महाप्रसाद, मंदिर की रसोई और एक साथ बँटा भोजन

Episode 4 of 5 in जगन्नाथ: पुरी के जगत के नाथ.

Narrated with an AI voice.

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By
DharmikStudio Originals
Temple or tirtha
Jagannath Temple, Puri
Narration
AI voice

In this episode

  • मंदिर की रसोई में लकड़ी की आग पर मिट्टी के बर्तनों में महाप्रसाद पकाया जाता है।
  • जगन्नाथ को भोग लगाने के बाद देवी बिमला को प्रसाद चढ़ता है।
  • आनंद बाज़ार में सब लोग एक साथ मिलकर एक ही भोजन खाते हैं।

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नमस्कार। आइए, साथ बैठकर एक साँस लें। भीतर। और बाहर।

इस कथा-माला में अब तक हमने सुना कि जगन्नाथ पुरी कैसे आए, रथों पर कैसे निकलते हैं, और उनके लकड़ी के विग्रह कैसे नए होते हैं। आज हम ऐसी जगह चलते हैं जहाँ धुआँ है, भागदौड़ है, और अच्छी ख़ुशबू है। आज हम मंदिर की रसोई में चलते हैं, और भोजन की बात करते हैं।

पुरी में जो भोजन जगन्नाथ को चढ़ाया जाता है और फिर भक्तों में बाँटा जाता है, उसे महाप्रसाद कहते हैं। प्रसाद यानी कृपा, वह भेंट जो प्रभु की ओर से लौटकर हमारे पास आती है। महा यानी बड़ा। ओडिशा के बहुत-से लोगों के लिए जगन्नाथ से उनके प्रेम का दिल यही महाप्रसाद है।

पहले रसोई की कल्पना करें।

यह मंदिर परिसर के भीतर है, और देश की सबसे बड़ी मंदिर-रसोइयों में गिनी जाती है। चूल्हों की क़तारें पर क़तारें हैं, जिनमें लकड़ी जलती है। यहाँ न गैस का चूल्हा है, न बिजली का कुकर। रसोइए ऐसे परिवारों से हैं जो पीढ़ियों से यही काम करते आए हैं। बहुत-से लोगों ने पिता या चाचा के पास खड़े होकर, पानी ढोते हुए, देखते हुए, धीरे-धीरे यह काम सीखा।

भोजन मिट्टी के बर्तनों में पकता है। परंपरा कहती है कि हर दिन नए बर्तन काम आते हैं, जिन्हें आसपास के कुम्हार परिवार बनाते हैं। पुरी के लोग एक दृश्य बड़े चाव से सुनाते हैं। आग पर बर्तन एक के ऊपर एक रखे जाते हैं, कभी-कभी कई ऊँचे, और कहा जाता है कि सबसे ऊपर वाला बर्तन सबसे पहले पकता है। यह बात अक्सर हल्की मुस्कान के साथ, रसोई में प्रभु के हाथ के संकेत की तरह कही जाती है।

पकाने का पानी मंदिर परिसर के कुओं से आता है। परंपरा इनमें से दो कुओं के नाम गंगा और यमुना बताती है, दो पवित्र नदियों के नाम पर।

ज़रा सोचिए, इस एक रसोई को हर दिन कितने हाथ चाहिए। कुम्हार बर्तन गढ़ते हैं। किसान चावल और दाल उगाते हैं। कोई ईंधन की लकड़ी लाता है। पानी भरा जाता है, सब्ज़ियाँ कटती हैं, आग सँभाली जाती है। इनमें से बहुत-से परिवार बहुत लंबे समय से इसी तरह मंदिर की सेवा करते आए हैं, और प्रभु के भोजन में हर एक का स्थान है।

