तीर्थम: समुद्र और मंदिर के कुओं में स्नान
Episode 3 of 5 in रामेश्वरम: जहाँ राम ने शिव को पूजा.
Narrated with an AI voice.
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- DharmikStudio Originals
- Temple or tirtha
- Ramanathaswamy Temple, Rameswaram
- Narration
- AI voice
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नमस्कार। आइए, साथ मिलकर एक धीमी साँस से शुरू करें। भीतर। और बाहर।
पिछली बैठक में हम रामेश्वरम के दो लिंगों के सामने खड़े थे, एक जो सीता जी ने रेत से बनाया और एक जो हनुमान जी उत्तर से लाए। आज हम जल की ओर चलते हैं। बहुत से यात्रियों के लिए रामेश्वरम सबसे पहले स्नान का तीर्थ है, भोर में समुद्र में, और फिर मंदिर के भीतर के कुओं पर। आइए उस दिन को धीरे-धीरे साथ जिएँ, और यह भी बात करें कि इसे सावधानी से कैसे करें।
आज जो शब्द सबसे ज़्यादा आएगा, वह है तीर्थम। यह संस्कृत के तीर्थ का तमिल रूप है। तीर्थ यानी पवित्र जल, और तीर्थयात्रा का स्थान भी। यह शब्द जिस धातु से आता है उसका अर्थ है पार करना, तो तीर्थ वह जगह है जहाँ से पार उतरते हैं, जैसे नदी का घाट। रामेश्वरम में, जहाँ राम की सेना के समुद्र पार करने की याद है, यह शब्द ख़ास तौर पर अपना-सा लगता है।
भारत की पुरानी तीर्थ-परंपरा में तीर्थ केवल नहाने की जगह नहीं था। वह लंबी यात्रा के बाद, अक्सर पैदल, पहुँचने और रुकने की जगह था। लोग नहाने, प्रार्थना करने, अपने पितरों को याद करने और दूर-दूर से आए दूसरे यात्रियों से मिलने आते थे। रामेश्वरम बहुत समय से ऐसा ही स्थान रहा है, और किसी भी सुबह पानी के किनारे आपको कई भाषाएँ सुनाई देंगी।
दिन प्रायः अग्नि तीर्थम से शुरू होता है। यह स्वयं समुद्र है, शहर के पूर्वी ओर, मंदिर के पूर्वी द्वार के ठीक बाहर। यहाँ पानी आमतौर पर उथला और शांत रहता है, और पहली रोशनी में आप परिवारों को घुटनों या कमर तक पानी में खड़े देखेंगे, डुबकी लगाते, सिर पर पानी डालते, और उगते सूरज और मंदिर की ओर हाथ जोड़ते।
एक स्थानीय परंपरा अग्नि तीर्थम नाम को अग्नि देव से, और युद्ध के बाद सीता जी की अग्नि-परीक्षा की कथा से जोड़ती है। दूसरी कथाएँ नाम को अलग ढंग से समझाती हैं। हम इसे वैसे ही सुना रहे हैं जैसे यह नगर कहता है, और परंपराएँ अलग-अलग हैं।
समुद्र के लिए कुछ कोमल सुझाव। उथले पानी में ही रहिए, और बच्चों को हाथ की पहुँच में रखिए। लाइफ़गार्ड और स्थानीय लोगों की बात सुनिए, वे जानते हैं कि उस दिन पानी कैसा है। साबुन, शैम्पू या प्लास्टिक समुद्र में मत छोड़िए। और जाते समय अपने गीले कपड़े साथ ले जाइए। यह तट नगर के लोग सँभालते हैं, उसे साफ़ छोड़ना अच्छा है।
अगर समुद्र में लहरें ऊँची हों, या ज्वार से पानी गहरा हो गया हो, तो किनारे पर खड़े होकर अंजलि में थोड़ा पानी लेकर सिर पर डाल लेना भी पूरी तरह ठीक है। बहुत से बुज़ुर्ग ठीक ऐसा ही करते हैं। समुद्र वही समुद्र है।
