भोर से पहले की भस्म, भस्म आरती को समझें
Episode 3 of 5 in उज्जैन: महाकाल का दरबार.
Narrated with an AI voice.
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- 13 min
- By
- DharmikStudio Originals
- Temple or tirtha
- Mahakaleshwar Temple, Ujjain
- Narration
- AI voice
In this episode
- भस्म आरती महाकालेश्वर में भोर से पहले होने वाली दिन की पहली पूजा है।
- भस्म पवित्र है और यह याद दिलाती है कि समय के साथ सब कुछ बदल जाता है।
- आरती में शामिल होने के लिए मंदिर समिति के नियमों और स्वास्थ्य का ध्यान रखें।
Read along
नमस्कार। आइए, इस बैठक की शुरुआत सुबह की शांति में करें। हो सके तो एक पल के लिए आँखें बंद कीजिए, और सूरज निकलने से पहले की नगरी की कल्पना कीजिए।
पहली दो बैठकों में हमने वे कथाएँ सुनीं जो शिव पुराण अवंती के बारे में कहता है, और महाकाल नाम के साथ कुछ देर बैठे, उन महान प्रभु के साथ जो समय से परे हैं। आज हम मंदिर में उस पहर चलेंगे जब नगरी का बड़ा हिस्सा अभी सो रहा होता है, उस पूजा को समझने के लिए जिसके लिए महाकालेश्वर सबसे अधिक जाना जाता है, भस्म आरती।
पहले शब्दों की बात। आरती यानी दीपों से पूजा। पुजारी भगवान के सामने दीप घुमाते हैं, उपस्थित लोग गाते या जप करते हैं, और अंत में भक्त अक्सर लौ पर हाथ फेरकर अपनी आँखों से लगाते हैं। भस्म यानी पवित्र राख। तो भस्म आरती महाकालेश्वर की वह सुबह की पूजा है जिसमें लिंग पर भस्म अर्पित की जाती है, और उसके बाद दीपों से आरती होती है।
यह मंदिर में दिन की पहली पूजा है, और भोर से पहले होती है। दिन भर और भी आरतियाँ होती हैं, और शाम को मंदिर फिर भर जाता है। पर सबसे अधिक बात भस्म आरती की होती है, और बहुत-से भक्त एक बार देख लेने के बाद बरसों तक उसे मन में सँजोए रखते हैं।
इसमें होता क्या है? हम इसे सरल शब्दों में बताएँगे, जैसा मंदिर समिति और भक्त बताते हैं। पूरे विवरण के लिए समिति का अपना विवरण पढ़िए।
मंदिर में दिन की शुरुआत लिंग के स्नान से होती है। इसे अभिषेक कहते हैं, और यह जल और दूध, दही जैसी सामग्री से, पुजारियों के जप के साथ होता है। फिर लिंग का श्रृंगार होता है। इसके बाद भस्म अर्पित की जाती है, और फिर स्वयं आरती होती है, बड़े दीपों के साथ, शंख की ध्वनि और डमरू की थाप के साथ। डमरू वह छोटा-सा हाथ का ढोल है जो शिव से जुड़ा है।
महाकालेश्वर का श्रृंगार भक्तों को बहुत प्रिय है। फूल, चंदन, वस्त्र और आभूषणों से पुजारी लिंग को सजाते हैं, और बहुत बार उस पर एक सौम्य मुख-सा उभार देते हैं, आँखें, माथे पर तिलक, कभी मुकुट भी। यह श्रृंगार दिन-दिन और त्योहार-त्योहार पर बदलता है। जो भक्त यात्रा नहीं कर सकते, उनमें से बहुत-से हर सुबह उस दिन के श्रृंगार की तस्वीर देखते हैं, जैसे कोई घर के किसी बड़े का हाल पूछ ले।
जो लोग शामिल होते हैं, वे अक्सर पहले आवाज़ की बात करते हैं। जप उठता और थमता है। घंटियाँ और ढोल पूरी जगह भर देते हैं। और फिर जब दीप उठाए जाते हैं, बहुत-से लोग चुप हो जाते हैं, और बस घंटियों की गूँज सुनाई देती है।
पहले के समय में भस्म कहाँ से आती थी, इसके बारे में पुरानी कहानियाँ हैं, और लोग उन्हें अलग-अलग ढंग से सुनाते हैं। पंक्ति में जो कहा जाता है, उसे हम नहीं दोहराएँगे। आज पूजा के लिए भस्म कैसे तैयार होती है, यह मंदिर समिति बताती है, और उसी विवरण पर भरोसा करना ठीक है।
अब प्रश्न, भस्म ही क्यों?
