पुरी के कवि और संत, गीत गोविंद से चैतन्य तक
Episode 5 of 5 in जगन्नाथ: पुरी के जगत के नाथ.
Narrated with an AI voice.
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- DharmikStudio Originals
- Temple or tirtha
- Jagannath Temple, Puri
- Narration
- AI voice
In this episode
- जयदेव के गीत गोविंद ने पुरी की कला और संगीत को गहराई से आकार दिया।
- चैतन्य महाप्रभु ने पुरी आकर जगन्नाथ के प्रति अपना गहरा प्रेम दिखाया।
- सालबेग जैसे अलग-अलग पृष्ठभूमियों के कवियों ने भी जगन्नाथ को प्रेम से याद किया।
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नमस्कार। जगन्नाथ पर इस कथा-माला की यह आख़िरी बैठक है। आइए, साथ मिलकर एक शांत साँस लें। भीतर। और बाहर।
चार बैठकों में हमने सुना कि जगन्नाथ समुद्र से पवित्र लकड़ी बनकर पुरी कैसे आए, रथों पर कैसे निकलते हैं, उनके विग्रह कैसे नए होते हैं, और उनका भोजन सबमें कैसे बँटता है। आज हम उन लोगों को सुनेंगे जिन्होंने उनसे शब्दों में, संगीत में और नृत्य में प्रेम किया। पुरी हमेशा से गीतों की जगह रहा है।
शुरुआत करते हैं कवि जयदेव से।
जयदेव बारहवीं शताब्दी में हुए और उन्होंने संस्कृत में लिखा। उनकी महान रचना का नाम गीत गोविंद है, यानी गोविंद का गीत, और गोविंद कृष्ण का एक नाम है। यह कोई लंबी पोथी नहीं है। यह गीतों का एक संग्रह है, हर गीत का अपना भाव, राधा और कृष्ण के प्रेम के बारे में। वे मिलते हैं, बिछुड़ते हैं, राधा कृष्ण के लिए तरसती हैं, कृष्ण राधा के लिए, एक सखी दोनों के बीच संदेश ले जाती है, और अंत में वे फिर मिलते हैं।
गीत गोविंद की ध्वनि बहुत सुंदर है, और यह गाने के लिए लिखा गया, केवल पढ़ने के लिए नहीं। सदियों में यह पूरे भारत में फैला। केरल से मणिपुर तक, और राजस्थान से नेपाल तक इसने संगीत, चित्रकला और नृत्य को आकार दिया।
जयदेव का जन्म कहाँ हुआ? यहाँ भी, बहुत-सी पुरानी कथाओं की तरह, परंपराएँ अलग हैं। ओडिशा में लोग कहते हैं कि उनका जन्म पुरी से बहुत दूर नहीं, केंदुली शासन नाम के गाँव में हुआ। बंगाल में लोग बीरभूम के केंदुली गाँव का नाम लेते हैं। कुछ लोग उन्हें मिथिला से जोड़ते हैं। हम इनमें से कोई चुनाव नहीं करेंगे। हर जगह उन्हें अपना मानकर प्रेम करती है।
ओड़िया परंपरा उनकी पत्नी पद्मावती को भी याद करती है, एक नर्तकी के रूप में, जो उनके गीतों पर जगन्नाथ के सामने नृत्य करती थीं। इस कथा में कविता और नृत्य एक ही घर में, पुरी के प्रभु की सेवा में जुड़े थे।
गीत गोविंद के बारे में एक बहुत प्रिय कथा है, जो ओडिशा और बंगाल दोनों में सुनाई जाती है।
एक गीत में कृष्ण, राधा के लिए व्याकुल होकर, उनसे अपना चरण उनके सिर पर रखने को कहते हैं। कथा कहती है कि जयदेव झिझक गए। वे कैसे लिखें कि प्रभु इतना झुकें? उन्होंने क़लम रख दी और नहाने चले गए। लौटे तो वह पंक्ति उन्हीं की लिखावट में लिखी हुई थी। पद्मावती ने कहा कि आप ही घर आकर लिख गए थे, पर वे आए नहीं थे। यह कथा सुनाने वाले भक्त मानते हैं कि स्वयं प्रभु आकर वह पंक्ति पूरी कर गए।