समुद्र के बाद बहुत से यात्री गीले कपड़ों में ही मंदिर के भीतर जाते हैं, भीतर के तीर्थम पर स्नान करने। मंदिर का अपना प्रकाशित इतिहास मंदिर की दीवारों के भीतर बाईस तीर्थम गिनता है। कुछ कुएँ हैं, कुछ छोटे कुंड। हर एक का अपना नाम है। कुछ देवताओं के नाम पर हैं, जैसे महालक्ष्मी तीर्थम। कुछ भारत भर के स्थानों और नदियों के नाम पर, जैसे गंधमादन, गंगा, यमुना और गया। एक से दूसरे तक चलते हुए लगता है मानो पूरा देश एक आँगन में सिमट आया हो।
ये कुएँ मंदिर के गलियारों और आँगनों में फैले हैं, इसलिए स्नान एक यात्रा भी है। आप एक तय राह पर एक से दूसरे तक जाते हैं, कभी लोगों की कतार में, कभी किसी जानकार के साथ छोटे समूह में। इसमें समय लगता है, भीड़ के दिन अक्सर एक घंटा या उससे ज़्यादा, इसलिए बिना जल्दी के निकलना अच्छा है।
स्नान देखने में सरल है और करने में मन को छू जाता है। हर कुएँ पर मंदिर का एक सेवक बाल्टी नीचे डालता है, पानी खींचता है और आपके सिर और कंधों पर डाल देता है। फिर आप अगले पर जाते हैं। परिवार साथ चलते हैं, हाथ पकड़े, कभी ठंडे पानी पर हँसते हुए, कभी बिल्कुल चुप। सामान्य क्रम में आख़िरी कुआँ अक्सर कोडि तीर्थम होता है, और यात्री बताते हैं कि वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते वे आसपास की भीड़ भूल चुके होते हैं।
स्कन्द पुराण का सेतु माहात्म्य इन जलों और सेतु क्षेत्र के दूसरे पवित्र स्थानों का विस्तार से वर्णन करता है, और इनमें स्नान की महिमा गाता है। पुराण की महिमा पुराण पर छोड़ते हैं। हम आपको वह बता सकते हैं जो यात्री कहते हैं, कि धीरे-धीरे धुलने और तैयार होने का एक भाव मन में आता है।
कुछ यात्री चुपचाप स्नान करते हैं। कुछ हर कुएँ पर मन ही मन शिव या राम का नाम लेते हैं। कुछ बस कुओं को गिनते चलते हैं, ताकि कोई छूट न जाए। कोई एक सही तरीका नहीं है। अगर आप हर तीर्थम पर कोई नाम या छोटी प्रार्थना कहना चाहें, तो धीरे से, अपने शब्दों में कहिए, और बाकी जल पर छोड़ दीजिए।
अब कुछ काम की बातें, आदर के साथ, क्योंकि यह शरीर से भी मेहनत का दिन है और हर उम्र के लोग इसमें शामिल होते हैं।
हो सके तो जल्दी जाइए। दिन चढ़ने के साथ कतारें लंबी होती हैं, और सुबह ठंडक रहती है। ऐसे मर्यादित कपड़े पहनिए जिनके पूरी तरह भीगने से आपको परेशानी न हो, और सूखे कपड़ों का पूरा जोड़ा और गीले कपड़ों के लिए एक थैला साथ रखिए। बहुत से यात्री स्नान के बाद सूखे कपड़े पहनकर लिंगों के दर्शन के लिए जाते हैं। मंदिर के कर्मचारी जो बताएँ वही कीजिए, क्योंकि भीतर के नियम और रास्ते बदल सकते हैं।
गलियारों का फ़र्श पत्थर का है, और सैकड़ों गीले पैरों के बाद फिसलन भरा हो सकता है। धीरे चलिए। बुज़ुर्गों और बच्चों का हाथ पकड़िए। घुटने या कमर में तकलीफ़ हो तो आराम से चलिए और ज़रूरत हो तो रुक जाइए।