भोजन सादा है और पुराने नियम मानता है। चावल, दाल, सब्ज़ी, साग, और घी-गुड़ से बनी मिठाइयाँ और पीठे। लोग कहते हैं कि इसमें प्याज़ या लहसुन नहीं डलता, और जो सब्ज़ियाँ भारत में बाद की सदियों में आईं, जैसे आलू, टमाटर और मिर्च, वे इस रसोई में नहीं आतीं। एक तरह से यह भोजन पुराने भारत को याद रखता है।

दूसरी बैठक के रथ याद हैं? परंपरा कहती है कि उत्सव के बाद जब रथ खोले जाते हैं, तो उनकी बहुत-सी लकड़ी इसी रसोई में ईंधन बनती है। जिस लकड़ी ने प्रभु को सड़कों पर घुमाया, वही बाद में उनका भोजन पका सकती है।

रसोइए बड़े मन से काम करते हैं। वे नहाकर भीतर आते हैं, रसोई साफ़ रखते हैं, और अक्सर मौन रहकर काम करते हैं, ख़ासकर जब भोजन प्रभु तक ले जाते हैं। उनके लिए खाना बनाना अपने-आप में सेवा है।

अब यह भोजन महाप्रसाद कैसे बनता है?

दिन भर तय समय पर जगन्नाथ को भोग चढ़ाया जाता है। सुबह जल्दी एक भोग, फिर देर सुबह, फिर दोपहर, फिर शाम, और रात को प्रभु के विश्राम से पहले आख़िरी भोग। हर भोग के अपने पकवान हैं। लोग छप्पन भोग की बात करते हैं, हालाँकि सही गिनती अवसर के हिसाब से और कहने वाले के हिसाब से अलग होती है।

रसोइए ढके हुए बर्तन मौन में गर्भगृह तक ले जाते हैं। भोजन जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन को चढ़ता है। फिर, मंदिर की परंपरा कहती है, इसे परिसर के भीतर देवी बिमला के मंदिर में ले जाकर उन्हें चढ़ाया जाता है। पुरी के लोग कहते हैं कि इसके बाद ही यह पूरे अर्थ में महाप्रसाद बनता है।

मुझे यह बात बहुत प्यारी लगती है। जगत के नाथ अकेले नहीं खाते। उनका भोजन देवी तक जाता है, और फिर सब तक।

और सबको यह मिलता कहाँ है?

मंदिर परिसर में एक स्थान है, आनंद बाज़ार, यानी आनंद का बाज़ार। यहाँ महाप्रसाद मिट्टी के बर्तनों में आता है, और लोग बैठकर खाते हैं, या परिवार के लिए घर ले जाते हैं।

यहीं महाप्रसाद अपनी सबसे बड़ी सीख देता है। आनंद बाज़ार में अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग पास-पास बैठकर एक ही भोजन खाते हैं, एक जैसे बर्तनों से। जिस देश में सदियों तक यह नियम कड़े रहे कि कौन किसके साथ खाए, वहाँ पुरी ने लंबे समय से माना है कि प्रभु का भोजन एक है। वह बँटता नहीं। परोसने वाले के हाथ से वह अशुद्ध नहीं होता, क्योंकि उसे पहले ही कृपा छू चुकी है।

ओडिशा के बहुत-से लोग इस पर गहरा गर्व करते हैं। और ओडिशा की बहुत-सी ईमानदार आवाज़ें यह भी कहती हैं कि मंदिर के बाहर का समाज हमेशा इस सीख पर खरा नहीं उतरा। हम दोनों बातें साथ रख सकते हैं। आदर्श वहाँ है, मिट्टी के बर्तन में, हर दिन, हमें उसे जीने के लिए बुलाता हुआ।

महाप्रसाद मंदिर से दूर ओड़िया घरों में भी रहता है।

लोग दो तरह के महाप्रसाद की बात करते हैं। एक पका हुआ भोजन, चावल, दाल और सब्ज़ियाँ, जो ताज़ा और गरम खाया जाता है। दूसरा सूखा, मिठाइयाँ और पीठे, जो कुछ दिन टिकते हैं। यही सूखा प्रसाद ज़्यादातर दूर तक जाता है। खाजा नाम की एक कुरकुरी, परतदार मिठाई पुरी आने वाले बहुत-से लोगों को याद रहती है।

