दो लिंग: एक रेत का, एक उत्तर से आया

Episode 2 of 5 in रामेश्वरम: जहाँ राम ने शिव को पूजा.

Narrated with an AI voice.

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By
DharmikStudio Originals
Temple or tirtha
Ramanathaswamy Temple, Rameswaram
Narration
AI voice

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नमस्कार, फिर से स्वागत है। आइए, एक धीमी साँस के साथ बैठ जाएँ। भीतर। और बाहर।

पिछली बैठक में हमने सुना कि राम ने रामेश्वरम के तट पर शिव की पूजा की, और अलग-अलग कथाएँ उस पूजा को अलग-अलग समय पर रखती हैं। आज हम कथा के उस हिस्से के पास रुकेंगे जिसने स्वयं मंदिर को आकार दिया। मंदिर के बीच दो लिंग हैं। परंपरा कहती है कि एक सीता जी ने तट की रेत से बनाया। दूसरा हनुमान जी सुदूर उत्तर से लाए। आइए सुनें यह कैसे हुआ, और फिर देखें कि आज एक यात्री वहाँ क्या देखता है।

पहले लिंग के बारे में एक बात। लिंग शिव का निराकार रूप है, जिसमें मुख या अंग नहीं होते, प्रायः एक चिकना गोल पत्थर जो एक आधार से उठता है। मिट्टी, गीली मिट्टी या रेत से हाथ से बनाए गए लिंग को पार्थिव लिंग कहते हैं, यानी धरती से बना। भारत के कई हिस्सों में परिवार आज भी घर में पूजा के लिए मिट्टी के छोटे लिंग बनाते हैं और पूजा के बाद उन्हें जल में विसर्जित कर देते हैं। यह रीति हर क्षेत्र और हर परिवार में अलग-अलग है।

तो जब परंपरा कहती है कि सीता जी ने रेत से लिंग बनाया, तो वह ऐसी बात बता रही है जो बहुत से श्रोताओं ने घर में देखी है, या अपने हाथों से की है। उसी जगह की मिट्टी से, उसी पल बनाए लिंग की पूजा बहुत पुरानी और बहुत प्रिय है।

आज हमारा मुख्य स्रोत सेतु माहात्म्य है, स्कन्द पुराण का वह भाग जो सेतु और उसके आसपास के पवित्र स्थानों की महिमा गाता है। मंदिर की अपनी परंपरा इसी के बहुत पास चलती है। सुनते हुए याद रखिए कि दूसरे ग्रंथ इसे अलग ढंग से कहते हैं, उन तक भी हम आएँगे।

सेतु माहात्म्य में पूजा युद्ध के बाद होती है। राम जीत चुके हैं, सीता जी फिर उनके साथ हैं। फिर भी इस कथा में राम सीधे घर नहीं जाते। रावण ने भले बड़ा अधर्म किया था, पर वह विद्वान था, और ऋषियों के कुल में जन्मा था, ऋषि विश्रवा का पुत्र। इस कथा में राम उसकी मृत्यु के दोष से मुक्त होना चाहते हैं, और ऋषि उन्हें इस तट पर शिवलिंग की स्थापना और पूजा की सलाह देते हैं।

तो हनुमान जी को लिंग लाने उत्तर भेजा जाता है। यहीं से कथाएँ अलग होने लगती हैं। कोई कहता है वे कैलास गए, कोई कहता है हिमालय, और मंदिर में प्रचलित नाम काशी लिंगम काशी की ओर संकेत करता है। हम इनमें से किसी को नहीं चुनेंगे। सब इस पर सहमत हैं कि यात्रा लंबी थी, और पूजा का शुभ मुहूर्त तय हो चुका था।

ऐसी यात्रा के लिए हनुमान जी ही हैं। रामायण में वे पहले ही समुद्र लाँघकर लंका में सीता जी को खोज चुके हैं, और युद्ध में लक्ष्मण जी के लिए हिमालय से औषधि ला चुके हैं। इसलिए सुनने वाले को आश्चर्य नहीं होता कि उन्हें भेजा गया। जब कुछ बहुत दूर से, जल्दी लाना हो, तो हनुमान जी को ही भेजा जाता है।

