हैं।

जगन्नाथ के लिए वृक्ष का रंग गहरा होना चाहिए, जैसे प्रभु श्याम हैं। बलभद्र और सुभद्रा के लिए हल्के रंग के वृक्ष खोजे जाते हैं। वृक्ष किसी नदी या तालाब जैसे जल के पास हो, और अक्सर किसी आश्रम, श्मशान या शिव मंदिर के पास। उसकी जड़ों में दीमक की बाँबी या साँप का बिल हो सकता है। उस पर पक्षियों के घोंसले न हों, और कोई डाल टूटी या कटी न हो। और लोग कहते हैं कि उसकी छाल पर शंख या चक्र के चिह्न दिख सकते हैं।

ऐसा वृक्ष मिलने पर उसे यूँ ही नहीं काटा जाता। उसे छूने से पहले वहीं पूजा होती है, हवन और प्रार्थना के साथ। फिर लकड़ी नई लकड़ी की गाड़ियों पर पुरी लाई जाती है, जिन्हें भक्त खींचते हैं, और रास्ते भर भजन गाए जाते हैं। रास्ते के गाँव उसे गुज़रते देखने निकल आते हैं।

मुझे यह बात बहुत छूती है कि वृक्ष को काम में लेने से पहले उसका आदर किया जाता है। हम जो भी मानते हों, धरती से कुछ लेने के ढंग के बारे में इसमें हम सबके लिए एक सीख है। हम धीरे से ले सकते हैं, और पहले धन्यवाद कह सकते हैं।

पुरी में लकड़ी मंदिर परिसर के भीतर लाई जाती है। वहाँ लोगों की नज़र से दूर एक घेरे में, पीढ़ियों से यह काम करने वाले बढ़ई दइतापतियों के साथ मिलकर नए विग्रह गढ़ते हैं। काम बड़े अनुशासन से, तय दिनों में, बंद दरवाज़ों के पीछे होता है।

गढ़ने वाले रूप अपनी ओर से नहीं बनाते। वे अपने परिवारों में चले आ रहे माप और तरीक़े मानते हैं, ताकि नए जगन्नाथ की भी वही बड़ी गोल आँखें हों, वही चौड़ी मुस्कान, वही बिना पूरे गढ़े हाथ, जिनसे भक्त सदियों से प्रेम करते आए हैं। फिर विग्रह पर कपड़े, राल और प्राकृतिक रंगों की परतें चढ़ती हैं, और बड़ी आँखों का रंगा जाना अपने-आप में एक पवित्र चरण है।

और यहाँ शायद आपको रानी गुंडिचा, बूढ़े बढ़ई और वे दरवाज़े याद आएँ जो खोले नहीं जाने थे। एक तरह से पुरानी कथा फिर सामने है।

जब नए विग्रह तैयार हो जाते हैं, तब अनुष्ठान का सबसे पवित्र हिस्सा होता है। इसे ब्रह्म परिवर्तन कहते हैं। परंपरा एक पवित्र तत्व की बात करती है, जो पुराने विग्रह में रहता है और नए में ले जाया जाता है। यह रात में, सबसे वरिष्ठ दइतापति करते हैं। परंपरा कहती है कि उनकी आँखें और हाथ ढके रहते हैं, ताकि कोई उस तत्व को सीधे देखे या छुए नहीं। नगर की बत्तियाँ बुझा दी जाती हैं, और लोग मौन में प्रतीक्षा करते हैं।

जिन्होंने यह काम नहीं किया, वे नहीं बता सकते कि उस कक्ष में क्या होता है। जो परिवार इसे करते हैं, वे इसका वर्णन नहीं करते। और मुझे लगता है यही ठीक है कि हम इसकी कल्पना ज़ोर से न करें। परंपरा की कुछ बातें अनकही रहने के लिए ही होती हैं।

पुराने विग्रहों का क्या होता है?

उन्हें विधि-विधान के साथ मंदिर परिसर के भीतर कोइली बैकुंठ नाम के स्थान पर समाधि दी जाती है। दइतापति, जिन्हें प्रभु का अपना परिवार माना जाता है, शोक का समय मानते हैं, जैसे किसी बुज़ुर्ग के जाने पर परिवार मानता है। इसमें गहरा दुख भी है, और गहरी कोमलता भी।

फिर कुछ समय बाद नए विग्रह पहली बार लोगों को दिखाई देते हैं। लोग इसे नवयौवन दर्शन कहते हैं, क्योंकि प्रभु फिर से युवा और ताज़ा दिखते हैं। और उसी मौसम में नए विग्रह रथ यात्रा में रथों पर निकलते हैं, बड़ दांड से गुंडिचा मंदिर तक, जैसा हमने पिछली बैठक में सुना।

आइए, एक पल सोचें कि यह अनुष्ठान हमें क्या दिखाता है।

बहुत-सी परंपराएँ अपने पवित्र विग्रह पत्थर या धातु से बनाती हैं, ताकि वे टिके रहें। पुरी में प्रभु ऐसे रूप में पूजे जाते हैं जिसके बारे में सब जानते हैं कि वह पुराना होगा, और उसे नया करना होगा। परंपरा इसे छिपाती नहीं, इसका सम्मान करती है।

पुरी में लोग प्रभु के स्नान के बाद बीमार पड़ने की, उनके विश्राम की, मौसी के घर जाने की, लक्ष्मी से रूठने-मनाने की, और अब उनकी पुरानी देह छोड़कर नई देह में लौटने की बात करते हैं। वे मनुष्य के जीवन का हर मौसम जीते हैं। भक्त अक्सर कहते हैं कि इसीलिए वे उन्हें इतने अपने लगते हैं।

और इस सबके केंद्र में दइतापति हैं, एक ऐसा परिवार जिसे वन के समुदाय से आया माना जाता है। प्रभु के जीवन के सबसे पवित्र क्षण में वही उन्हें थामते हैं। यह पुरी के बारे में एक ऐसी बात कहता है जिसे मन में रखना चाहिए।

आइए, आज की बात समेटें।

नबकलेबर, यानी नई देह, उन वर्षों में होता है जिनमें आषाढ़ का अधिक मास आता है, और पिछली बार यह 2015 में हुआ। दइतापति और दूसरे सेवायत बनजाग यात्रा पर निकलते हैं, काकटपुर में देवी मंगला से प्रार्थना करते हैं, और विशेष चिह्नों वाले नीम के वृक्ष खोजते हैं। नए विग्रह गुप्त रूप से गढ़े जाते हैं, रात के अँधेरे में पवित्र तत्व का परिवर्तन होता है, और पुराने विग्रहों को शोक के साथ समाधि दी जाती है।

आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए। पुरी में प्रभु की देह को भी पुराना होने और नया होने दिया जाता है। अपने जीवन की कोई एक आदत, सोच या काम करने का ढंग सोचिए जो पुराना और थका हुआ हो चुका है। उसे ग़ुस्से में फेंकने की ज़रूरत नहीं। उसे धन्यवाद दीजिए, और किसी नई चीज़ को उसकी जगह लेने दीजिए।

अगली बैठक में हम मंदिर की रसोई में चलेंगे, और महाप्रसाद की बात सुनेंगे, वह भोजन जो सब मिलकर बाँटते हैं।

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