हम इसे एक भक्ति-कथा की तरह, जैसी सुनाई जाती है, वैसी ही बता रहे हैं। इसकी सीख सीधी है। गीत गोविंद में प्रेम इतना बड़ा है कि स्वयं प्रभु भी उसके आगे झुकने को तैयार हैं।
गीत गोविंद जगन्नाथ मंदिर के रोज़ के जीवन में आ गया।
सदियों से इसके गीत प्रभु के सामने गाए जाते रहे हैं, ख़ासकर रात के आख़िरी अनुष्ठान में, उनके विश्राम से पहले। मंदिर में ओडिशा के एक गजपति राजा से जुड़ा एक पुराना शिलालेख बताया जाता है, जो कहता है कि प्रभु के सामने गीत गोविंद ही गाया जाए, उसकी जगह कोई और गीत नहीं। विद्वान इसके सही शब्दों पर चर्चा करते हैं, पर इसमें दिखने वाला प्रेम साफ़ है।
गीत गाए भी गए, और उन पर नृत्य भी हुआ। लंबे समय तक मंदिर में महारी कहलाने वाली नर्तकियाँ थीं, जो पूजा के रूप में जगन्नाथ के सामने नृत्य करती थीं। उन्हें मंदिर की सेविकाओं में गिना जाता था, और उनका नृत्य एक भेंट था। महारियों की जीवित परंपरा पिछले कुछ दशकों में समाप्त हो गई, और ओडिशा के बहुत-से लोग उनमें से अंतिम महारियों को बड़े आदर से याद करते हैं।
इनके साथ-साथ गोटीपुआ की परंपरा भी थी, जिसमें छोटे लड़के महारियों की शैली में, मंदिर के बाहर, उत्सवों में और गाँवों में नृत्य करते थे।
बीसवीं शताब्दी में ओडिशा के नर्तकों, गुरुओं और विद्वानों ने इन परंपराओं से, और पुराने मंदिरों की मूर्तिकला से प्रेरणा लेकर वह शास्त्रीय नृत्य गढ़ा जिसे आज हम ओडिसी कहते हैं। आज जब कोई ओडिसी नर्तकी गीत गोविंद का कोई गीत प्रस्तुत करती है, तो आप कुछ ऐसा देख रहे होते हैं जो जगन्नाथ की सेवा से उपजा है।
संगीत भी यहीं पला। ओडिशा की अपनी शास्त्रीय गायन शैली है, जिसे आज ओडिसी संगीत कहते हैं, पुराने रागों और ओड़िया कवियों के लिखे गीतों के साथ। और मंच से दूर, सबसे सादा संगीत हर जगह है। शाम को मंदिर के आसपास की गलियों में घरों और छोटी दुकानों से भजन सुनाई देते हैं, एक हारमोनियम, एक जोड़ी झाँझ, कुछ आवाज़ें। कोई प्रदर्शन नहीं कर रहा। लोग बस प्रभु के लिए गा रहे हैं।
अब हम एक ऐसे संत पर आते हैं जिनका जीवन पुरी से गहराई से जुड़ा है, चैतन्य महाप्रभु।
चैतन्य का जन्म 1486 में बंगाल के नवद्वीप में हुआ। युवावस्था में वे बहुत प्रतिभाशाली विद्वान थे। फिर, कथाएँ कहती हैं, कृष्ण-प्रेम ने उनका हृदय पलट दिया, और वे कीर्तन में रम गए, यानी दूसरों के साथ मिलकर प्रभु के नाम गाने में। उन्होंने संन्यास लिया, पुरी आए, और अपने जीवन के बाद के वर्ष वहीं बिताए।
परंपरा याद करती है कि चैतन्य मंदिर के सभा-मंडप में गरुड़ स्तंभ के पास खड़े होकर दूर से जगन्नाथ को निहारते रहते थे, भाव में डूबे, आँखों में आँसू लिए। उन्हें गीत गोविंद और दूसरे कवियों के गीत बहुत प्रिय थे, और वे अपने निकट साथियों के साथ देर रात तक उन्हें सुनते थे।