मुहूर्त पास आ गया। हनुमान जी अभी नहीं लौटे थे। तब, कथा कहती है, सीता जी तट पर बैठीं और गीली रेत से अपने हाथों एक लिंग बनाया। राम ने उसे स्थापित किया और तय समय पर उसकी पूजा की। परंपरा कहती है कि रेत का वही लिंग रामलिंगम है, मंदिर का मुख्य लिंग, सबसे भीतर के गर्भगृह में।

फिर हनुमान जी पहुँचे, बड़े परिश्रम से लाया लिंग लिए हुए, और देखा कि पूजा तो हो चुकी है। यहाँ कथा बहुत मानवीय हो जाती है। मंदिर में और बहुत से घरों में सुनाई जाने वाली एक कथा में हनुमान जी को दुख होता है, और वे अपने लिंग के लिए जगह बनाने को अपनी पूँछ से रेत के लिंग को हटाने का प्रयास करते हैं। रेत का लिंग नहीं हिलता। हर कथा में यह हिस्सा नहीं है, और जिनमें है, वे इसे अलग-अलग ढंग से कहती हैं।

आगे जो होता है, वही इस कथा का हृदय है। राम हनुमान जी को सांत्वना देते हैं। वे हनुमान जी का लिंग पहले लिंग के पास स्थापित करते हैं, और परंपरा कहती है कि वे कहते हैं कि हर दिन पहले इसी की पूजा हो, रामलिंगम से भी पहले। वह दूसरा लिंग विश्वलिंगम है, विश्व के स्वामी का लिंग, जिसे काशी लिंगम भी कहते हैं। और आज तक मंदिर यही क्रम निभाता है। पहली पूजा विश्वलिंगम की होती है।

सोचिए यह कथा किसका मान रखती है। सीता जी का लिंग कुछ ही पलों में, जो पास था उसी से बना। हनुमान जी का लिंग पूरे देश की लंबाई पार करके आया। दोनों स्वीकार हुए। एक मंदिर के केंद्र में है। दूसरे की पूजा पहले होती है। कोई भी अर्पण दूसरे को पीछे नहीं धकेलता।

इसमें यह भी है कि राम अपनी सेवा करने वालों से कैसा व्यवहार करते हैं। हनुमान जी के दुख को टाला नहीं जाता। उसे देखा जाता है, और सम्मान से उसका उत्तर दिया जाता है, ऐसे कि सदियों बाद भी वह मंदिर की रोज़ की पूजा में दिखता है। एक प्रिय भक्त से किया वादा, हर सुबह निभाया जाता है।

अब गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस की ओर चलें, क्योंकि बहुत से श्रोता इसी कथा के साथ बड़े हुए हैं। मानस में हनुमान जी की कोई यात्रा नहीं, कोई रेत का लिंग नहीं। पूजा सेतु बनने से पहले होती है। राम स्वयं तट पर लिंग की स्थापना करते हैं, विधि से पूजा करते हैं, और उस स्थान का नाम रामेश्वरम पड़ता है।

फिर तुलसीदास राम से शिव के बारे में कुछ बातें कहलवाते हैं, जो पूरे उत्तर भारत में प्रिय हैं। लंका काण्ड में राम कहते हैं, भावार्थ में, कि जो स्वयं को राम का भक्त कहे पर शिव का विरोध करे, वह सपने में भी राम को नहीं पाता। राम रामेश्वरम आकर दर्शन करने के पुण्य की भी बात करते हैं। तुलसीदास के लिए यह तट वह जगह है जहाँ राम-भक्ति और शिव-भक्ति एक ही राह दिखाई गई हैं।

संस्कृत में और भारत की अनेक भाषाओं में दूसरी रामायणें भी यह दृश्य अपने-अपने ढंग से कहती हैं, और कुछ इसे छोड़ भी देती हैं। मंदिर सेतु माहात्म्य की कथा सँजोता है। बहुत से घर मानस की कथा सँजोते हैं। दोनों सदियों से गाई और प्रेम से सुनी गई हैं। हमें यह तय करने की ज़रूरत नहीं कि कौन पहले है, और हम किसी एक को असली कथा नहीं कहेंगे।

