पांडव और बैल: गढ़वाल के पंच केदार

Episode 2 of 3 in केदारनाथ: हिमालय का धाम.

Narrated with an AI voice.

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By
DharmikStudio Originals
Temple or tirtha
Kedarnath Temple
Narration
AI voice

In this episode

  • यह गढ़वाल की स्थानीय परंपरा है, महाभारत का हिस्सा नहीं।
  • शिव बैल बने और उनके अंगों से पंच केदार बने।
  • ये मंदिर स्थानीय लोगों की अपनी स्मृति और खोज हैं।

Read along

नमस्कार। फिर से स्वागत है। आराम से बैठिए, और साँस को थोड़ा धीमा होने दीजिए।

पिछली बैठक में हमने शिव पुराण से केदारनाथ की कथा सुनी थी। नर और नारायण, जिन्होंने सबके कल्याण के लिए प्रार्थना की, और शिव, जो केदारेश्वर बनकर हिमालय में रहे। हमने थोड़े में एक दूसरी कथा भी सुनी थी, जो गढ़वाल की पहाड़ियाँ सुनाती हैं। आज हम उसी दूसरी कथा के पास बैठेंगे, पांडवों और बैल की कथा, और उन पाँच स्थानों तक चलेंगे जो इस कथा ने इन पहाड़ों को दिए।

पहले एक साफ़ बात, कि यह कथा आती कहाँ से है। यह गढ़वाल हिमालय की स्थानीय परंपरा है। इसे मंदिरों में, गाँवों में, और उन पुजारियों और परिवारों के मुँह से सुना जाता है जो पीढ़ियों से इन घाटियों में रहते आए हैं। यह महाभारत ग्रंथ का कोई अध्याय नहीं है। महाभारत पांडवों के बारे में बहुत कुछ बताता है, और उन्हें हिमालय तक भी लाता है, पर शिव के बैल बनने और पंच केदार की कथा पहाड़ों की अपनी कथा है। हम यह सीधे-सीधे इसलिए कह रहे हैं ताकि कथा को उसी रूप में प्रेम से थामें जैसी वह है, उस पर उससे ज़्यादा का दावा न करें जितना वह ख़ुद करती है।

पहले यह सुनते हैं कि महाभारत स्वयं क्या कहता है।

महाभारत में पांडव एक से ज़्यादा बार हिमालय आते हैं। वनवास के लंबे वर्षों में वन पर्व उन्हें उत्तर की ऊँची धरती की ओर ले जाता है, बदरी की ओर, वही स्थान जहाँ पिछली बैठक में हमने नर और नारायण को तप करते सुना था।

और महाकाव्य के बिल्कुल अंत में, महाप्रस्थानिक पर्व नाम के छोटे-से खंड में, भाई अपना राज्य छोड़ देते हैं। द्रौपदी के साथ वे उत्तर की ओर, पहाड़ों में, पैदल चल पड़ते हैं। रास्ते में एक-एक करके सब गिरते जाते हैं। युधिष्ठिर आगे बढ़ते रहते हैं, और उनके साथ एक कुत्ता चलता है जो उनके पीछे-पीछे आया था। पूरे महाभारत के सबसे शांत और सबसे मार्मिक प्रसंगों में से यह एक है।

तो पांडवों के हिमालय में चलने की बात बहुत पुरानी है, और ग्रंथ में है। उन्हीं पहाड़ों में रहने वाले गढ़वाल के लोगों ने इस स्मृति को और आगे बढ़ाया, अपनी घाटियों और अपने मंदिरों तक।

अब परंपरा की कथा।

परंपरा कहती है कि कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद पांडवों के मन पर बड़ा बोझ था। वे जीत गए थे, पर उन्होंने अपने ही सगे-संबंधियों और गुरुओं से युद्ध किया था, और बहुत लोग मारे गए थे। वे उस बोझ से मुक्त होना चाहते थे, और शिव की कृपा पाने निकल पड़े।

कथा कहती है कि शिव सहज ही मिलना नहीं चाहते थे। वे ऊँचे हिमालय में चले गए, और बुग्यालों में चरते पशुओं के बीच एक बैल का रूप लेकर रहे। पांडव पीछे-पीछे आए। भीम ने पशुओं के बीच उन्हें पहचान लिया। जैसे ही भीम बैल की ओर बढ़े, वह धरती में समाने लगा। जो भाग अभी ऊपर था, पीठ का कूबड़, भीम ने उसे थाम लिया। वही कूबड़ केदारनाथ में रह गया।