बहुत-से परिवारों में थोड़ा-सा चावल सुखाकर घर में सँभालकर रखा जाता है। इसे कभी-कभी निर्माल्य कहते हैं। जब परिवार में कोई बहुत बुज़ुर्ग हो, या जीवन के अंतिम समय में हो, तो उसके मुँह में इसके कुछ दाने रखे जा सकते हैं, यह कहने के लिए कि तुमने प्रभु का भोजन पाया है, तुम उनके हो, शांति से जाओ। इससे जुड़े रिवाज़ परिवार और इलाक़े के हिसाब से अलग हैं।

एक और रिवाज़ मुझे बहुत अच्छा लगता है। दो लोग महाप्रसाद बाँटकर और एक-दूसरे का साथ निभाने का वचन देकर जीवन भर के मित्र बन सकते हैं। ओडिशा में इसे महाप्रसाद की मित्रता कहा जाता है। लोग कहते हैं ऐसी मित्रता परिवार जितनी गहरी होती है, और कुछ गाँवों में दोनों मित्रों के परिवार पीढ़ियों तक एक-दूसरे को रिश्तेदार मानते हैं।

आइए, एक साथ भोजन बाँटने के भाव पर थोड़ा ठहरें।

हम में से ज़्यादातर लोग हफ़्ते में कई बार खाते हैं, और कई बार जल्दी में, हाथ में फ़ोन लिए। हम कम ही सोचते हैं कि चावल किसने उगाया, किसने ढोया, किसने पकाया, और हम किसके साथ खा रहे हैं। पुरी की रसोई पकाने और खाने को पूजा बना देती है, कुम्हार के चाक से लेकर आग तक, भोग तक, और बँटी हुई थाली तक।

इसके लिए पुरी में होना ज़रूरी नहीं। खाने से पहले आप अपने परिवार के ढंग से भोजन मन में पहले अर्पित कर सकते हैं, और फिर कृतज्ञता से खा सकते हैं। और जब हो सके, किसी ऐसे के साथ खाइए जिसके साथ आप आमतौर पर नहीं खाते।

अगर आप धार्मिक कारणों से उपवास रखते हैं या खान-पान बदलते हैं, तो धीरे से कीजिए। गर्भावस्था में, बीमारी में, दवा चल रही हो, या घर के बुज़ुर्गों के लिए, पहले डॉक्टर की सलाह मानिए।

आइए, आज की बात समेटें।

महाप्रसाद वह भोजन है जो जगन्नाथ को, फिर देवी बिमला को चढ़ता है, और फिर सबमें बँटता है। इसे पीढ़ियों से सेवा करते रसोइए लकड़ी की आग पर, मिट्टी के बर्तनों में, मंदिर के कुओं के पानी से, पुराने नियमों के अनुसार पकाते हैं। आनंद बाज़ार में अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग एक साथ एक ही भोजन खाते हैं। ओड़िया घरों में सूखा महाप्रसाद प्रेम से रखा जाता है, और उसे बाँटकर मित्रता पक्की की जाती है।

आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए। इस हफ़्ते किसी ऐसे व्यक्ति के साथ एक बार भोजन कीजिए जो आपके रोज़ के दायरे से बाहर है, कोई पड़ोसी, कोई सहकर्मी, या कोई जो आपके घर में काम करता है। साथ बैठिए, एक ही खाना खाइए, और उसे अपना छोटा-सा आनंद बाज़ार बनने दीजिए। कोई ख़ास पकवान ज़रूरी नहीं। खुले मन से बाँटा गया सादा भोजन काफ़ी है।

अपनी आख़िरी बैठक में हम पुरी के कवियों, संतों, गायकों और नर्तकों की बात सुनेंगे, जयदेव के गीत गोविंद से लेकर चैतन्य महाप्रभु तक।

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