सुनने वाले के लिए यह एक उपहार भी हो सकता है। दो कथाएँ, हर एक का अपना भाव। मानस में राम बड़े काम से पहले प्रार्थना करते हैं, पूरी सेना प्रतीक्षा में है और समुद्र अभी पार नहीं हुआ। सेतु माहात्म्य में वे उसके बाद प्रार्थना करते हैं, सीता जी साथ हैं और युद्ध पीछे छूट चुका है। ये दोनों घड़ियाँ हम में से बहुतों ने अपने जीवन में जानी हैं।

तो आज एक यात्री वहाँ क्या देखता है? गलियारों की लंबी राह के बाद आप रामनाथस्वामी के भीतरी गर्भगृह तक पहुँचते हैं, जहाँ रामलिंगम की पूजा होती है। उसके पास विश्वलिंगम का मंदिर है, जहाँ से दिन की पूजा शुरू होती है। मंदिर की देवी, शिव की शक्ति, का अपना मंदिर है। यहाँ वे पर्वतवर्धिनी के नाम से जानी जाती हैं।

मंदिर में सुबह-सुबह एक छोटे स्फटिक लिंग की पूजा भी होती है। बहुत से यात्री इसके लिए बहुत जल्दी आते हैं। समय और नियम बदलते रहते हैं, इसलिए दूसरों की सुनी बातों पर नहीं, मंदिर में ही पूछ लीजिए। जो भी पूजा आप देखें, भीड़ होगी, और कतार आगे बढ़ते हुए दर्शन शायद एक पल का ही हो। यह स्वाभाविक है। कतार में खड़े-खड़े अपने शब्दों में एक छोटी प्रार्थना मन में तैयार कर लीजिए, ताकि पहुँचने पर कुछ पल भी भरे-पूरे लगें।

जब आप रामलिंगम के सामने खड़े हों, तो शायद सीता जी याद आएँ, तट पर, थोड़ी जल्दी में, पास में समुद्र, रेत से काम चलाती हुईं। पूरी राम-कथा के सबसे कोमल चित्रों में से एक। लगभग कुछ नहीं से बने एक अर्पण के चारों ओर एक महान मंदिर खड़ा हो गया।

आइए, आज की बात समेट लें।

सेतु माहात्म्य और मंदिर की परंपरा में राम युद्ध के बाद इस तट पर शिव की पूजा करना चाहते हैं। हनुमान जी लिंग लेने उत्तर जाते हैं। मुहूर्त पास आने पर सीता जी रेत का लिंग बनाती हैं, और राम उसकी पूजा करते हैं। वह रामलिंगम है। हनुमान जी लौटते हैं, तो उनका लिंग उसके पास स्थापित होता है और हर दिन पहली पूजा उसी की होती है। वह विश्वलिंगम या काशी लिंगम है। रामचरितमानस में पूजा सेतु से पहले है, रेत का लिंग नहीं है, और राम बड़े प्रेम से शिव की बात करते हैं। कथाएँ अलग हैं, और मंदिर और भारत के घर उन्हें साथ-साथ सँजोते हैं, जैसे मंदिर अपने दो लिंग।

आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए। सीता जी ने जो पास था वह अर्पित किया, हनुमान जी ने अपना लंबा परिश्रम अर्पित किया, और दोनों का मान हुआ। इस सप्ताह जब आप कुछ अर्पित करें, एक प्रार्थना, भोजन, कोई काम, तो उसके भव्य होने की राह मत देखिए। जो है, वही अर्पित कीजिए। और जब किसी और का अर्पण देर से पहुँचे, तो उसका मान रखने का रास्ता खोजिए।

अगली बैठक में हम जल की ओर चलेंगे। मन ही मन अग्नि तीर्थम पर स्नान करेंगे, और मंदिर के तीर्थम में एक कुएँ से दूसरे कुएँ तक चलेंगे।

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