स्थानीय समझ में इसीलिए केदारनाथ के लिंग का आकार ऐसा है। यह एक उठी हुई, अनगढ़ शिला है, जिसे भक्त बैल की पीठ मानते हैं। यात्री उसे छूते हैं, उस पर माथा टिकाते हैं, और अपने हाथों से घी चढ़ाते हैं।

बैल पर ज़रा रुककर सोचिए। शिव के हर मंदिर के द्वार पर पहले से एक बैल बैठा होता है। वे नंदी हैं, शिव के साथी और वाहन, जो गर्भगृह की ओर मुख करके प्रतीक्षा करते हैं। तो जब पहाड़ कहते हैं कि शिव ने बैल का रूप लिया, तो वे एक ऐसा चित्र दे रहे हैं जिसे हर भक्त पहले से प्यार करता है। पहाड़ी परिवार रोज़ जिन पशुओं के बीच रहते थे, उन्हीं के बीच ईश्वर छिपे थे, आँखों के सामने।

परंपरा आगे कहती है कि उस रूप के बाक़ी अंग गढ़वाल में चार और स्थानों पर प्रकट हुए। भुजाएँ तुंगनाथ में। मुख रुद्रनाथ में। नाभि मध्यमहेश्वर में। जटाएँ कल्पेश्वर में। केदारनाथ को मिलाकर ये पंच केदार कहलाते हैं। और नेपाल के बहुत से परिवार जोड़ते हैं कि सिर काठमांडू के पशुपतिनाथ में प्रकट हुआ।

याद रखिए कि गाँव-गाँव और किताब-किताब में यह कथा थोड़ी अलग सुनाई जाती है। हमने वह रूप सुनाया है जो सबसे ज़्यादा सुना जाता है। इन कथाओं में न भाइयों के मुँह में शब्द डाले जाते हैं, न शिव के, और हम भी ऐसा नहीं करेंगे।

अब पाँचों स्थानों तक चलते हैं, एक-एक करके। कल्पना कीजिए कि वे पहाड़ों में दूर-दूर बिखरे हैं, कुछ एक-दूसरे से दिन भर की पैदल दूरी पर, हर एक अपने रास्ते के छोर पर।

पहला केदारनाथ है, कूबड़ का स्थान, मंदाकिनी घाटी के ऊपरी छोर पर। इसे हम पहली बैठक से जानते हैं। धूसर पत्थर का मंदिर, पत्थर के नंदी, और ठीक पीछे बर्फ़ीली चोटियाँ।

दूसरा तुंगनाथ है, भुजाओं का स्थान। यह चोपता के बुग्यालों के ऊपर एक ऊँची धार पर है, और लोग अक्सर इसे दुनिया का सबसे ऊँचा शिव मंदिर कहते हैं। बाक़ियों के मुक़ाबले यहाँ की चढ़ाई छोटी है, पर खड़ी है, बुरांश के जंगल और खुले घास के मैदानों से होकर। मंदिर के ऊपर चंद्रशिला नाम की चट्टानी चोटी है, और साफ़ सुबह वहाँ से पूरा हिमालय सामने दीवार की तरह खड़ा दिखता है।

तीसरा रुद्रनाथ है, मुख का स्थान। यहाँ प्राकृतिक शिला के मुख रूप की पूजा होती है, और रास्ता लंबा है, जंगलों और ऊँचे चरागाहों से होकर, बीच-बीच में छोटी झीलें। बहुत से यात्री कहते हैं कि पाँचों में रुद्रनाथ तक पहुँचना सबसे कठिन है, और वहाँ की शांति उनके साथ रह जाती है।

चौथा मध्यमहेश्वर है, नाभि का स्थान। नाम में ही मध्य शब्द है, यानी बीच। रास्ता राँसी गाँव से जंगलों और छोटी बस्तियों से होता हुआ एक हरे बुग्याल तक पहुँचता है, जिसके किनारे मंदिर है।