और एक ज़रूरी बात। अगर आप अस्वस्थ हैं, गर्भवती हैं, बुज़ुर्ग हैं, ठंड से परेशानी होती है, या ऐसी दवा ले रहे हैं जिसमें ठंडा पानी ठीक न हो, तो अपने डॉक्टर की सलाह मानिए। हर कुएँ पर नहाना ज़रूरी नहीं है। बहुत से लोग सिर पर बस थोड़ा-सा जल लेते हैं, या कुछ बूँदें छिड़क लेते हैं, और यह पूरा और सच्चा अर्पण है। किसी भी पल असहज लगे तो रुक जाइए।
स्नान के बाद अच्छी तरह पोंछिए और जितनी जल्दी हो सके कपड़े बदल लीजिए, ख़ासकर अगर समुद्र की हवा चल रही हो। थोड़ा पानी पीजिए, कुछ हल्का खाइए, और दर्शन की कतार में लगने से पहले कुछ मिनट आराम कीजिए। शांत और आराम से खड़ा यात्री, थके और काँपते यात्री से ज़्यादा सहजता से प्रार्थना कर पाता है।
मंदिर के बाहर भी द्वीप पर और जल हैं। राम तीर्थम और लक्ष्मण तीर्थम द्वीप पर कुंड हैं, और सेतु माहात्म्य इस क्षेत्र के और भी बहुत से पवित्र स्थानों के नाम लेता है। सबको देखना ज़रूरी नहीं। बहुत से यात्री कुछ चुन लेते हैं और आराम से जाते हैं, इतना काफ़ी है। कुछ परिवार समुद्र पर अपने पितरों के लिए कर्म करने भी आते हैं, अपनी रीति जानने वाले पुरोहितों के साथ। ये रीतियाँ हर समुदाय और परिवार में अलग हैं, इनके लिए घर के बड़े और आपके अपने पुरोहित ही सही मार्गदर्शक हैं।
सोचने लायक है कि भारतीय पूजा में जल इतना केंद्र में क्यों है। जल देवता को अर्पित होता है, और जल पूजा करने वाले पर डाला जाता है। पूजा से पहले जगह को तैयार करने के लिए जल छिड़का जाता है। बहुत से घरों में दिन की शुरुआत अर्घ्य से होती है, लोटे से सूर्य को जल अर्पित करके। रामेश्वरम में समुद्र, कुएँ और लिंग सब जल से जुड़े हैं, उत्तर से लाए गंगाजल से लेकर अग्नि तीर्थम की लहरों तक।
आइए, अभी जहाँ हैं, जल के साथ एक छोटा पल बिताएँ। पास में पानी का गिलास हो तो एक पल उसे हाथ में लीजिए। न हो, तो बस कल्पना कीजिए। सोचिए यह पानी कहाँ से आया है, बारिश से, नदी से या कुएँ से, और किन लोगों ने इसे आप तक पहुँचाया। अपने शब्दों में चुपचाप धन्यवाद कहिए।
आइए, आज की बात समेट लें।
तीर्थम पवित्र जल है, पार उतरने की जगह। रामेश्वरम में दिन अक्सर पूर्वी द्वार के बाहर अग्नि तीर्थम पर समुद्र-स्नान से शुरू होता है। फिर यात्री मंदिर के भीतर के तीर्थम पर स्नान करते हैं, मंदिर की अपनी गिनती से बाईस, हर एक का अपना नाम, अक्सर कोडि तीर्थम पर पूरा होता हुआ। जल्दी जाइए, सूखे कपड़े साथ रखिए, गीले पत्थर पर धीरे चलिए, तट साफ़ रखिए, और अस्वस्थ हों तो डॉक्टर की सलाह मानिए। सिर पर कुछ बूँदें भी पूरा अर्पण है।
आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए। इस सप्ताह सुबह पानी का पहला गिलास पीने से पहले एक पल रुकिए और उसके लिए धन्यवाद कहिए। जहाँ आप हैं, वहीं एक छोटा-सा रोज़ का तीर्थम।
अगली बैठक में हम सूखे कपड़े पहनकर मंदिर के लंबे गलियारों में चलेंगे, और उन सेतुपति शासकों से मिलेंगे जिन्होंने आज यात्रियों को दिखने वाला बहुत कुछ बनवाया।