उनके जीवन के पुराने वृत्तांत बताते हैं कि रथ यात्रा में चैतन्य और उनके साथी बड़ दांड पर रथों के आगे टोलियों में, ढोल और झाँझ के साथ गाते और नाचते थे। उस समय के ओडिशा के राजा के मन में भी उनके लिए प्रेम जागा। चैतन्य और उनके अनुयायियों के कारण पुरी बंगाल और उससे आगे के भक्तों को बहुत प्रिय हो गया।
ओडिशा के अपने भी जगन्नाथ के बड़े कवि हुए, जिन्होंने ओड़िया में लिखा।
सोलहवीं शताब्दी में पंचसखा, यानी पाँच मित्र कहलाने वाले कवि-संतों ने लोगों की भाषा में लिखा। उनमें से एक, जगन्नाथ दास ने भागवत पुराण को ओड़िया छंदों में उतारा। उनका ओड़िया भागवत आज भी ओडिशा के गाँवों में, अक्सर इसी काम के लिए रखे गए छोटे भवन में, ज़ोर से पढ़ा जाता है। जो संस्कृत नहीं पढ़ सकते थे, उन्होंने कृष्ण की कथाएँ उनकी सरल, संगीत भरी ओड़िया से जानीं।
और एक कवि हैं सालबेग, जो सत्रहवीं शताब्दी में हुए। उनका जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ, और उनके मन में जगन्नाथ के लिए गहरा प्रेम जागा। प्रभु के लिए उनके भजन आज भी ओडिशा में गाए जाते हैं। एक स्थानीय परंपरा कहती है कि रथ यात्रा में रथ बड़ दांड पर उनकी समाधि के पास कुछ देर रुकते हैं, मानो प्रभु अपने भक्त के लिए ठहरते हों।
मुझे यह बहुत सुंदर लगता है कि पुरी ऐसे कवि को इतने प्रेम से याद करता है। जगन्नाथ का अर्थ है जगत के नाथ, और पुरी ने बहुत अलग-अलग जीवन वाले लोगों को गीतों के सहारे उनके पास आने दिया है।
समेटने से पहले एक पल रुकें। अगर जगन्नाथ या कृष्ण का कोई भजन आपको आता है, तो उसकी एक पंक्ति अभी धीरे से, अपने लिए गुनगुना लीजिए। न आता हो, तो बस बैठकर अपनी साँस सुनिए।
आइए, आज की बात समेटें।
जयदेव का गीत गोविंद, राधा और कृष्ण के गीतों की पुस्तक, हर रात जगन्नाथ के सामने गाया जाने लगा, और उस पर महारियों ने नृत्य किया, जिनकी परंपरा से ओडिसी नृत्य को आकार मिला। चैतन्य महाप्रभु बंगाल से पुरी आए, प्रभु के सामने रोए, और उनके रथों के आगे नाचे। जगन्नाथ दास ओड़िया में भागवत को लोगों तक लाए, और सालबेग के भजन आज भी गाए जाते हैं।
आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए। आज जिन कवियों और गायकों से हम मिले, उन सबने जो उनके पास था, वही अर्पित किया। इस हफ़्ते आप भी कुछ छोटा, जो सचमुच आपका हो, जैसे कोई गीत जो आपको आता है या अपनी लिखी कुछ पंक्तियाँ, अपने परिवार के पूजा के ढंग से, प्रेम से अर्पित कीजिए।
और इसी के साथ यह कथा-माला पूरी होती है। पाँच बैठकों में हमने समुद्र से आई एक लकड़ी, रथों से भरी एक सड़क, वन में पूजे गए वृक्ष, मिट्टी के बर्तनों वाली एक रसोई, और देर रात तक गाए गए गीतों की बात सुनी। हमारे साथ बैठने के लिए धन्यवाद।
अगर आप कभी पुरी जाएँ, तो धीरे-धीरे जाइए। बड़ दांड पर चलिए, सिंहद्वार पर एक पल रुकिए, और ऊपर शिखर की ओर देखिए। और अगर जा न सकें, तो परंपरा कहती है कि प्रभु स्वयं अपने लोगों से मिलने बाहर आते हैं। शायद वे आपसे वहीं मिलें, जहाँ आप हैं।
नमस्कार।