पाँचवाँ कल्पेश्वर है, जटाओं का स्थान, उर्गम घाटी में। कहा जाता है कि यह बाक़ियों की तरह बंद नहीं होता, पूरे साल खुला रहता है, और यहाँ चट्टान में बने एक छोटे-से स्थान में पूजा होती है।

इन पाँचों स्थानों का साल भर का चलन बहुत सुंदर है। केदारनाथ की तरह इनमें से ज़्यादातर बर्फ़ आने पर बंद हो जाते हैं। उनकी पूजा नीचे गाँवों के शीतकालीन स्थानों में चली जाती है। केदारनाथ और मध्यमहेश्वर के लिए वह स्थान ऊखीमठ है। तुंगनाथ के लिए मक्कूमठ, और रुद्रनाथ के लिए गोपेश्वर। वसंत लौटता है तो उत्सव-मूर्तियाँ पालकी में, ढोल-बाजे के साथ, गाँव वालों के साथ-साथ चलते हुए, फिर पहाड़ पर ले जाई जाती हैं।

तो पंच केदार पाँच मंदिर हैं, और साथ ही पूरे इलाक़े की एक लय भी हैं। गर्मी में ऊपर, सर्दी में नीचे, ठीक वैसे ही जैसे इन घाटियों के परिवार और उनके पशु हमेशा से करते आए हैं।

पांडवों की कथा मंदिरों के बाहर भी जीवित है। गढ़वाल के बहुत से गाँवों में पांडव लीला होती है, एक पारंपरिक आयोजन जिसमें कई दिनों तक ढोल के साथ पांडवों की कथा गाई और नाची जाती है, और पूरा गाँव उसमें भाग लेता है। यह याद दिलाता है कि यह परंपरा पहाड़ के लोगों की अपनी है। उनकी स्मृति, उनके अपने ढंग से।

अगर यह कथा ग्रंथ में नहीं है, तो इसका महत्व क्या है?

इसका महत्व यह है कि इससे पता चलता है कि इन पहाड़ों के लोग अपनी धरती को कैसे देखते थे। उनके लिए पहाड़ ख़ाली नहीं थे। हर धार, हर बुग्याल में शिव का कुछ अंश हो सकता था। पांडवों की खोज उनकी अपनी खोज बन गई, और पाँचों मंदिर ऐसे स्थान बन गए जहाँ कोई भी आकर कृपा खोज सकता है, जैसे कभी वे भाई खोजने आए थे।

और इस कथा के भीतर एक कोमल सीख भी है। पांडव बड़े वीर थे। उन्होंने अपने युग का सबसे बड़ा युद्ध जीता था। फिर भी कृपा उन्हें आसानी से नहीं मिली। उन्हें चलना पड़ा, खोजना पड़ा, और तब भी चलते रहना पड़ा जब शिव वहाँ नहीं मिले जहाँ उन्होंने सोचा था। अपनी प्रार्थनाओं में हम में से बहुत लोग कभी-कभी ऐसा ही महसूस करते हैं।

कुछ यात्री एक ही मौसम में पाँचों केदारों की यात्रा करने की कोशिश करते हैं। यह ऊँचाई पर लंबी और कठिन पैदल यात्रा है, और मौसम जल्दी बदलता है। अगर कभी आपका मन हो, तो धीरे चलिए, स्थानीय जानकारों के साथ चलिए, और अगर दिल, फेफड़े या कोई और बीमारी है, या आप बुज़ुर्ग हैं या गर्भवती हैं, तो पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर बात कीजिए। कोई जल्दी नहीं है। पहाड़ बहुत समय से प्रतीक्षा कर रहे हैं, आपकी भी करेंगे।

आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए। जब कोई चीज़ जिसे आप खोज रहे हैं आसानी से न मिले, तो बुग्यालों में पांडवों को याद कीजिए। उन्होंने खोजना नहीं छोड़ा। इस सप्ताह कोई एक छोटी साधना उन दिनों भी जारी रखिए जब वह ख़ाली-सी लगे। अक्सर वही दिन सबसे ज़्यादा मायने रखते हैं।

अगली बैठक में हम दूर दक्षिण के एक युवा आचार्य से मिलेंगे, जो परंपरा के अनुसार पैदल चलकर इन बर्फ़ों तक आए: आदि शंकराचार्य, और केदारनाथ से उनका गहरा नाता।

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