अगर आपने शिव के चित्र देखे हैं, तो ध्यान दिया होगा कि उनके शरीर पर अक्सर भस्म लगी दिखाई जाती है, और माथे पर उसकी तीन आड़ी रेखाएँ होती हैं। इस चिह्न को त्रिपुंड कहते हैं। शिव परंपरा में भस्म सबसे पवित्र वस्तुओं में से है, और शिव पुराण में ऐसे अंश हैं जो भक्तों के भस्म और त्रिपुंड धारण करने की प्रशंसा करते हैं। इसीलिए बहुत-से शैव भक्त रोज़ माथे पर भस्म लगाते हैं।
भस्म का अर्थ क्या है? अलग-अलग आचार्य इसे अलग-अलग ढंग से समझाते हैं, और हम वह अर्थ बताएँगे जो भक्त सबसे अधिक बताते हैं। भस्म वह है जो आग के अपना काम पूरा कर लेने के बाद बचती है। लकड़ी, कपड़ा, जो कुछ भी जलता है, सब इसी नरम, धूसर चूर्ण में बदल जाता है। इसे फिर से जलाया नहीं जा सकता। यह सरल है, और हर जगह एक जैसी है।
तो जब काल से परे महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है, तब भक्त अक्सर उसमें एक शांत याद सुनते हैं। जो कुछ हम बनाते और थामे रहते हैं, वह समय के साथ बदलेगा और बीत जाएगा। जब वह सब चला जाए, तब जो बचता है, शिव उसी के प्रतीक हैं। यह कोई उदास विचार नहीं है। भस्म आरती से लौटने वाले लोग अक्सर मन में हल्कापन महसूस करते हैं। जो ज़रूरी है उसे याद रखने और बाकी को छोड़ देने में एक राहत है।
हम इसे पहली बैठक की कथा से भी जोड़ सकते हैं। पुराण कहता है कि जब शिव अवंती में महाकाल रूप में प्रकट हुए, तो दूषण असुर भस्म हो गया। कुछ भक्त कथा के उस क्षण और यहाँ हर सुबह चढ़ने वाली भस्म में एक संबंध देखते हैं। यह भक्ति से निकला एक सुंदर अर्थ है, पर पुराण स्वयं यह संबंध नहीं जोड़ता।
अब कुछ व्यावहारिक बातें, कि आदर से कैसे शामिल हों।
पहली बात, व्यवस्था। भस्म आरती में स्थान सीमित होते हैं, और वे केवल मंदिर समिति के अपने आधिकारिक माध्यमों से मिलते हैं। कृपया केवल उन्हीं माध्यमों का उपयोग कीजिए, और यात्रा से पहले समिति के ताज़ा निर्देश पढ़ लीजिए, क्योंकि वे बदलते रहते हैं।
दूसरी बात, वस्त्र। जो लोग लिंग के पास जाते हैं, उनके लिए समिति वस्त्र-नियम तय करती है, और उसके विवरण समिति प्रकाशित करती है। जैसा लिखा है, वैसा ही पालन कीजिए। यह मंदिर के अनुशासन का हिस्सा है।
तीसरी बात, समय और स्वास्थ्य। आरती से काफ़ी पहले, अंधेरे में पहुँचना होता है, और लंबी प्रतीक्षा हो सकती है, अक्सर खड़े रहकर या फ़र्श पर बैठकर। योजना बनाने से पहले अपने स्वास्थ्य के बारे में सोचिए। अगर आप बुज़ुर्ग हैं, गर्भवती हैं, अस्वस्थ हैं, या ऐसी दवा लेते हैं जिससे सुबह जल्दी उठना या लंबी प्रतीक्षा कठिन हो, तो पहले अपने डॉक्टर से बात कीजिए और उनकी सलाह मानिए। अनुमति हो तो पानी साथ रखिए, और असहज लगे तो बैठ जाने या बाहर आ जाने में ज़रा भी संकोच मत कीजिए। अपना ध्यान रखना भी आदर भरी यात्रा का हिस्सा है।
चौथी बात, भीतर का आचरण। आवाज़ धीमी रखिए। भीड़ दबाव डाले तब भी पंक्ति और मंदिर कर्मचारियों के निर्देश मानिए। आरती के कुछ क्षणों में कर्मचारी कुछ विशेष परंपराओं का पालन करने को कह सकते हैं। चुपचाप उनकी बात मानिए। परंपराएँ मंदिर की अपनी हैं, वे आपके घर की रीति से अलग हो सकती हैं, और किसी परंपरा को दूसरी से ऊँचा-नीचा कहना हमारा काम नहीं। जहाँ फ़ोन और कैमरे की अनुमति नहीं है, वहाँ उन्हें पूरी तरह रख दीजिए। बहुत-से लोग कहते हैं कि उन्हें खुशी है उन्होंने ऐसा किया, क्योंकि उन्हें आरती ही याद रहती है।
और अगर साथ में बच्चे या बुज़ुर्ग हों, तो उन्हें पास रखिए, और किनारे की ओर बैठने दीजिए जहाँ भीड़ कम होती है।
आरती पूरी होने के बाद जल्दी निकलने की ज़रूरत नहीं। बहुत-से भक्त आसमान हल्का होने तक मंदिर के आँगन में कुछ देर बैठते हैं। आसपास नगरी जागने लगती है। चाय की दुकानें खुलती हैं, छोटे मंदिरों की घंटियाँ बजने लगती हैं। दिन के काम शुरू होने से पहले, भीतर जो महसूस हुआ उसके साथ चुपचाप बैठने का यह अच्छा समय है।
बहुत-से लोग कभी भस्म आरती में स्वयं शामिल नहीं हो पाएँगे, और इसमें कोई बात नहीं। कुछ लोग घर से ही मंदिर द्वारा उपलब्ध कराए गए प्रसारण के माध्यम से जुड़ते हैं। कुछ बस किसी सुबह थोड़ा जल्दी उठकर घर में दीया जलाते हैं, और उसी पहर महाकाल का स्मरण करते हुए चुपचाप बैठते हैं। भक्ति कभी केवल गर्भगृह के सबसे पास खड़े लोगों तक सीमित नहीं रही। यह हमने श्रीकर की कथा में भी सुना था, उस बालक की कथा जिसके पास बस एक पत्थर था।
अगर आप चाहें, तो आइए अभी ऐसा ही एक छोटा-सा पल लें। आराम से बैठिए। साँस को धीमा होने दीजिए। मन हो तो स्वयं, धीरे से, अपनी गति से, तीन बार ओम कहिए। जब तक आप कहते हैं, मैं चुप रहूँगा।
अब उस ध्वनि को थमने दीजिए, और उसके बाद की शांति में कुछ साँसों तक बैठे रहिए।
आइए, आज की बात समेट लें।
भस्म आरती महाकालेश्वर में दिन की पहली पूजा है, जो भोर से पहले होती है। लिंग का स्नान और श्रृंगार होता है, भस्म अर्पित होती है, और फिर दीपों, शंख और डमरू के साथ आरती होती है। शिव परंपरा में भस्म पवित्र है, और भक्त अक्सर उसे इस बात की याद मानते हैं कि समय के साथ सब बदलता है, पर शिव रहते हैं। शामिल होने के लिए केवल मंदिर समिति के आधिकारिक माध्यम अपनाइए, उसके वस्त्र-नियम और कर्मचारियों की बात मानिए, और अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखिए।
आज की एक बात, साथ ले जाने के लिए। भस्म वह है जो जलना पूरा होने के बाद बचती है। इस सप्ताह किसी एक रात सोने से पहले, कोई एक चिंता याद कीजिए जो आप ढो रहे हैं, और मन ही मन उसे जलकर भस्म हो जाने दीजिए। फिर उसे वहीं छोड़ दीजिए।
अगली बैठक में हम मंदिर से बाहर निकलकर आसपास के उज्जैन में घूमेंगे, शिप्रा नदी, हरसिद्धि, काल भैरव, और महर्षि सांदीपनि के आश्रम तक।